ताज़ा खबर
 

कहानी : वह फिर नहीं लौटा

खूब अच्छी सुबह, गुलाब के फूलों की तरह खिली हुई सुबह, चिड़ियों की चहचहाट से भरी सुबह, तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती सुबह, दादी मां के हृदय से उठते पवित्र मंत्र से गूंजती सुबह, मंत्र उच्चारण से आसपास के घरों में आध्यात्मिक चेतना को अंतश्चेतना में भिगो देने वाली सुबह, कुएं में उतरती-डूबती बाल्टी की रस्सी पकड़ कर खींचती सुबह, कुएं की घिर्रियों की चूं-चहट के साथ मन में संगीत घोलती सुबह, सचमुच की सुबह, खूब अच्छी सुबह, अब सुबह में नहीं होती।

Author नई दिल्ली | Published on: June 12, 2016 2:40 AM
representative image

रोज की तरह सुजान सिंह सुबह की पहली किरण से पहले ही जाग कर नित्यक्रम से निवृत्त हो गए। यह उनका रोज का नियम था। पहले वह उठते, उसके बाद सुबह होती। आज उन्हें लगा अब सुबह, सुबह जैसी नहीं होती। खूब अच्छी सुबह, गुलाब के फूलों की तरह खिली हुई सुबह, चिड़ियों की चहचहाट से भरी सुबह, तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती सुबह, दादी मां के हृदय से उठते पवित्र मंत्र से गूंजती सुबह, मंत्र उच्चारण से आसपास के घरों में आध्यात्मिक चेतना को अंतश्चेतना में भिगो देने वाली सुबह, कुएं में उतरती-डूबती बाल्टी की रस्सी पकड़ कर खींचती सुबह, कुएं की घिर्रियों की चूं-चहट के साथ मन में संगीत घोलती सुबह, सचमुच की सुबह, खूब अच्छी सुबह, अब सुबह में नहीं होती।

अब जो देखो वही परेशान-हलकान। न सुबह के प्रति आभार, न एक और दिन के लिए ईश्वर को धन्यवाद। जिसको देखो उसी के चेहरे पर खीझ और यंत्रणा। जैसे वे नींद से जागना ही नहीं चाहते थे। अगर सूरज की रोशनी उनकी देह में उष्मा का संचार नहीं करती तो वे अभी और पड़े रहते। नालियों में बजबजाती गंदगी को मोहल्ले वालों की पहली और देर तक रुकी पेशाब धनीभूत करके उनके नथुनों से टकराती नहीं तो वे जागते नहीं। सार्वजनिक नल पर टकराती प्लास्टिक केन के साथ तू-तू, मैं-मैं में लिपटी अश्लील गालियों का कर्णभेदी शोर उनके कान पर मक्खियों की तरह भिनभिनता नहीं तो वे बिस्तर से बाहर नहीं निकलते। बावजूद इसके, वे सुबह होने से पहले ही जाग जाते। सुबह उठ कर ही उन्होंने अपने समय को जीता था। आज पचास साल की उम्र में वे अपने आपको एक विजेता के रूप में देखते हैं।

दरअसल, यह बात उन्होंने छोटी उम्र में ही जान लिया था कि जीवन में बड़ी उपलब्धि या सफलता पाने के लिए जरूरी है सुबह जल्दी उठना। जो जल्दी सोकर उठेगा उसका जीवन उतना ही सुखद होगा। जिस व्यक्ति की सुबह तनाव और चिंता से घिरी होगी, उसका दिन उलझनों से घिरा होगा। कुछ तो इसे और बेहतर बनाने के लिए सुबह की शुरुआत पूजा-पाठ से करते। कुछ व्यायाम और योगासन से, पर वे अपने दिन की शुरुआत मुस्करा कर करते और फिर दिन भर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कराते रहते।

वे एक बेहद खूबसूरत सुबह अपने घर से निकल गए थे। निकलना कहना ठीक नहीं होगा। वे भाग आए थे घर से, घर की तलाश में। उस घर में जन्म से जवानी तक का हरेक दिन कलह की गोद में गुजरा था। रात उनके जीवन में खौफनाक मंजर की तरह आती थी। उनका पूरा वजूद कांप उठता था। दिन तो जैसे-तैसे कट जाता, पर रात से बहुत डर लगता था। जैसे-जैसे रात का अंघेरा घर में प्रवेश करता, कलह उनके कंधे से कंधा मिला कर घर में घुस जाती। उसके आते ही मान-सम्मान की सीमाएं दरकने लगती। संबंधों का बंधन टूट जाता। शिक्षा और संस्कार घर के किसी कोने में दुबके पड़े रह जाते।

