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प्रसंगः आलोचना पर सवाल बनाम आलोचना के सवाल

हिंदी आलोचना में कुछ आलोचक कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक सब पर एक ही भाषा और शब्दावली में बात करते हैं। रचना में पैठने, उसकी एक-एक पंखुड़ी को खोलने की उनमें भले क्षमता न हो, लेकिन वे पूरे आत्मविश्वास से सृजन-परिक्रमा करते हैं!

Author August 12, 2018 6:39 AM
जिस साहित्यिक समाज में सच्ची और खरी आलोचना के लिए स्थान कम हो जाए और लेखकप्रियता के दबाव में वह ठकुरसुहाती बन जाए, उस समाज में आलोचना की संस्कृति खतरे में आ जाती है।

पंकज पराशर

हिंदी आलोचना में कुछ आलोचक कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक सब पर एक ही भाषा और शब्दावली में बात करते हैं। रचना में पैठने, उसकी एक-एक पंखुड़ी को खोलने की उनमें भले क्षमता न हो, लेकिन वे पूरे आत्मविश्वास से सृजन-परिक्रमा करते हैं! उनकी टिप्पणियों से लेखक को तुरंता चर्चा का सहज संतोष प्राप्त हो जाता है! रीतिकाल के कवि ठाकुर ने कहा था, ‘ढेल सो बनाय आय मेलत सभा के बीच, लोगन कवित्त कीबो खेल करि जान्यो है।’ पर कोफ्त तब होती है जब लेखकप्रियता के मारे आलोचक कवित्त को महज खेल समझ लेने वाले कवियों को ‘भली-भली आलोचना’ का प्रसाद देते ही रहते हैं!

इससे साहित्य के परिदृश्य में आत्महीन, भाषाहीन और अक्सर ज्ञानहीन रचनाकारों के कोलाहल में गंभीर और प्रतिभाशाली लेखकों की बेहतरीन रचनाएं भी अचर्चित और अलक्षित रह जाती हैं! यह अकस्मात नहीं है कि टेरी इगल्टन को लिखना पड़ा, ‘आजकल ऐसी आलोचना या तो साहित्य-उद्योग के जनसंपर्क विभाग का हिस्सा है या शिक्षा संस्थाओं का आंतरिक मामला। उसका कोई सामाजिक लक्ष्य या कार्य नहीं है।’ यह हिंदी आलोचना के बारे में भी सच है। आज हिंदी में आलोचनात्मक चेतना की क्रियाशीलता का दायरा क्रमश: संकुचित हुआ है। कुछ लेखकप्रिय आलोचक जब कुछ बोलते हैं, तो अपनी पसंद के महज दो-चार रचनाकारों तक सीमित रह कर ‘विषय-कीर्तन’ कर लेते हैं!

जिस साहित्यिक समाज में सच्ची और खरी आलोचना के लिए स्थान कम हो जाए और लेखकप्रियता के दबाव में वह ठकुरसुहाती बन जाए, उस समाज में आलोचना की संस्कृति खतरे में आ जाती है। कभी-कभी क्षणिक उदारतावश लोग ‘निंद्रों’ को ‘नियरे’ राखने की बात करते हैं, लेकिन नियरे रहने वाला निंद्र जब अपनी कर्मठता दिखाने लगता है, तो आदर्श की बात करने वालों की सारी लोकतांत्रिकता हवा हो जाती है और निंद्र के प्रशंसक न बन पाने की निराशा से उपजी खिन्नता आलोचना की संस्कृति से ही खिन्नता बन जाती है।

सच्चाई चूंकि अपनी तासीर में कड़वी होती है, इसलिए रचना की आलोचना को व्यक्तिगत आलोचना के रूप में ग्रहण करने और सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्यक्त करने का अशालीन तरीका इधर बढ़ा है। इसकी वजह से अनेक आलोचक जहां लेखकप्रिय बनने के लिए अतिशय व्यावहारिकता का दामन थामने लगे हैं, वहीं दूसरी ओर रचनाकारों की असहिष्णुता और अमर होने की व्यग्रता ने आलोचना के मार्ग को एक हद तक अवरुद्ध कर दिया है। आज स्थिति यह है कि जो लेखक हिंदी भाषा-साहित्य की परंपरा, व्याकरण, मुहावरे और भाषिक प्रकृति तक से ठीक से परिचित नहीं, वे पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों से लेकर आलोचकों की सृजन-परिक्रमा तक में मुसलसल मौजूद होते हैं।

