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कविताएंः बड़ा दिन एक

राजेंद्र कुमार की कविताएं

Author January 22, 2017 12:19 AM

बड़ा दिन
(एक)

ऐसा ही कोई दिन था
जब मैं पैदा हुआ था

कोई भी कहीं भी पैदा होता है
ऐसा ही दिन होता है-
जन्मदिन
मगर सिर्फ पैदा होना जीजस होना नहीं होता।

(दो)

कल्पना कर सकता हूं मैं-
उस रात
अंधेरा रहा होगा कितना घना
हवाएं रही होंगी कितनी बर्फीली

मगर कल्पना नहीं कर पाता उस तारे की
जो उस रात
एकाएक उगा होगा आकाश में
और शेष सभी तारों की आखें
जिसकी ओर उठ गई होंगी

नहीं कल्पना कर पाता मैं
उस स्वर्ग-दूत की भी
जो प्रकटा होगा उस रात
उल्लसित हो,
और किसी मसीहा के जन्म का सुसमाचार
देकर हो गया होगा जो ओझल

वाकई क्या मेरी कल्पना-शक्ति
क्षीण हो चली है?
या वाकई दृढ़तर हो चला है
मेरी कल्पना का यह संकल्प
कि सच कैसा भी सलूक करे उसके साथ,
वह कभी नहीं छोड़ेगी सच को
अकेला और असहाय

मैं किसी मरियम की कल्पना नहीं कर सकता
न किसी संत जोसेफ की,
पर कर सकता हूं कल्पना
किसी भी क्षण
ऐसी मां और ऐसे पिता की,
जिन्हें अभी-अभी अपने
नवजात शिशु का मुख देखना नसीब हुआ है
और जो
अपने नसीब की तरह अपने शिशु का
मुख चूम रहे हैं

हालांकि
आकाश में कोई भी तारा
इनके इस शिशु के नाम पर नहीं चमकता
और न कहीं कोई स्वर्ग-दूत
आता है इनके शिशु के बारे में कोई घोषणा
करने।

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