वे घर में सब भाई-बहनों में बड़े थे। बड़ा होने के कारण दूसरों की अपेक्षा जल्दी समझदार हो गए थे। पर उनकी समझदारी किसी को नहीं सुहाई। वे न पिता की नशे की आदत छुड़ा सकते थे, न मां की कलह-प्रियता रोक सकते थे। हालांकि उन्होंने कई बार कोशिश की। जमाने की ऊंच-नीच बातों का हवाला दिया। बड़ी होती बहनों के भविष्य की तरफ इशारा किया। सब बेकार। नशा सिर्फ अंहकार की भाषा जानता था। उसे झुकना नहीं आता। वह झुकाना जानता था। उसे विरोध नहीं, चापलूसी पसंद थी। वह चापलूसों के बीच अपने को सदा ऊपर उठा देखना चाहता था। नीचे बैठना उसे पसंद नहीं। उसे समझाया नहीं जा सकता था। नसीहत देने का सवाल ही नहीं उठता। चार और लोग, जो उनके पैसे से मिल बैठ कर पीते, उनके अच्छे होने के पक्ष में सदा खड़े रहते। उनका कहना था वे अपने पैसे से पीते और पिलाते हैं। घर में किसी बात की कमी नहीं होने देते। फिर उनसे शिकायत कैसी? विरोध कैसा? यही उनका और उस घर का सच था।

कुसंस्कारों की कोख से जन्म कर भी वे अपने आपको संस्कार के पक्ष में खड़े पाते। तमाम कोशिशों के बाद भी वे पिता को समझा नहीं सके। नसीहत देना उनके वश में नहीं था। अत्यधिक विरोध करना पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान था। घर का माहौल और समय कभी उनके पक्ष में रहा ही नहीं। समय कभी किसी के पक्ष में होता भी नहीं। व्यक्ति उसे अपने पक्ष और विपक्ष में कर लेता है। बड़े होते ही उन्हें अहसास होने लगा कि वे लाख चाहें, बदलाव नहीं आने वाला। व्यक्ति अपनी बनाई चीज को शायद बदल भी दे, पर जो हठ और अहंकार में ढल जाए, जो दुर्व्यसन का आदी हो जाए उसे बदलना मुश्किल होता है। पिता का रोज रात को दोस्तों-यारों के साथ झूमते हुए आना, मां का गालियों की झड़ी से उनका स्वागत करना, उन्हें कभी रास नहीं आया। आस-पड़ोस में लोग सीधे मुंह नहीं, पर भाई-बहनों को देख कर अपना गुस्सा जरूर उतार लेते। ‘…नंगों के पास पैसा क्या आया, नंगई सिर उठा कर नाचने लगी। थू है सालों पर!’ कई दफा वे इन शब्दों का सामना कर चुके थे। लोगों द्वारा तिरस्कृत किए जाने वाली नजर से उनका सीना छलनी हो चुका था। वे कहीं दूर भाग जाना चाहते थे, जहां जाकर वे खुद को पहचान सकें, पर साहस नहीं जुटा पा रहे थे।

एक रात घर के तौर-तरीके से बिल्कुल सामंजस्य न बिठा पाने के कारण वे अपने नशेड़ी पिता से जानवरों की तरह पिटे। मां से कुत्ते की तरह लताड़े गए। उस रात, उस समय वे साहस जुटा कर घर से निकल ही पड़े, जब उनके जीवन में एक और कलह की रात सुबह की पहली किरण के साथ पुनर्जन्म लेने की तैयारी कर रही थी। सब रात के उपद्रव से थके, चित्त में पड़ी गहरी ठंडक के कारण गहरी नींद में थे। किसी को पता नहीं चला कि वे कब निकल पड़े।

उनके घर से चले जाने पर कोहराम नहीं मचा। बस, दोपहर और रात में एक थाली कम परसी जाने पर छुटकी ने आंसू बहाए। मां ने उसे डपट दिया होगा: ‘…चुप कर! नहीं तो एक उल्टा हाथ धर दूंगी। गया होगा कहीं मरने। जब भूख लगेगी, खुद लौट आएगा।’ वह मन मसोस कर रह गई होगी। घर में वही थी, जो उसे समझती थी। घर के सुख और शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती थी। बाकी तो मस्सड़ थे। खा-पीकर, हाथ-पांव लंबे कर लेते। घर में क्या हो रहा है और क्या नहीं होना चाहिए जैसी बातों से बेफ्रिक और निस्पृह। उन्होंने मान लिया था कि मां-बाप ऐसे ही होते हैं। अनुशासन या किसी तरह के व्यवहार के प्रति उन पर कोई अंकुश नहीं होता। वे निरंकुश हैं। वे अपने घर में, अपने सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं। वे अपने सुख के लिए किसी सगे-संबंधी या अड़ोस-पड़ोस का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते।

