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‘चिंता’ कॉलम में प्रमोद भार्गव का लेख : पानी की लूट की छूट

आर्थिक उदारवाद के तहत वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के मकसद से भारत की नीतियां लचीली और भ्रामक बनाई गई हैं।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 3:35 AM
(Express Photo by Partha Paul, Dhumchipara. 11.11.2015)

देश में चहुंओर भयावह जलसंकट है। महाराष्ट्र का मराठवाड़ा और विदर्भ, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका पानी के जबरदस्त संकट से जूझ रहा है। लातूर में पानी रेल से भेजा जा रहा है। शायद देश में ऐसा पहली बार हुआ कि जब क्रिकेट के लिए खेल मैदानों पर खर्च होने वाले पानी और शराब उद्योग की जलापूर्ति बंद करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इस बीच बीच पानी के अप्रत्यक्ष या कहें अदृश्य निर्यात का मुद्दा लगभग अछूता सा है।

जबकि खेती और कृषिजन्य औद्योगिक उत्पादों से जुड़ा यह ऐसा मुद्दा है, जिसकी अनदेखी के चलते पानी का बड़ी मात्रा में निर्यात हो रहा है। दरअसल, भारत से बड़ी मात्रा में चावल, चीनी, वस्त्र, जूते-चप्पल और फल और सब्जियां निर्यात होते हैं। इन्हें तैयार करने में बड़ी मात्रा में पानी खर्च होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमारे यहां बोतलबंद पानी के संयंत्र लगा रखे हैं, वे भी इस पानी को बड़ी मात्रा में अरब देशों को निर्यात कर रही हैं। इस तरह से निर्यात किए जा रहे पानी पर अगर लगाम नहीं लगाई जाती तो पानी का संकट और बढ़ेगा ही ?

आमतौर पर यह भुला दिया जाता है कि ताजा और शुद्ध पानी तेल और लोहे जैसे खनिजों की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है, क्योंकि पानी परिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में बीस हजार डॉलर प्रति हेक्टेअर की दर से सर्वाधिक योगदान करता है। इस लिहाज से भारत से कृषि और कृषि उत्पादों के जरिए पानी का जो अप्रत्यक्ष निर्यात हो रहा है, वह हमारे भूतलीय और भूगर्भीय दोनों ही प्रकार के जल भंडारों का दोहन करने का बड़ा सबब बन रहा है।

दरअसल, एक टन अनाज उत्पादन में एक हजार टन पानी की जरूरत होती है। चावल, गेहूं और गन्ने की खेती में सबसे ज्यादा पानी खर्च होता है। इन्हीं का हम सबसे ज्यादा निर्यात करते हैं। 2015 में 27 लाख टन चावल, 39 लाख टन चीनी, और 25.97 लाख टन गेहूं निर्यात किया गया। पंजाब में एक किलोग्राम धान पैदा करने में 5389 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि इतना ही धान पैदा करने में पश्चिम बंगाल में 2713 लीटर पानी खर्च होता है। पानी की इस खपत में इतना बड़ा अंतर इसलिए है, क्योंकि पूर्वी भारत की अपेक्षा उत्तरी भारत में तापमान अधिक रहता है। इस कारण बड़ी मात्रा में पानी का वाष्पीकरण हो जाता है। खेत की मिट्टी और स्थानीय जलवायु भी पानी की कम-ज्यादा खपत से जुड़े हैं। इसी तरह चीनी के लिए गन्ना उत्पादन में बड़ी मात्रा में पानी लगता है। गेहूं की अच्छी फसल के लिए भी तीन से चार मर्तबा सिंचाई करनी होती है।

