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जाएं तो जाएं कहां

ऐसी जगहों पर चिकित्सीय सुविधाओं का न होना सबसे अहम समस्या है। हरिद्वार में हर की पैड़ी, राजस्थान में पुष्कर तीर्थ, दक्षिण में सबरीमाला मंदिर, यूपी में पूर्णागिरी मंदिर आदि दर्जनों ऐसे तीर्थ और धार्मिक स्थल हैं, जहां पूरे साल लोगों का तांता लगा रहता है, लेकिन प्राय: इन सभी जगहों पर आने वाले यात्रियों की संख्या के लिहाज से चिकित्सा के प्रबंध नहीं होते। प्राय: ज्यादातर श्रद्धालु बुजुर्ग होते हैं, जिन्हें पहाड़ों पर चढ़ते वक्त हृदय संबंधी समस्या हो जाना आम बात है।

Author June 10, 2018 07:08 am
तीसरी समस्या तीर्थाटन को भी पर्यटन समझने की बढ़ती प्रवृत्ति से पैदा हुई।

पर्यटन को देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ कर देखा जाने लगा है। अब इसे उद्योग का दर्जा प्राप्त है। पर अभी तक हमारे यहां सही ढंग से पर्यटन की संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है। यही वजह है कि भारत में पर्यटन उद्योग अब भी ज्यादातर देसी सैलानियों पर निर्भर है। यहां अधिकतर लोग खास मौसम में या लंबी छुट्टियों में अपने शहर के आसपास की जगहों पर जाना पसंद करते हैं। इससे अक्सर भीड़ बढ़ती और अव्यवस्था भी पैदा होती है। पर्यटन उद्योग के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा कर रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

इंसान सदियों से घुमक्कड़ी का शौकीन रहा है। घर-गृहस्थी के कामकाज में कुछ देर को फंसता है, फिर मौका मिलते ही उसके पैर चल पड़ते हैं किसी नए ठिकाने की खोज में, जहां कुछ वक्त गुजार कर वह नए अनुभव ले सके, दिल-दिमाग को कुछ सुकून दे सके और रोजमर्रा की उबाऊ जिंदगी से परे जाकर नई ऊर्जा पा सके। हमारे शरीर और मन को नई ऊर्जा-स्फूर्ति से भरने में पहले ज्यादातर तीर्थों, धर्मस्थलों और ऐतिहासिक स्थानों की भूमिका होती थी। नए जमाने में हिल स्टेशन, जंगल सफारी और रोमांच का अहसास कराने वाली जगहों-खेलों ने पर्यटन के नए विकल्प दे दिए हैं। आज देश में घरेलू के अलावा विदेशी पर्यटकों की आमद नए-नए रोजगार पैदा कर रही है, पर्यटन उद्योग में भारी कमाई का जरिया बन रही है। पर इस उद्योग में सब कुछ सुनहरा नहीं है। इन दिनों मशहूर पर्वतीय स्थल शिमला के सूखते हलक का नजारा देख लीजिए, जहां क्या सैलानी और क्या स्थानीय नागरिक, प्यास बुझाने को बाल्टी लिए टैंकरों के आगे-पीछे घूम रहे हैं। यही नहीं, देश के जितने जाने-माने पर्यटन स्थल हैं, पिछले कुछ अरसे से भारी भीड़ का सामना कर रहे हैं, जिसके चलते वहां की व्यवस्थाएं या तो कम पड़ जाती हैं या फिर अचानक चौपट हो जाती हैं, जिससे सैलानी प्रशासन को कोसते नजर आते हैं। सवाल है कि क्या अब घुमक्कड़ी सुकून की जगह मुसीबतों का सफर बन गई है। सवाल यह भी है कि क्या पर्यटन का मकसद सिर्फ रोजगार और कमाई है या फिर यह मानसिक-आध्यात्मिक सुकून देने का एक शानदार जरिया बन सकता है।

