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पाठक से जुड़ती किताबें

आज का लेखक भी प्रचार के सारे हथियारों से लैस हो चुका है। हालांकि इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं, पर जो दृश्य पहले बन चुका था, उसके मुकाबले ये दुष्परिणाम बहुत कम हैं, नगण्य हैं।

Author January 6, 2019 5:01 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पंकज सुबीर

हिंदी का प्रकाशन जगत बहुत उलझनों और दांव-पेंचों से भरा हुआ है। इसके एक सिरे पर खड़ा है लेखक, तो दूसरे सिरे पर प्रकाशक। इन दोनों के बीच में कहीं पाठक है। पाठक से ऊपर वे सरकारी पुस्तकालय हैं, जो प्रकाशक से किताबें खरीदते हैं। ऊपर इसलिए कि प्रकाशकीय दुनिया में पाठक से महत्त्वपूर्ण पुस्तकालय होते हैं। पुस्तकालय थोक में किताब खरीदते हैं। इसीलिए हिंदी के इस संसार में बहुत लंबे समय तक पाठक उपेक्षित-सा बना रहा। क्योंकि उसके लिए किताबें नहीं छापी जा रही थीं। छापी जा रही थीं पुस्तकालयों के लिए। इसीलिए सरकारी व्यवस्था के अनुसार पुस्तकों के दाम भी वैसे ही होते थे/ होते हैं। इन बढ़े हुए दामों का खमियाजा भुगतना पड़ता है पाठक को। उसे भी सरकारी खरीद वाले दाम पर वह पुस्तक खरीदनी होती है। असल में प्रकाशक के लिए वही पुस्तक महत्त्वपूर्ण होती है, जो सरकारी पुस्तकालय में होने वाली खरीद में बेची जा सके।

यह सब लंबे समय तक चलता रहा। इसी के चलते कई ऐसे लेखक भी महान बन गए, जिनका भले कोई पाठक वर्ग नहीं था, मगर पुस्तकालय की चयन समिति में बैठे लोगों के वे प्रिय हुआ करते थे। इन सबके कारण पाठक और उपेक्षित होता चला गया। इससे वे लेखक भी धीरे-धीरे उपेक्षित होते चले गए, जो पाठकों के लिए लिखते थे। फिर वह समय भी आया कि लेखक की रचना में उस विधा के आवश्यक तत्त्वों की जगह ‘वाद-विशेष’, ‘विचारधारा-विशेष’ के तत्त्व तलाशे जाने लगे। रचनाएं धीरे-धीरे ‘विचारधाराओं का मुखपत्र’ होने लगीं, क्योंकि लेखक को किसी पाठक के लिए नहीं, उसे पुस्तकालयों, पुरस्कारों, सम्मानों, फैलोशिपों के लिए लिखना था। इसलिए पाठक परिदृश्य से लगभग गायब ही हो गया। क्योंकि ‘विचारधाराओं’, ‘वादों’ के बोझ से लदा हुआ जो कुछ उसके सामने आता था, वह उसकी समझ से परे था। इस तरह धीरे-धीरे हिंदी की मुख्यधारा का साहित्य पाठक-विहीन होता चला गया। इसमें पाठक का रत्ती भर भी दोष नहीं है। प्रशंसित, सम्मानित, चर्चित पुस्तकों को वह खरीदता था, और वे पुस्तकें उसे किसी दूसरे ग्रह से आई हुई लगती थीं। वह जो पढ़ना चाहता था, वह जब उसे नहीं मिला, तो वह पुस्तकों से हट कर दूसरे माध्यमों की तरफ चला गया। पाठक के गायब हो जाने के बाद प्रकाशकों का काम और आसान हो गया। वे अब केवल सरकारी पुस्तकालय में खरीदी जाने वाली प्रतियों के ही प्रकाशक होकर रह गए। पुस्तक छापो, चार से पांच गुना दाम पर पुस्तकालय को बेच दो और फारिग हो जाओ। इन सबके कारण यह हुआ कि पहले पाठक गौण हो गया था, और उसके बाद लेखक भी गौण हो गया। प्रकाशक का कद इन दोनों से बहुत बड़ा हो गया। प्रकाशन एक ब्रांड हो गया, जो पूरे साहित्य को अपने पीछे छिपा कर सामने से दिखाई देने लगा।

फिर उसके बाद यह हुआ कि अचानक सोशल मीडिया, इंटरनेट ने दस्तक दी और नए-नए पंखों पर सवार होकर कुछ ऐसे प्रकाशक सामने आए, जो अपनी पुस्तकें पुस्तकालयों को नहीं, बल्कि पाठकों को बेचना चाहते थे। इन्होंने आकर बहुत तोड़-फोड़ की। असल में लेखक के सामने भी अब एक नई दुनिया खुल चुकी थी। वह अपनी रचनाएं सीधे पाठकों तक पहुंचाने लगा था। लेखक और पाठक के बीच जो प्रकाशक नाम की व्यवस्था थी उसे सूचना और तकनीक के विस्तार ने समाप्त कर दिया। मगर इसका मतलब यह नहीं कि प्रकाशक की भूमिका समाप्त ही हो गई। असल में भूमिका बदल गई। जो नए प्रकाशक सामने आए, उनमें से कुछ इसी सूचना और तकनीक के घोड़े पर सवार होकर आए। इन प्रकाशकों ने एक बार फिर से लेखक की छवि को झाड़-पोंछ कर ठीक-ठाक किया। इनको लेखक की आवश्यकता थी। और वहां से एक बार फिर से सारा दृश्य बदल गया। इस नए प्रकाशक के सामने पुस्तक बेचने के लिए पूरा नेटवर्क खड़ा करने की समस्या नहीं थी, क्योंकि उसके सामने इस समय तक आ चुके आॅनलाइन वेब शॉपिंग पोर्टल की दुनिया थी। उसे मालूम था कि अब अधिकांश युवा खरीदार दुकान तक नहीं जा रहा है, वह इन्हीं पोर्टल्स से खरीदारी कर रहा है। इन अपेक्षाकृत युवा प्रकाशकों ने सूचना और तकनीक का पूरा फायदा उठाया। इनका पूरा नेटवर्क सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया में ही स्थापित है। वहीं से लेखक आते हैं, वहीं प्रचार होता है और वहीं पर पुस्तकें बेची भी जाती हैं।

