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योग दर्शन: प्राणोजस क्रिया

प्राणोजस क्रिया शरीर में प्राणशक्ति को बढ़ाकर शरीर के प्रत्येक अंग को नई ऊर्जा प्रदान करती है। शरीर के अंदर जो भी दूषित मानसिकता और भावनात्मक अशुद्धि है, वह उसे निकालकर रिक्त स्थान पैदा करती है। रिक्त स्थान पैदा होने के बाद प्राणोजस क्रिया के द्वारा शरीर में गहराई तक ‘ओज’ (लाइफ एनर्जी) दौड़ने लगती है।

yog, yog darshan, yoga and pranayamप्राणोजस क्रिया प्राण की एक प्रक्रिया है जिसको प्रतिदिन आठ से दस मिनट करने से प्रतिरोधक प्रणाली को अत्यधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है।

डॉ. वरुण वीर
आधुनिक समाज में पूरा जीवन उस सड़क पर दौड़ता जा रहा है, जिसकी कोई मंजिल नहीं है। असंयमित भोजन, असंयमित नींद, काम का अत्यधिक दबाव, दांपत्य जीवन में कलह, असंतोषी जीवन, कम समय में बहुत कुछ पाने की लालसा, यहां तक कि शरीर-प्राण-मन सब रोगी हो चुके हैं लेकिन फिर भी सुख को पाने की दौड़ जारी है। ऐसे में सवाल है कि सुख क्या है और कैसे मिलेगा? शरीर को सुखी बनाने के लिए मनुष्य ने सभी साधन तो जुटा लिए हैं लेकिन वह उन साधनों को भोगने के बाद भी हमेशा रोग और मानसिक तनाव में ही डूबा रहता है।

यह मानसिक तनाव कामकाजी स्त्री-पुरुष को ही नहीं, स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों व बुजुर्गों को भी हो रहा है। इस अस्त-व्यस्त जीवन ने हमारे स्नायु तंत्र तथा प्रतिरोधक प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कमजोर कर दिया है। आज हम देख रहे हैं कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है, वही करोना या अन्य बीमारियों की चपेट में अधिक आ रहा है। यहां तक कि अपने जीवन को भी खो बैठता है।

प्राणोजस क्रिया
प्राणोजस क्रिया प्राण की एक प्रक्रिया है जिसको प्रतिदिन आठ से दस मिनट करने से प्रतिरोधक प्रणाली को अत्यधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इसके माध्यम से जो हम प्राणशक्ति (लाइफ एनर्जी) लेते हैं, उसको अधिक से अधिक अपने शरीर के भीतर भरकर शरीर के प्रत्येक अंग, यहां तक कि प्रत्येक कोशिका तक पहुंचाने से हमारा स्नायु तंत्र सुदृढ़ बनता है। प्राणोजस क्रिया, मुद्राओं तथा बंध का प्रयोग एवं पूर्ण विश्राम के माध्यम से प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करना सरल है।

प्राणोजस क्रिया शरीर में प्राणशक्ति को बढ़ाकर शरीर के प्रत्येक अंग को नई ऊर्जा प्रदान करती है। शरीर के अंदर जो भी दूषित मानसिकता और भावनात्मक अशुद्धि है, वह उसे निकालकर रिक्त स्थान पैदा करती है। रिक्त स्थान पैदा होने के बाद प्राणोजस क्रिया के द्वारा शरीर में गहराई तक ‘ओज’ (लाइफ एनर्जी) दौड़ने लगती है। यह क्रिया करने के बाद शरीर, प्राण तथा मन में संतुलन स्थापित होता है। मन को गहरी शांति का आनंद मिलता है।

प्राणोजस क्रिया में बंधों का प्रयोग
इस क्रिया की एक स्थिति में तीनों बंध का तथा एक स्थिति में दो बंध का प्रयोग किया जाता है। बंध तीन प्रकार के हैं- मूल बंध जालंधर बंध और उड्डियान बंध।

मूल बंध : गुदाद्वार का संकुचन कर उसे नाभि की ओर खींचना और यथाशक्तिरोककर रखना। यह बंध करते समय कई बार साधक जांघों और नितंब की मांसपेशियों का भी संकुचन कर लेता है जो कि नहीं करना है। केवल गुदाद्वार का संकुचन कर ऊपर की ओर खींचना है अर्थात गुदाद्वार को बंद कर ऊपर की ओर खींचना है।

जालंधर बंध : कमर सीधी रखते हुए सिर को नीचे की ओर झुकाना है और ठोड़ी को छाती से लगा देना है अर्थात गर्दन को आगे झुका कर विशुद्धि चक्र को दबाना है, जिससे कि सांस न अंदर जाए, न बाहर आए।