विदेशी घूमें और देसी भी

एक वक्त था जब देसी पर्यटन का मतलब हरिद्वार-ऋषिकेश, मथुरा-वृंदावन, प्रयाग,गया जाना, चारधाम यात्रा करना और कुंभ मेले में कल्पवास करना होता था। आध्यात्मिक किस्म की इन यात्राओं को जीवन के अलग-अलग पड़ावों से जोड़ा जाता था और इनमें खर्च भी नाममात्र को होता था। लोग सत्तू चना-चबैना बांध कर घर से पैदल ही निकलते और जो साधन मिल जाता, उसके सहारे तीर्थों की घुमक्कड़ी कर लेते। वक्त बदला, रेल-बसें आर्इं तो भ्रमण के तौर-तरीके और उद्देश्य भी बदल गए। यात्राओं के लिए लोग जेब से दो पैसे खर्च करने लगे और तीर्थस्थलों के पंडे-पुजारियों से लेकर होटल-धर्मशालाओं वाले चार पैसे कमाने लगे। धीरे-धीरे देसी पर्यटन का यह दायरा बढ़ा, आगरा के ताजमहल, दिल्ली के लालकिले, मुंबई के गेटवे आॅफ इंडिया से लेकर मसूरी, शिमला, दार्जिलिंग जैसे हिल स्टेशन और केरल के बैकवॉटर्स, जम्मू-कश्मीर की हसीन वादियां, डल झील जैसी जगहें भी लोगों की नजर में चढ़ने लगीं। इस सारे सिलसिले में धार्मिक पर्यटन उपेक्षित नहीं हुआ, बल्कि उसका दायरा भी बढ़ा और वैष्णोदेवी, पूर्णागिरी, शिरडी, अमरनाथ आदि की यात्राओं में नया जोश पैदा हो गया।

यही नहीं, ऋषिकेश जैसी जगहें सिर्फ धार्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं रहीं, बल्कि उनमें रिवर रॉफ्टिंग जैसी चीजों ने नया रंग भर दिया। लोग एक तरफ सावन में कांवड़ लेकर निकलने लगे, तो दूसरी तरफ हिमाचल के बिलिंग में पैराग्लाइडिंग के सहारे उड़ान भरने लगे। एक सैलानी डेस्टिनेशन के रूप में गोवा जैसी जगहें सिर्फ विदेशियों की पहली पसंद नहीं रहीं, बल्कि नए उभरे मध्यवर्गीय देसी घुमक्कड़ों की लिस्ट में भी अहमियत पाने लगा। कहने का आशय यह है कि अब पर्यटन कमाई का एक बड़ा जरिया बन गया है और यह कमाई सिर्फ विदेशी पर्यटकों की बदौलत नहीं हो रही है, देसी पर्यटन भी इसमें भरपूर योगदान दे रहा है। हालांकि अब भी गिनती और कमाई का हिसाब-किताब विदेशी पर्यटन के मामले में ही ज्यादा सटीक ढंग से रखा जाता है।

फिर भी अब देश में विदेशियों के मुकाबले देसी और धार्मिक पर्यटन का दायरा काफी बड़ा हो गया है। मिसाल के तौर पर अब से छह साल पहले 2012 में सरकार द्वारा जारी आंकड़े देखें तो पता चलता है कि उस एक साल में जहां विदेशी पर्यटकों की संख्या 65.80 लाख थी, वहीं घरेलू पर्यटकों की संख्या 102.70 करोड़ थी। देसी पर्यटकों की सही संख्या इससे कई गुना ज्यादा हो सकती है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर को कहीं दर्ज ही नहीं किया जाता है। यही वजह है कि देसी के मुकाबले विदेशी पर्यटकों की आमद से हुई कमाई को बढ़-चढ़ कर आंका जाता है। जैसे, वर्ष 2017 में पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों में बताया गया कि भारत को हर विदेशी पर्यटक अब औसतन 1.76 लाख रुपए के बराबर विदेशी मुद्रा का कमाई करवा रहा है। हालांकि यह सही है कि विदेशी पर्यटकों के भारत आने की तादाद भी साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। ये विदेशी पर्यटक पहले की तुलना में अब ज्यादा खर्च भी कर रहे हैं।