अलोकप्रिय होने और किसी झंझट में न पड़ने की मानसिकता के कारण अनेक सामर्थ्यवान आलोचक अपनी खोल में सिमट रहे/ गए हैं और आलोचक के वेश में निरंतर ‘लिखते और दिखते’ के उसूल पर चलने वाले कथित आलोचक आलोचना की विश्वसनीयता को वहां पहुंचा रहे हैं, जहां हर ऐरा-गैरा आकर आलोचना पर सवाल खड़ा कर देता है। याद रहे कि लोकप्रियता के लोभ को त्याग सकने के साहस से भरी आलोचना ही अपनी विश्वसनीयता की रक्षा कर पाती है। विजयदेव नारायण साही की इन पंक्तियों को भूलना नहीं चाहिए- ‘इस दहाड़ते आतंक के बीच/ फटकार कर सच बोल सकूं/ और इसकी चिंता न हो/ कि इसे बहुमुखी युद्ध में/ मेरे सच का इस्तेमाल/ कौन अपने पक्ष में करेगा’। आलोचक चाहे साहित्य का हो या राजनीति का, अलोकप्रियता का खतरा उठा कर अगर वह फटकार कर सच नहीं बोल सकता, तो आलोचना के क्षेत्र में उसके होने का क्या मतलब है!

जबसे ‘सोशल मीडिया’ का पदार्पण हुआ है, कतिपय आलोचकों और लेखकों की राय को तत्काल जानने की सुविधा हो गई है। वहां अक्सर पूरी हिंदी आलोचना का सामान्यीकरण करने का प्रयास दिखता है। कुछ लोगों से नाराजगी को पूरी हिंदी आलोचना से नाराजगी में तब्दील कर दिया जाता है। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने समकालीन लेखकों की रचनाएं ईमानदारी से नियमित पढ़ते हैं? क्या वे भारतीय और पश्चिमी साहित्य की परंपरा और विमर्शों पर केंद्रित पुस्तकों से ठीक से परिचित हैं? क्या वे इन दिनों हिंदी में लगातार आलोचना लिख रहे लगभग डेढ़ दर्जन आलोचकों के अध्ययन-चिंतन और प्रकाशित पुस्तकों से सचमुच परिचित हैं? क्या यह सच नहीं है कि अधिकतर लेखक मात्र उन्हीं आलोचकों की आलोचना पढ़ते हैं, जो उन पर लिखी गई हो और उसका स्वर प्रशंसात्मक हो? जो लोग शुद्ध भाषा और निर्दोष तथ्यों का इस्तेमाल नहीं कर सकते, वे भी अपनी अज्ञानता का बोझ आलोचना पर डाल देते हैं!

हिंदी भाषा का सावधान और सटीक प्रयोग महज आलोचना की जिम्मेदारी नहीं, रचना की भी है। ऐसे कथाकारों का क्या कीजिए, जो धान के पेड़ पर कोयल की कूक सुन लेते हैं! हैरत यह देख कर होती है कि जिस कथाकार को जिस जीवन और क्षेत्र का जितना कम अनुभव होता है, वह वहीं की कथाभूमि उठा लेता है! जो जीवन में कभी एक बार भी कश्मीर नहीं गया, कश्मीरी लोगों के सघन संपर्क में नहीं रहा, वह कश्मीर पर उपन्यास लिख मारता है! जिसे शेयर बाजार और सेंसेक्स की बारीकियों का रत्ती भर ज्ञान नहीं, वह इस उपन्यास से संक्षिप्त कुछ और नहीं लिखता! जिसे बनारसी बोली, भोजपुरी, अवधी के विभिन्न रूपों और इसके असर में बोली जाने वाली हिंदी का इल्म नहीं, वह बनारस के पात्रों से अवधी के असर वाली हिंदी में संवाद कराता है! कहानियों में उप-शीर्षकों को ठेल कर नए प्रयोगों का अर्थहीन दंभ पालता है! हमारे समय के लेखक कभी इस तथ्य पर विचार करते हैं कि कथा भले गल्प या गप्प हो, जीवन की विश्वसनीयता वहां भी जरूरी है। अप्रत्याशित, असंभव और तथ्यहीन बातों को महज गल्प के नाम पर भला कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

हिंदी लोकवृत्त में यह सब इसलिए निर्बाध गति से चल रहा है, क्योंकि लेखक आलोचना, लोकतंत्र और जनतंत्र जैसे प्रशंसाबटोरू शब्दों का चाहे जितना प्रयोग कर लें, असल में आलोचना या समीक्षा की शक्ल में वे सिर्फ अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं! कथा-आलोचना के लिए नए सिद्धांत और नये टूल्स की मांग करने वाले लेखक क्या हिंदी की सैद्धांतिक आलोचना पढ़ने और कभी अपनी समझ पर भी शक करने का कष्ट करता है? ०

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