पारिवारिक सदस्य का तो कतई नहीं, इसलिए वे सब सदा मौन रह जाते। मौन रह जाना उनका स्वभाव नहीं था। उन्हें अच्छे-भले की तमीज आ चुकी थी। बढ़ती उम्र के साथ देह में हो रहे परिवर्तन से वे अधिक जिम्मेदारियों से भर उठे तो परिवर्तन के लिए विरोध कर बैठे। वे नहीं जानते थे कि परिवर्तन चुटकी बजाने से नहीं हो जाता। आदतें और स्वभाव की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। बिना जड़ों को काटे पेड़ के तने, टहनियों और फूल-पत्तों को बढ़ने से रोका नहीं जा सकता। प्रवृत्ति में कुछ पूर्व जन्म के भी संस्कार हो सकते हैं। कुछ तो ऐसे होते हैं जो पूर्व जन्म की कुछ सड़ी आदतें लेकर पैदा होते हैं। उन्हें ठीक करना या समझना, अपनी समझ को नष्ट करने जैसा होता है।

उनके भाग जाने के बाद घर में आई थोड़ी-बहुत तब्दीली के बावजूद फिर हर रात, उन रातों की तरह ही बीत रही थी। उनके जाने के बाद दूसरे-तीसरे दिन तक भी किसी ने जानने की कोशिश नहीं की, न ढूंढ़ने का यत्न किया। सब यही सोच रहे थे कि एक दिन खुद-ब-खुद वापस आ जाएंगे। ज्यादा से ज्यादा चार कोस दूर अपने काका के यहां गए होंगे। एक दिन उनके काका भी इसी तरह अपने बड़े भाई यानी उनके पिता के नशेड़ी और प्रताड़ित किए जाने वाले व्यवहार से क्षुब्ध होकर चले गए थे, फिर कभी न लौटने के लिए। वे वहीं गए होंगे, उन्हीं के घर अपना दुखड़ा रोने। घर से भागे लड़के के दुख को, घर से भागे हुए व्यक्ति से ज्यादा अच्छा कौन समझ सकता है।’ सोच कर सब निश्चिंत हो गए थे।

तमाम दुश्चिंताओं से दूर, वे काका के यहां गए, न मामा के यहां। जब किसी दिन काका, मामा के परिवार के सदस्य आपस में किसी आयोजन में मिले तब उनके भाग जाने का राज खुला। उस वक्त तक, उनके न होने की जगह भर चुकी थी। मां तो पहले ही पिता को कोसती रही थी ‘…खंडी भर पैदा कर मेरे सिर पर मढ़ दिया। अब छिलवाते रहो, इनसे छाती।’ यह बात वे अपने छोटे भाई-बहनों की पैदाइश पर तब तक सुनते रहे, जितने दिनों तक उन्होंने स्तनपान किया। हालांकि वे खुश नहीं हुई होंगी। वे मां हैं। लेकिन वे दुखी भी नहीं हुई होंगी कि रो-पीट कर घर सिर पर उठा लें और कहें: ‘…जाओ कहीं से भी ढूंढ़ कर लाओ मेरे बेटे को। बस! यह सोच कर रह गई होंगी कि चलो, बला टली।’

घर से घर तक का सफर उन्होंने तीस साल में पूरा किया। वे पचास के हैं। कड़ी मेहनत और अपने मकसद पर अडिग रहने के कारण वे एक घर का सपना साकार कर पाए। भोपाल नगर निगम के कार्यालय में आने-जाने वाले नेता, दलालों और जरूरतमंदों को चाय पिलाया करते थे। कुछ दिनों बाद निगम में ही चपरासी के पद पर उनकी भर्ती हो गई। अब वे राजस्व निरीक्षक हैं। ‘सुजानसिंह, राजस्व निरीक्षक’- उनके दफ्तर के बाहर इसी नाम की तख्ती लगी है। यहां तक पहुंचने में उनकी ईमानदारी और कड़ी मेहनत काम आई।

