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शख्सियत: किसान राजनीति का बिसाती चेहरा रामचंद्र विकल

आज जब विकल हमारे बीच नहीं हैं तो वे खासतौर पर अपने सहयोगी और नेता चरण सिंह के साथ टूटते-बनते सियासी संबंधों के लिए खूब याद किए जाते हैं। इंदिरा गांधी और चरण सिंह के बीच जब सियासी तनातनी बढ़ी तो इंदिरा जी के कहने पर विकल बागपत से चुनाव लड़ने पहुंचे।

किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सहयोगी राम चंद्र विकल।

भारत में आजादी के साथ ही इस दरकार को समझ लिया गया था कि किसानों के हित के बिना देश में विकास को मुख्यधारा की चारित्रिक विशिष्टता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है। यही कारण है कि आरंभ के तीन-चार दशकों तक यह बात एक बड़ी अर्थशास्त्रीय अवधारणा के तौर पर मानी और दोहराई गई कि भारत एक कृषि प्रधान देश है।

यह भी कि औद्योगिक की जगह भारत में योजना और विकास के साझे को मिश्रित अर्थव्यवस्था की शिनाख्त मिली। पर दुर्भाग्य यह रहा कि दशक दर दशक सरकारों की नीतियां किसानों के हित से कटती चली गईं, वहीं इस दौरान किसानों को भी अपनी नुमाइंदगी करने वाले नेता कम ही मिले। इस लिहाज से दो नाम खासे अहम हैं- चौधरी चरण सिंह और रामचंद्र विकल।

दिलचस्प है कि राजनीति के जानकार भी चरण सिंह के शिष्य या सहयोगी के तौर पर सबसे ज्यादा चर्चा करते हैं राजनारायण की। पर तारीखी लिहाज से देखें तो रामचंद्र विकल ज्यादा बड़ा नाम है। दोनों न सिर्फ बडे़ कद के नेता थे बल्कि इनके आपसी संबंध भी सियासी तापमान के साथ नाटकीय तरीके से उलझते-गरमाते रहे। यह भी कि इन दो नामों के साथ ही कम से कम उत्तर भारत की राजनीति जाट और गुर्जर समुदाय की प्रतिद्वंद्विता की राजनीति में तब्दील होती गई।

रामचंद्र विकल का जन्म आठ नवंबर 1916 को गाजियाबाद के नयागांव, बसंतपुर में हुआ था। वे एक दौर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बाद राजीव गांधी के काफी नजदीकी रहे। विकल बचपन से आर्य समाज के विचारों से खासे प्रभावित थे। छात्र जीवन में वे स्वाधीनता संघर्ष में काफी समर्पण के साथ शरीक हुए थे।

आजाद भारत में उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी एक किसान नेता के तौर पर शुरू की। उन्होंने किसानों की समस्या और उनके कल्याण के लिए किए जाने वाले कार्यों की बहुत गूढ़ समझ थी। यही कारण है कि अलग-अलग दौर में सरकारों द्वारा किसानों के साथ समाज कल्याण के लिए की कई पहलों को योजनागत बनाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। किसानों के लिए खेतों की सिंचाई और बिजली की लागत कम होनी चाहिए और उनसे भू-राजस्व के नाम पर कम से कम वसूली हो, सरकार और राजनीति के स्तर पर इस समझ को एक सैद्धांतिक टेक बनाने में उनकी भूमिका तारीखी महत्व की मानी जाएगी।

आज जब विकल हमारे बीच नहीं हैं तो वे खासतौर पर अपने सहयोगी और नेता चरण सिंह के साथ टूटते-बनते सियासी संबंधों के लिए खूब याद किए जाते हैं। इंदिरा गांधी और चरण सिंह के बीच जब सियासी तनातनी बढ़ी तो इंदिरा जी के कहने पर विकल बागपत से चुनाव लड़ने पहुंचे। यह देख चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में उतरे।

इसी दौरान 17 विधायकों के साथ चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिर गई। जब नए मुख्यमंत्री के नाम पर जब चर्चा शुरू हुई तो विकल और चरण सिंह के नाम सामने आए। बाद में चरण सिंह ने विकल को उप मुख्यमंत्री बनाया। 1971 का लोकसभा चुनाव आते-आते विकल कांग्रेस में वापस चले गए। चरण सिंह ने नई पार्टी भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) बनाई और पहला लोकसभा चुनाव बागपत से लड़ने वाले थे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बड़ा सियासी दांव चला और विकल को बागपत से कांग्रेस का टिकट दिया। यह देख बीकेडी ने विकल के सामने तब के सांसद रघुवीर सिंह शास्त्री को उतारा और खुद चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ने चले गए। विकल बागपत से जीतकर लोकसभा पहुंचे। किसान संघर्ष को राजनीति के केंद्र में लाने वाले विकल का इस बात का सबक है कि दिल्ली की सत्ता और किसान के खेत की दूरी को पाटना आसान नहीं है।

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