वर्ष 2016 के ग्यारह महीनों में कुल उन्यासी लाख विदेशी पर्यटक भारत आए। यह आकंड़ा 1999 के मुकाबले तीन गुना है। 1999 में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या पच्चीस लाख थी। 2004 में यह संख्या बढ़ कर पैंतीस लाख, 2009 में बावन लाख और 2014 में सतहत्तर लाख तक पहुंची थी। इन विदेशी पर्यटकों से 1999 के मुकाबले 2016 के ग्यारह महीनों में ग्यारह गुना ज्यादा विदेशी मुद्रा की कमाई हुई। 1999 में विदेशी पर्यटकों से तेरह हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा हासिल हुई थी, तो 2016 के ग्यारह महीनों में एक लाख उनतालीस हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा भारत को मिली थी। ये आंकड़े बताते हैं कि 1999 में एक विदेशी पर्यटकों से देश के पर्यटन उद्योग को बावन हजार रुपए की कमाई होती थी, जो 2017 आते-आते बढ़ कर 1.76 लाख रुपए हो गई। ये आंकड़े हमारे योजनाकारों-नेताओं के दिमाग भी हैं। देसी और विदेशी पर्यटकों का फर्क भी उनके सामने है। यही वजह है कि आज भले देसी पर्यटक तीरथ की मानसिकता से बाहर आकर गोवा- केरल के समुद्र तटों पर जाने को अपना हक मानने लगा है, पर उनकी बढ़ती संख्या कमाई के लिए पर्यटन पर आश्रित राज्यों को इसलिए खटकने लगी है कि कहीं देसी घुमक्कड़ों की मौजूदगी उन विदेशी सैलानियों को नाराज न कर दे, जो देसी पर्यटकों के मुकाबले ज्यादा पैसा देते हैं।

तीर्थयात्री बने सैलानी

तीसरी समस्या तीर्थाटन को भी पर्यटन समझने की बढ़ती प्रवृत्ति से पैदा हुई। अब ऐसे यात्री कम होते हैं जो किसी तीर्थस्थल पर तीर्थ करने के मकसद से जाते हैं। यह एक महीन बात है, जिसके महत्त्व को समझने की जरूरत है। एक वक्त था जब हमार देश में तीर्थाटन का उद्देश्य विशुद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक था। तीर्थाटन करने वाले लोग धैर्यवान थे। वे कई दिन कई रात तक पैदल यात्रा किया करते थे। अपने पैरों से ही पर्वतों को नापने के ईनाम के तौर पर तीर्थयात्रियों को अनेक प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अनुभवों की पूंजी भी मिलती थी। तब यातायात के साधन नहीं थे। बल्कि तीस-चालीस वर्ष पूर्व तक श्रद्धालु चारधाम तीर्थाटन का महत्त्व ही तब पूर्ण हुआ मानते थे जब वे इन पवित्र स्थानों तक पैदल आएं-जाएं। लेकिन अब यह चलन नहीं रहा।

परिवहन व्यवसाय के कारण तीर्थाटन भी विसंगत हो चुका है। कमाई के लालच में लोगों को वस्तुओं की तरह मोटर वाहनों में लाद कर ले जाने और लाने की प्रवृत्ति ने चारधाम यात्रा का मूल धार्मिक उद्देश्य ही नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। वहां सुख-सुविधाओं से लैस महंगे होटलों की मांग लोग करने लगे हैं, जरा भी पैदल न चलना पड़े, खाने-पीने की हर वस्तु मिल जाए और जैसा जीवन वे शहरों में जीते हैं, वैसी सारी सहूलियतें तीर्थस्थलों पर दिखें- यह अपेक्षा पैदा हो गई है। हैरानी नहीं कि अब हनीमून मनाने वाले ऐसे जोड़े हरिद्वार की हरकी पौड़ी पर नजर आते हैं, जिनके तौर-तरीके से पता चल जाता है कि उनका मकसद तीर्थ करना नहीं, बल्कि कम बजट में किसी सुरम्य जगह पर जाना होता है।

भारी पड़ती भीड़

अब यह बात शिद्दत से नोटिस की जाने लगी है कि ज्यादातर लोग कुछ खास मौसम में और गिने-चुने पर्यटन स्थलों पर जाना पसंद करते हैं, जिससे ट्रेन-होटल रिजर्वेशन से लेकर उन पर्यटन स्थलों पर खाने-पीने की तक की समस्याएं पैदा होने लगी हैं। एक खास मौसम में पर्यटकों की भीड़ किसी खास जगह पर टूट पड़ने का क्या नतीजा होता है, पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के शिमला में पैदा हुआ भीषण जलसंकट इसकी निशानी था, जहां बताया गया कि पीने के पानी की एक बोतल पचास रुपए या अधिक में बेची गई। गरमी में पहाड़ी जगहों पर पानी का अभाव नया नहीं है, हिमाचल प्रदेश हो या उत्तराखंड, इन राज्यों में कई स्थानों पर प्राय: हर साल ग्रीष्म ऋतु में स्थानीय जलस्रोतों और सरोवरों के सूख जाने से जलसंकट पैदा हो जाता है। चूंकि इन जगहों पर पानी जमीन के भीतर से नहीं निकाला जा सकता, मैदानी इलाकों से पंप करके भी नहीं पहुंचाया जा सकता, इसलिए स्थानीय जलाशयों के सूखने पर वहां की जलापूर्ति प्राय: ठप्प पड़ जाती है। ऐसे में अगर हजारों-लाखों सैलानी भी आ पहुंचें तो हालात खराब हो जाती है।
स्थानीय कारणों को छोड़ दें और पर्यटन में इसका मर्ज खोजें, तो असल में समस्या तीन वजहों से ज्यादा बढ़ी है।