उड्डियान बंध : इसमें सांस पूरी तरह से बाहर निकाल कर पेट अंदर खींच लेना होता है और इतना खींचे कि साधक की पसलियां दिखने लगे। पद्मासन, स्वस्तिक आसन, सिद्धासन या सुखासन में इस क्रिया को करने से अधिक लाभ मिलता है। कुर्सी पर बैठकर या ऐसी स्थिति में जहां साधक के पैर नीचे की ओर लटके हुए होते हैं, वैसे में लाभ कम मिलता है। प्रात: चार बजे से लेकर छह बजे तक और शाम पांच बजे से लेकर सात बजे तक इस क्रिया को करने का समय अच्छा है।

मौसम के अनुसार समय को थोड़ा बहुत परिवर्तित किया जा सकता है। यदि निर्देशित समय में यह क्रिया नहीं होती है तो इस क्रिया को कभी भी किया जा सकता है लेकिन तब लाभ कम मिलेगा। यह क्रिया करते समय पेट बिल्कुल साफ होना चाहिए। ध्यान रहे कि शाम को यह क्रिया करते समय भोजन तथा क्रिया करने में लगभग तीन घंटे का अंतर होना जरूरी है अर्थात करने से पहले तीन घंटे तक आपने कुछ भी न खाया-पिया हो

सावधानियां
अगर आप हृदय रोगी हैं या उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन की समस्या है तो इस क्रिया को बंध के साथ न करें तथा कुंभक भी उतना ही करें जिससे कि बेचैनी महसूस न हो।

विधि
पद-1 : एकांत शांत स्थान में आसन लगाकर मन को चारों तरफ से खींचकर केवल श्वांस पर लगा दें। 11 बार गहरी और लंबी श्वांस लें। श्वाांस की गति इतनी धीमी रखें कि अपने आप के श्वांस की आवाज भी सुनाई न दे।

पद-2 : श्वांस को शरीर के बाहर निकालकर तीनों बंधों- मूल बंध, जालंधर बंध तथा उड्डियान बंध का प्रयोग करें। आरंभ में 20 सेकंड श्वांस को बाहर ही रोकें और साथ ही तीनों बंधों का प्रयोग भी करें।
बीस सेकंड रुकने के बाद धीरे-धीरे श्वांस को भीतर भरते हुए तीनों बंधों को खोल दें और श्वांस गहरा लंबा अंदर भरकर 30 सेकंड रुकें। इस स्थिति में केवल दो बंधों- मूल बंध और जालंधर बंध का प्रयोग करें। यह 50 सेकंड का एक चक्र हुआ।

इसी प्रकार से बिना रुके तीन चक्र करने हैं। श्वांस बाहर निकालकर 20 सेकंड रुकना है। श्वांस अंदर भरकर 30 सेकंड रुकना है। यह एक चक्र हुआ। इस प्रकार से तीन चक्र पूरा करें। इस क्रिया को करते समय ध्यान मूल बंध पर लगा कर रखें और अन्य बंधों का प्रयोग साथ ही साथ करें। मूल बंध पर ध्यान लगाने से श्वांस अंदर और बाहर दोनों ही जगह अधिक देर तक रुक सकता है।

पद-3 : पद-2 जैसे ही समाप्त होता है तुरंत बिना रुके श्वांस-प्रश्वांस की तीव्र गति आरंभ करनी है। इस स्थिति में श्वांस गहरा बिल्कुल नहीं रखना है। इसमें रेल के इंजन की तरह श्वांस की गति अत्यंत तीव्र रखनी है।

प्राण ओजस क्रिया का यह भाग लगभग दो से तीन मिनट तक करना है तथा अंत में श्वांस बिल्कुल धीरे शांत छोड़ दें। इस क्रिया में जब श्वांस-प्रश्वांस करें तब अधिक दबाव फेफड़ों पर होना चाहिए।

इस क्रिया में प्राण की ऊर्जा अत्यधिक बढ़ जाती है जिससे कि शरीर में पसीना या फिर गर्मी पैदा होती है जो कि शरीर के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने में सहायक होती है। केवल नकारात्मक ऊर्जा ही नहीं, नकारात्मक विचारों को भी यह क्रिया मन से बाहर निकाल कर मन में ठहराव तथा शांति स्थापित करती है।

प्रतिदिन यह क्रिया करने से दस दिन के अंदर आप अपने शरीर में बड़ा ही सकारात्मक परिवर्तन महसूस करेंगे। इसका लाभ पहले दिन से ही आपको देखने को मिलेगा।

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