इतनी तादाद में पानी खर्च होने के बावजूद चावल, गेहूं और गन्ने की बड़ी मात्रा में खेती इसलिए की जाती है, जिससे फसल का निर्यात करके मोटा मुनाफा कमाया जा सके। पंजाब व हरियाणा में चावल और गेहूं और महाराष्ट्र में गन्ने की बड़ी मात्रा में उत्पादन निर्यात के लिहाज से ही किया जाता है। हमारे यहां अगर पानी का दुरुपयोग न हो तो उपलब्धता कम नहीं है। भूतलीय जलाशय,नदियों और भूगर्भीय भंडारों में अभी भी पानी है। इन्हीं स्रोतों से पेयजल, सिंचाई और पनबिजली परियोजनाएं व उद्योगों के लिए जल की आपूर्ति हो रही है। सबसे ज्यादा 70 प्रतिशत जल सिंचाई में खर्च होता है। उद्योगों में 22 फीसद और पीने से लेकर अन्य घरेलू कार्यों में 8 फीसद जल खर्च होता है। लेकिन नदियों व तालाबों की जल संग्रहण क्षमता लगातार घटने और सिंचाई व उद्योगों के लिए दोहन से सतह के ऊपर और नीचे जल की मात्रा लगातार छीज रही है। ऐसे में फसलों के रूप में जल का हो रहा अदृश्य निर्यात समस्या को और विकराल बनाने का काम कर रहा है।

पानी का अप्रत्यक्ष निर्यात न हो इसके लिए फसल प्रणाली में व्यापक बदलाव और सिंचाई में आधुनिक पद्धतियों को अपनाने की जरूरत है। ऐसा अनुमान है कि धरती पर 1.4 अरब घन किलोमीटर पानी है। लेकिन इसमें से महज दो फीसद पानी मनुष्य के पीने और सिंचाई के लायक है। इसमें सत्तर फीसद खेती-किसानी में खर्च होता है। इससे जो फसलें व फल-सब्जियां उपजते हैं, निर्यात के जरिए 25 प्रतिशत पानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खपत हो जाता है। इस तरह से 1050 अरब वर्ग मीटर पानी का अप्रत्यक्ष कारोबार होता है। एक अनुमान के मुताबिक इस दुनिया में इस धंधे में लगभग दस हजार करोड़ घन मीटर वार्षिक जल भारत से फसलों के रूप में निर्यात होता है। जल के इस अप्रत्यक्ष व्यापार में भारत दुनिया में अव्वल है। खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों और चमड़ों के रूप में यह निर्यात सबसे ज्यादा होता है।

कई देश पानी के इस अप्रत्यक्ष निर्यात से बचने के लिए उन कृषि और गैरकृषि उत्पादों का आयात करने लगे हैं, जिनमें पानी अधिकतम खर्च होता है। उन्नत सिंचाई की तकनीक के लिए दुनिया में पहचान बनाने वाले इजराइल ने संतरे के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है, क्योंकि इस फल के जरिए पानी का अप्रत्क्ष निर्यात हो रहा था। इटली ने चमड़े के परिशोधन पर पाबंदी लगा दी है। इसके बदले वह जूते-चप्पल बनाने के लिए भारत से बड़ी मात्रा में परिशोधित चमड़ा आयात करता है।

फसल प्रणाली में बदलाव की दृष्टि से देश का पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां नीतिगत बदलाव शुरू हुए हैं। वहां धान का रकबा घटाया जा रहा है। राज्य सरकार ने करीब बारह लाख हेक्टेअर कृषि में धान की बजाय मोटे अनाज और दालें बोने के लिए 7.5 हजार करोड़ रुपए की योजना शुरू की है। सरकार ने धान की खेती वर्षा पूर्व करने पर भी पाबंदी लगा दी है। इससे राज्य को एक साथ दो फायदे होंगे। एक तो भूजल का दोहन घटेगा, दूसरा मई में धान की रोपाई पर रोक से बिजली की बचत होगी। फिलहाल पंजाब में अट्ठाईस लाख हेक्टेअर भूमि में धान होता है, इसे अगले पांच साल में सोलह लाख हेक्टेअर तक समेटने का लक्ष्य है। बाकी बची बारह लाख हेक्टेअर भूमि में दालें, तिलहन, मक्का, ज्वार और शुष्कफसलें पैदा की जाने की शुरुआत हो रही है। साफ है पंजाब में चावल का उत्पादन घटेगा तो निर्यात भी घटेगा और निर्यात घटेगा तो अप्रत्यक्ष पानी के निर्यात पर भी लगाम लगेगी।