निगम में सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत एक बूढ़ी माई बुटकीबाई ने उन्हें आश्रय दिया। उन्हीं ने उन्हें चाय वाले की गुमटी में लगवाया था। दिन भर वे दौड़-दौड़ कर निगम कार्यालय से गुमटी और गुमटी से कार्यालय के सैकड़ों चक्कर लगा लेते। रात को दुकान में रखवाली करने के लिए सो जाते। अपना स्थायी पता उन्होंने बुटकीबाई के निवास को ही बनाया। नए सिरे से मैट्रिक और नौकरी लग जाने के बाद एमए की पढ़ाई उन्होंने निगम बिल्डिंग की लाईट में ही पूरी की। बुटकीबाई के प्रयासों से ही उन्हें निगम में चपरासी की नौकरी मिल पाई थी। सब उन्हें बुटकीबाई का रिश्तेदार समझते थे।

लंबी बीमारी के बाद एक दिन माई चल बसी। उसकी एक बेटी थी- लच्छो। उनसे उम्र में चार साल छोटी। उसने भी सुजानसिंह के साथ एमए किया था। जाते-जाते माई ने उनसे कहा था: ‘मैं जानती हूं तुम उच्च कुल के हो। घर से भाग कर आए थे। क्यों, यह मैं नहीं जानना चाहती। हां! मैंने सदा तुममें एक अच्छे और सच्चे इंसान को देखा है। मैं यह तो नहीं कहूंगी कि तुम मेरी बेटी से शादी कर मेरे एहसान का मोल चुका देना। मैं जानती हूं आज नहीं तो कल तुम अपने घर लौटोगे। तुम्हारे घर वाले तुमसे पूछेंगे कि यह कौन जात की है। क्या तब तुम कह सकोगे कि तुमने एक मेहतरानी से शादी की! नहीं, मैं यह नहीं चाहती कि लोग तुम पर थूकें। अगर मुझ पर एक उपकार कर सको तो बस इतना कर देना, लच्छो जहां भी रहे, जैसी भी रहे, सदा खुश रहे। बस! इतनी व्यवस्था कर देना, बिन बाप की बेटी के लिए।’

माई की बातों से वे भाव विह्वल हो उठे। माई से उनका रोम-रोम उपकृत था। उनके अंतर्मन से आवाज उठी: ‘…माई मैं कभी घर नहीं लौटूंगा…।’ कहते हुए उन्होंने लच्छो का हाथ मजबूती से थाम लिया। माई के चेहरे पर अद्भुत शांति थी। वह उन्हें अपलक निहारती रह गई।

वे अपने जीवन की सही शुरुआत कर चुके थे। वे समझ चुके थे कि ‘…कलह के घर में कोई लौटता नहीं। वहां संबंधों में न मधुरता होती है, न आत्मीयता। मर्यादा के लिए घर के दरवाजे छोटे पड़ जाते हैं। वहां दीवारों पर पुता असंतोष का रंग छूटता नहीं और तनाव के बादल छंटते नहीं। आदमी की जाति नहीं, वृत्ति ही उसकी सही पहचान होती हैं।’

माई ने उनकी बात सुनी और उसकी आंखों से धारा फूट पड़़ी। वह एक असीम संतोष के साथ मरी। इस तरह मरना संत-महात्माओं को भी नसीब नहीं होता। मरते वक्त कितनी अतृप्त इच्छाएं आंखों में तैरती रहती हैं। कितनी विवशता दिखाई देती है। भय से डूब जाता है चेहरा। पर जीवन से तृप्त माई ने पूर्ण संतोष के साथ जीवन से विदा ली। वह इस तरह मृत्यु को प्राप्त हुई जैसे मृत्यु अचानक नहीं आई, बल्कि उसने स्वयं उसका आह्वान किया हो। वह निश्चिंत होकर खुशी-खुशी एक बेहतर सफर के लिए निकल पड़ी, बिना पीछे देखे।

हंसते हुए गई माई को उन्होंने पूरी श्रद्धा से मुखाग्नि दी। निगम का पूरा महकमा साक्षी था। माई के जाने के बाद उन्होंने कभी नहीं सोचा कि वे कहां से चले थे, क्या एक बार फिर उन्हें वहां लौट जाना चाहिए, जहां उनका जन्म हुआ था, जहां उनके जन्मदाता हैं। नहीं, उन्होंने ऐसा कभी नहीं सोचा। घर में पत्नी और दो जवान बेटे हैं। वे ऊंचे कुल के हो चुके थे, कुलश्रेष्ठ। उनके लिए इस जीवन में इतना ही पर्याप्त था।
सचमुच, वे फिर नहीं लौटे।

(राजेश झरपुरे)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
जस्‍ट नाउ
X