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शख्सियतः रवींद्रनाथ टैगोर

पश्चिम बंगाल के जोड़ासांको में जन्मे रवींद्रनाथ ठाकुर पहले भारतीय थे, जिन्हें गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। उनके लेखन में इतनी ताकत थी कि अंग्रेजी सत्ता भी उनकी कलम से घबराती थी।

Author May 6, 2018 1:46 AM

जन्म : 7 मई, 1861
निधन : 7 अगस्त, 1941

पश्चिम बंगाल के जोड़ासांको में जन्मे रवींद्रनाथ ठाकुर पहले भारतीय थे, जिन्हें गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। उनके लेखन में इतनी ताकत थी कि अंग्रेजी सत्ता भी उनकी कलम से घबराती थी। भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रूप में रवींद्रनाथ ठाकुर का लिखा गीत गाया जाता है। प्रकृति से प्रेम करने वाले ठाकुर भारतीय संस्कृति के प्रतीक थे। उन्हें दुनिया गुरुदेव के नाम से भी जानती है।
व्यक्तिगत जीवन
रवींद्रनाथ ठाकुर के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर और माता शारदा देवी थीं। उनके पिता दार्शनिक और ब्रह्म समाज के संस्थापकों में से एक थे। बचपन में ही ठाकुर के सिर से मां का साया उठ गया। उनके सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे और दूसरे भाई सत्येंद्रनाथ यूरोपीय सिविल सेवा के लिए पहले भारतीय नियुक्त व्यक्ति थे। उनका एक भाई ज्योतिंद्रनाथ संगीतकार और नाटककार थे और उनकी बहन स्वर्ण कुमारी उपन्यासकार थीं।
शिक्षा-दीक्षा
रवींद्रनाथ ठाकुर की शुरुआती शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल में हुई। 883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। उनके विवाह के बाद ज्योतिंद्रनाथ की पत्नी कादंबरी देवी ने आत्महत्या कर ली। इस घटना से ठाकुर बहुत आहत हुए और विद्यालयी शिक्षा से उनका मन उठने लगा। अब वे परिवार के साथ अधिक समय गुजारने लगे। ठाकुर ने कला, शरीर विज्ञान, भूगोल, इतिहास, साहित्य, गणित, संस्कृत और अंग्रेजी जैसे विषयों को अपना पसंदीदा विषय बनाया और उनका अध्ययन किया। शिक्षा को लेकर ठाकुर का कहना था कि उचित शिक्षण चीजों की व्याख्या नहीं करता, उनके अनुसार उचित शिक्षण जिज्ञासा है।
साहित्यिक रुचि
रवींद्रनाथ ठाकुर को बचपन से ही कविताएं लिखने का शौक था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी। सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई। ठाकुर ने गीतांजलि, नैवेद्य, मेयेर खेला, चोखेर बाली, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, कणिका और क्षणिका आदि रचनाएं लिखीं। उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। उनका लेखन केवल बांग्ला तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हिंदी, अंग्रेजी आदि में अनुवादों के जरिए पूरे विश्व में पहुंचा। उन्हें विश्व भर में ख्याति प्राप्त हुई।
प्रकृति प्रेमी
ठाकुर को बचपन से ही प्रकृति से इतना प्रेम था कि 1901 में सियालदह छोड़ कर आश्रम की स्थापना करने के लिए शांतिनिकेतन आ गए। उनका मानना था कि विद्यार्थियों को प्रकृति के सान्निध्य में रह कर अध्ययन करना चाहिए। प्रकृति के बीच में पेड़ों, बगीचों और एक पुस्तकालय के साथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की। गीतांजलि के संकलन में भी उनके कई गीत प्रकृति प्रेम को दर्शाते हैं। उन्होंने करीब बाईस सौ गीतों की रचना की। आज उनके गीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। उनके संगीत को रवींद्र संगीत के नाम से जाना जाता है।
ठाकुर और गांधी
ठाकुर और महात्मा गांधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। गांधी राष्ट्रवाद को पहले पायदान पर रखते थे, तो ठाकुर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्त्व देते थे। पर दोनों एक-दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। ठाकुर ने ही गांधी को महात्मा कहा था। जब शांतिनिकेतन आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और ठाकुर देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे, उस समय गांधी ने ठाकुर को साठ हजार रुपए का अनुदान दिया था।
निधन: 7 अगस्त, 1941 को गुरुदेव का निधन हो गया। ल्ल

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