एक, ज्यादातर पर्यटक खास मौसम में ही शिमला, कुल्लू-मनाली, नैनीताल, दार्जिलिंग आदि जगहों पर पहुंचते हैं। गरमी में जब स्कूलों में छुट्टियां होती हैं तो अभिभावक अपने बच्चों के संग ऐसी ही ठंडी जगहों का रुख करते हैं, जहां इन तारीखों में सारे होटल बुक होते हैं और इन पर्वतीय शहरों में पांव रखने की जगह नहीं होती। पर मामला सिर्फ गरमी की छुट्टियों का नहीं है। छब्बीस जनवरी, पंद्रह अगस्त, होली, दिवाली, ईद, क्रिसमस जैसे तमाम मौकों पर अब आम शहरों की भी थोड़ी-बहुत घूमने-फिरने वाली दिल-बहलाव की जगहों और शॉपिंग मॉलों पर भारी भीड़ पहुंचने लगी है। इस साल दिल्ली में ही नए साल से लेकर छब्बीस जनवरी आदि सार्वजनिक छुट्टी के मौकों पर मेट्रो से लेकर इंडिया गेट तक पर जिस तरह भीड़-भड़क्का हुआ और उसे संभालने में प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए, उससे साबित हुआ है कि अब लोग घर से निकलने का कोई मौका मिलते ही उन मशहूर जगहों पर जाकर टूट पड़ते हैं, जहां पहुंचना प्राय: आसान होता है और जहां टिकट आदि खरीदने की ज्यादा झंझट नहीं है। ऐसी ही भीड़ दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले व्यापार मेले और पिछले कुछ वर्षों से इसके नजदीक ग्रेटर नोएडा में आयोजित होने वाले ऑटोएक्सपो में होने लगी है, जहां की टिकट दरें अच्छी-खासी महंगी होती हैं। ताजमहल को भीड़ के कारण फर्श गंदा होने के अलावा कई और नुकसान होने की बात कही है, जिसके लिए अब दर्शकों की तादाद सीमित की जा रही है। पर सवाल है कि क्या भीड़-प्रबंधन का यह तरीका अब सभी पर्यटन स्थलों पर आजमाया जाएगा।

दूसरी बात कि जब सारे लोग अगर चंद मशहूर जगहों को ही भ्रमण के लिए चुनेंगे तो कितने ही इंतजाम क्यों न किए जाएं, उनके छोटे पड़ जाने का खतरा हमेशा मौजूद रहेगा। एक अनुमान यह है कि हरिद्वार-ऋषिकेश जाने वाले सैलानियों (इन्हें श्रद्धालु कहना ज्यादा उचित होगा) में से करीब अस्सी प्रतिशत इन दो जगहों को छोड़ कर आगे नहीं बढ़ते। यानी चारधाम यात्रा पर नहीं जाते, औली, हरकी दून, फूलों की घाटी, पौंटा साहिब, हेमकुंट साहिब, लैंसडाउन, अल्मोड़ा, रानीखेत, कौसानी, नग्गर (हिमाचल प्रदेश) और दूसरी कम चिह्नित, कम चर्चित जगहों की ओर नहीं बढ़ते।

आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा

हमारे देश में धर्मस्थलों की आध्यात्मिक ब्रांडिंग एक नए मुद्दे की तरह इधर चर्चा में आई है। इस साल उत्तर सरकार ने एक दस्तावेज में सवाल उठाया था कि हरिद्वार या वाराणसी की तरह भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या एक ‘बड़ा आध्यात्मिक ब्रांड’ क्यों नहीं बन पाई। सरकार को इसका अफसोस है कि अध्यात्म का प्रमुख केंद्र होने के बावजूद अयोध्या को ‘ब्रांड इक्विटी’ के रूप में प्रदर्शित नहीं किया जाता। इसका नुकसान यह है कि अयोध्या में विदेशी पर्यटकों की कोई खास दिलचस्पी नहीं पैदा हो पाई है। इस किस्म की ब्रांडिंग के लिए यूपी सरकार ने एक पहल की थी। अयोध्या को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए एक केंद्र के रूप में प्रचारित करने के लिए एक सलाहकार नियुक्त किया। सलाहकार की राय पर कराए गए विश्लेषण से पता चला कि 2017 में 1.7 करोड़ पर्यटक अयोध्या आए थे, जिनमें से केवल चौबीस हजार विदेशी थे। मालूम चला कि अयोध्या में आने वाले अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या बहुत कम है। अहम खामी यह नजर आई है कि अयोध्या को हरिद्वार या वाराणसी की तरह एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ब्रांड के तौर पर नहीं लिया जाता। ऋषिकेश भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान, योग और साधना का अहम आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है, लेकिन यह ख्याति अन्य तीर्थों को प्राप्त नहीं है। अयोध्या की तरह केदारनाथ और बदरीनाथ का महत्त्व बताने और उन्हें आध्यात्मिक ब्रांड बनाने की भी बात कही जा रही है।

असल में, इस पहलकदमी के पीछे मकसद यह है कि देश अपने आर्थिक विकास के लिए धार्मिक पर्यटन को मुख्य एजेंडे में ले आए। इस पूरे प्रकरण में हैरानी वाला पहलू यह है कि एक ओर सरकारें आध्यात्मिक पर्यटन की ब्रांडिंग पर विचार कर रही हैं, तो दूसरी तरफ देश में ज्यादातर धर्मस्थल वित्तीय गड़बड़ियों के शिकार रहे हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो जब भी सरकार इनके ट्रस्टों और बोर्डों पर अंकुश लगाने की कोशिश करती है, वे इसे धार्मिक आस्था में दखल का मामला बता कर खारिज करने की कोशिश करते हैं। पर सवाल है कि क्या वे इस पैसे का कोई इस्तेमाल आने वाले श्रद्धालुओं की सहूलियत के संबंध में करते हैं? इस संबंध में ज्यादातर ट्रस्टों और धार्मिक बोर्डों का रिकॉर्ड खराब ही है। चढ़ावे के गलत इस्तेमाल, मंदिर की देखरेख में खामियों और आने वाले यात्रियों की सहूलियतों का कोई इंतजाम नहीं होने के आरोप जब-तब मंदिरों की प्रबंध समितियों और ट्रस्टों पर लगते रहे हैं।

ऐसी जगहों पर चिकित्सीय सुविधाओं का न होना सबसे अहम समस्या है। हरिद्वार में हर की पैड़ी, राजस्थान में पुष्कर तीर्थ, दक्षिण में सबरीमाला मंदिर, यूपी में पूर्णागिरी मंदिर आदि दर्जनों ऐसे तीर्थ और धार्मिक स्थल हैं, जहां पूरे साल लोगों का तांता लगा रहता है, लेकिन प्राय: इन सभी जगहों पर आने वाले यात्रियों की संख्या के लिहाज से चिकित्सा के प्रबंध नहीं होते। प्राय: ज्यादातर श्रद्धालु बुजुर्ग होते हैं, जिन्हें पहाड़ों पर चढ़ते वक्त हृदय संबंधी समस्या हो जाना आम बात है। अगर चढ़ाई के समय ऐसी कोई समस्या पैदा हो जाए, तो वहां भूले-भटके उपलब्ध होने वाले चिकित्सकों के पास गिनीचुनी दर्द निवारक दवाएं ही होती है। य्प्रशिक्षित डॉक्टरों के नाम पर केवल नौसिखिए कंपाउंडर आदि रहते हैं। ज्यादातर तीर्थस्थलों पर गंदगी होना भी एक अहम समस्या है। इससे हवा और पानी काफी हद तक प्रदूषित हो जाता है। पुष्कर जैसे पवित्र तीर्थों में जब एक साथ हजारों लोग एक ही सरोवर में स्नान करते हैं, तो उन्हें एक दूसरे से त्वचा और अन्य संक्रामक बीमारियां होने का खतरा रहता है। लाखों-करोड़ों का चढ़ावा हासिल करने वाले धार्मिक ट्रस्टों का साफ-सफाई के मामले में भी लचर रवैया शायद इसलिए कायम है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यात्रियों की सहूलियत का जिम्मा उठाना उनका नहीं, प्रशासन का सिरदर्द है।

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