फसल प्रणाली में बदलाव के साथ, पानी के उपयोग में दक्षता भी बढ़ाने की जरूरत है। सिंचाई के जो मौजूदा संसाधन और तकनीकें हैं, उनसे सिंचाई के लिए जल का प्रयोग करने में करीब पच्चीस से चालीस फीसद पानी ही वास्तविक रूप में काम आता है, बाकी बर्बाद हो जाता है। सिंचाई जल की क्षमता और उत्पादकता सिंचाई प्रणाली और परिस्थितयों से तो तय होता ही है, तापमान, आर्द्रता, मिट्टी के प्रकार और छाया पर भी बहुत कुछ निर्भर रहती है। जंगलों के घटने व खेत की मेड़ों और मार्गों पर खड़े पेड़ काट दिए जाने से ज्यादातार कृषि क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पानी भाप बनाकर उड़ जाता है।

हमारे यहां पारंपरिक तरीकों में नहरों और नलकूपों से पाइप लाइन बिछाकर खेतों की सिंचाई की जाती है। लेकिन अब बदलते परिदृश्य में फौव्वारों, ड्रिप और स्ंिप्रकलर तकनीकों को अपनाने की जरूरत है। इनसे तीस से पचास फीसद तक पानी की बचत होती है। साइप्रस, इजराइल और जॉर्डन जैसे छोटे देशों ने लगभग समूची खेती के लिए ये प्रणालियां अपना ली हैं। भारत में भी इन पद्धतियों से खेती करने की शुरुआत तो हो गई है, लेकिन अभी महज तीन फीसद सिंचाई हो पा रही है।

अ गर इनका विस्तार एक करोड़ हेक्टेअर कृषि क्षेत्र में हो जाए तो भारत बड़ी मात्रा में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले जल की बचत कर सकता है। पानी के अप्रत्यक्ष निर्यात के साथ बोतल बंद शीतल पेय बनाने वाली कंपनियां जल का प्रत्यक्ष निर्यात भी कर रही हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के अलावा अरब देशों में बोतलबंद पानी बड़ी मात्रा में निर्यात हो रहा है।
2013 में देश में इस पानी का कारोबार 60 अरब रुपए था, जो अब बढ़कर 150 अरब रुपए का हो गया है। इसमें 22 फीसद की दर से सालाना इजाफा हो रहा है।

शत-प्रतिशत निजी क्षेत्र के सुपुर्द यह धंधा कम लागत और ज्यादा मुनाफे के लिहाज से बेहद आकर्षक है। लेकिन इसका खामियाजा देश कई रूपों में उठा रहा है। बोतलबंद पानी के जहां-जहां संयंत्र लगे हैं, वहां-वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियां पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रख कर जल का दोहन तो कर ही रही हैं, स्थानीय लोगों और मवेशियों को भी जल के उपयोग से वंचित कर रही हैं।

आर्थिक उदारवाद के तहत वैश्विक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के मकसद से भारत की नीतियां लचीली और भ्रामक बनाई गई हैं। नतीजतन, प्राकृतिक जल को ये कंपनियां पूरी निर्ममता से निचोड़ने में लगी हैं। दरअसल, शायद भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां पानी राष्ट्रीय प्रथामिकता में है ही नहीं, इसलिए पानी का निर्यात चाहे अप्रत्यक्ष हो रहा हो या प्रत्यक्ष, देश के कर्णधारों के लिए यह चिंता का विषय है ही नहीं ? इसके उलट ऐसे उपायों की जरूर भनक मिल रही है, जिससे पानी के दोहन में निवेश बढ़े और गरीब पानी से वंचित होता चला जाए। १

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