आज दृश्य यह है कि अब बहुत से प्रकाशक मैदान में हैं। यहां तक कि कई लेखक खुद भी प्रकाशक हो गए हैं। और ये जो नए प्रकाशक सामने आए हैं, ये चूंकि पुस्तकालयों के लिए नहीं, बल्कि पाठकों के लिए काम कर रहे हैं, इसलिए इससे लेखक और पाठक दोनों का भला हो रहा है। आज का लेखक भी प्रचार के सारे हथियारों से लैस हो चुका है। हालांकि इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं, पर जो दृश्य पहले बन चुका था, उसके मुकाबले ये दुष्परिणाम बहुत कम हैं, नगण्य हैं। पिछले पांच सालों में जैसे हिंदी की मुख्यधारा में रचनाकारों का एक विस्फोट-सा हुआ है। इस विस्फोट में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के परिणाम सामने आ रहे हैं। चूंकि ये सारे रचनाकार बहुत जल्दी में हैं, इसलिए ये अपनी पुस्तक को लेकर अतिउत्साह में कार्य करते हैं। कई बार तो यह भी होता है कि प्रकाशक की भूमिका केवल प्रकाशित करने तक रह जाती है, बाकी का सारा काम लेखक खुद करता है। लेखक की यह भूमिका बिल्कुल नई है। लेकिन इन सबका एक फायदा यह जरूर हुआ है कि बहुत सीमित संख्या में वह पाठक एक बार फिर से किताबों की तरफ मुड़ा है, जो इसकी तरफ पीठ कर चुका था। अति प्रचार के कारण यह भी हो रहा है कि कुछ नया पाठक वर्ग भी किताबों की तरफ मुड़ रहा है। हिंदी का नया पाठक सामने आ रहा है। इसीलिए हिंदी में पिछले कुछ सालों में ‘बेस्ट सेलर’ जैसी घटनाएं भी होने लगी हैं। जबकि पुराने और स्थापित प्रकाशक इस प्रकार की बातों से बचते थे, क्योंकि बिकने का मतलब होता था ‘रॉयल्टी’। पुस्तक के ‘बेस्ट सेलर’ होने का मतलब था, उसके लेखक को रॉयल्टी देना। बेस्ट सेलर के साथ हिंदी ने एक और नई बात देखी- वह था ‘बुक प्रमोशन’। अंग्रेजी या दूसरी विदेशी भाषाओं में तो यह होता था, लेकिन हिंदी के लेखक के लिए यह नई बात थी। इन नए प्रकाशकों का पूरा दारोमदार उनके लेखक पर होता है, इसलिए ये लेखक की छवि को लेकर भी काम करते हैं। अब हिंदी में भी ऐसा हो रहा है कि लेखक और उसकी किताब दोनों ऊपर होते हैं और प्रकाशक कहीं पीछे होता है। इन नए प्रकाशकों ने अपने को थोड़ा पीछे रखा। ये अपने आप को ब्रांड बनाने के बजाय अपने लेखक को सेलिब्रिटी या ब्रांड बनाने में विश्वास रखते हैं। यहीं पर आकर आपको दोनों बातों के बीच का अंतर समझ में आ जाएगा कि पुस्तक पुस्तकालय को बेचने और सीधे पाठक को बेचने के बीच क्या अंतर है।

ये प्रकाशक अपने लेखक को पहले ब्रांड बनाते हैं और फिर उस ब्रांड को बेचते हैं- किताबों के रूप में। इनका लेखक थका हुआ-सा वह लेखक नहीं है, जिसकी पुस्तकें देश के सारे सरकारी पुस्तकालयों में भरी-ठुंसी पड़ी हैं, लेकिन जिसको कोई पाठक जानता-पहचानता तक नहीं है। इन नए प्रकाशकों के लेखकों की पुस्तकें भले आपको किसी सरकारी पुस्तकालय में न मिलें, मगर इनके चेहरे सबके परिचित हैं। लेखक की जो मूर्ति खंडित-सी, प्रकाशन जगत के पिछवाड़े पड़ी हुई थी, उस मूर्ति में एक बार फिर से प्राण प्रतिष्ठा का काम इन प्रकाशकों ने किया। इस पर प्रसन्न तो हुआ जा सकता है, लेकिन बस इस चिंता को भी दिमाग में बनाए रखना होगा कि यह बाजार के हावी होने के संकेत हैं। अगर सब कुछ केवल बिकने के लिए लिखा जाने लगेगा, तो भी उसका नुकसान होना है। बहरहाल, इस बदले हुए समय के लिए यही कहा जा सकता है कि यह लेखक और पाठक के लिए अच्छा समय है।

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