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रविवारीय: कोख, किराया और कानून

किराए की कोख (सरोगेसी) को लेकर संसद में समय-समय पर बहस और चर्चाएं होती रही हैं। इसके लिए बने कानूनों में संशोधन भी हुए, लेकिन अभी भी देश में सरोगेसी का दुरुपयोग रुका नहीं है। सरोगेसी परोपकारी कार्य होगा या व्यावसायिक, इस पर भी बहस हुई।

Author Published on: February 16, 2020 1:08 AM
सरोगेसी की प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुजाता माथुर

सरकार ने यह महसूस किया कि देश में सरोगेसी का व्यावसायिक प्रयोग कर गरीब महिलाओं का शोषण किया जा रहा है, इसे रोकने के लिए संसदीय समिति ने अपने सुझाव दिए हैं। साथ ही करीबी रिश्तेदार होने की शर्त को खत्म करने और सरोगेसी के लिए शादी के पांच साल बाद ही मंजूरी दिए जाने की बाध्यता भी खत्म करने का सुझाव दिया गया है। अभी भी सरोगेसी कानून में और सुधार की जरूरत है। भारत में सरोगेसी को लेकर बने कानूनी सफर को विस्तार से बयां कर रही हैं सुजाता माथुर।

पांच फरवरी को स्वास्थ्य मामलों की संसदीय समिति ने भारत में सरोगेसी संबंधी विधेयक पर अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की। इस रिपोेर्ट में सरकार से कहा गया है कि वह सरोगेट महिला के संतान के इच्छुक दंपति की करीबी रिश्तेदार होने की शर्त को खत्म करे। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरोगेसी के लिए शादी के पांच साल बाद ही मंजूरी दिए जाने की बाध्यता भी नहीं होनी चाहिए। समिति ने इन दो बातों समेत विधेयक में करीब 15 बदलाव करने का सुझाव दिया है।
अपनी रिपोर्ट में इस 23 सदस्यीय समिति ने जो सुझााव दिए हंै उनमें से कुछ मुख्य सुझाव यह हैं कि भारत की नागरिक किसी भी एकल महिला चाहें वह विधवा हो या तलाकशुदा को सरोगेट मां बनने की आजादी हो और उसे मिलने वाले बीमा कवर को 16 महीने से बढ़ाकर 36 महीने किया जाए।

समिति ने इस प्रक्रिया के लिए करीबी रिश्तेदार महिला को ही चुनने की अनिवार्यता को भी हटाने की सिफारिश की है क्योंकि उसका विचार है कि इससे सरोगेट मां का मिलना कठिन हो सकता है। इसके अलावा इससे कई कानूनी और तकनीकी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। साथ ही सरोगेट मां के शादीशुदा होने की अनिवार्यता को भी समाप्त करने का सुझाव दिया है। समिति का विचार है कि जो भी इच्छुक महिला इस प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहे उसे इस कानून के प्रावधानों के तहत ऐसा करने की अनुमति होनी चाहिए। यानी सरोगेट मां बनने की अनुमति सिर्फ भारतीय मूल की किसी शादीशुदा महिला को ही नहीं बल्कि किसी भी उस विधवा अथवा तलाकशुदा महिला को भी होनी चाहिए जिसकी उम्र 35 से 45 साल के बीच हो। समिति ने इस अनिवार्यता को भी हटाने को कहा है कि संतान की इच्छुक दंपति की शादी को पांच वर्ष हो चुके हों। उसका विचार है कि पांच साल की अवधि का इंतजार करने के बाद इस प्रक्रिया के लिए आवेदन करने का प्रस्ताव दंपति की इंतजार की अवधि को बहुत ज्यादा बढ़ा देगा।

सरोगेसी के संबंध में सरकार की ओर से लाए गए सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 को पिछले सत्र में लोकसभा ने पारित कर दिया था लेकिन राज्यसभा ने इसे संसद की स्वास्थ्य मामलों की समिति के पास भेज दिया था। समिति की इस संबंध में दस बैठकें हुर्इं।

क्या है सरोगेसी : सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत कोई ऐसा दंपति जो किसी चिकित्सकीय समस्या की वजह से खुद संतान उत्पन्न करने में अक्षम हो, किसी सरोगेट मां की मदद से अपनी यह इच्छा पूरी कर सकता है। लेकिन इसके लिए उनका भारतीय नागरिक होना जरूरी है और यह भी जरूरी है कि उनकी शादी को पांच साल हो चुके हों। इसे दूसरी तरह से भी देखा जा सकता है। यानी सरोगेसी वह प्रक्रिया है जिसमें कोई महिला किसी दूसरे दंपति की संतानेच्छा पूरी करने के लिए गर्भधारण करती है लेकिन शिशु का जन्म होने के बाद उस पर उसका किसी तरह का कोई अधिकार नहीं रहता। यह प्रक्रिया अपनी प्रकृति में व्यावसायिक या परोपकारी दोनों हो सकती है।

हमारे देश में इस समय सरोगेसी के ये दोनों ही प्रकार मौजूद हैं। व्यावसायिक रूप में शिशु चाहने वाला दंपति सरोगेट मां को नकद या सहायता के रूप में भुगतान करता है और परोपकारी रूप मेंदंपति सरोगेट मां के सिर्फ चिकित्सकीय खर्च और बीमा का भुगतान करता है, उसे कोई और भुगतान नहीं करता।

अपने देश में सरोगेसी यानी किराए की कोख के मामले काफी पहले ही प्रकाश में आने लगे थे। 2005 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने भारत में सरोगेसी के बारे में कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे। इन दिशानिर्देशों में कहा गया था कि बच्चा चाहने वाले दंपति को सरोगेट मां को इस कार्य के लिए तय राशि का भुगतान करना चाहिए। इनमें यह भी कहा गया था कि सरोगेट मां को भविष्य में जन्म लेने वाले शिशु पर उसकी मां होने का दावा करने का अधिकार नहीं होगा।

2008 में सुप्रीम कोर्ट ने बेबी मांजी यमादा बनाम यूनियन आॅफ इंडिया मामले में इस बात को रेखांकित किया था कि देश में सरोगेसी के मामले में नियम कानून का अभाव है। 2009 में भारतीय विधि आयोग ने पाया कि भारत में सरोगेसी की प्रक्रिया का लाभ बड़े पैमाने पर विदेशी लोग उठा रहे हैं और इस संबंध में समुचित कायदे कानून के अभाव में गरीब महिलाओं का सरोगेट मां के तौर पर बहुत शोषण हो रहा है। इसके बाद ही विधि आयोग ने व्यावसायिक सरोगेसी के निषेध का प्रस्ताव किया और इस बारे में समुचित कायदे कानून बनाने की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप 2015 में सरकार ने विदेशी नागरिकों के लिए सरोगेसी का निषेध करने वाला एक नोटिफिकेशन जारी किया। 2016 में इस संबंध में सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2016 लोकसभा में पेश किया गया। विधेयक में इस प्रक्रिया को व्यावसायिक की जगह परोपकारी बनाने का प्रावधान किया गया था।

इच्छुक दंपति का भारतीय होना अनिवार्य : इस विधेयक के अनुसार सरोगेसी के जरिए संतान पाने के इच्छुक दंपति का भारतीय होना अनिवार्य है। सरोगेसी के लिए आवेदन करते समय उनके विवाह को पांच वर्ष पूरे हो चुके हों और उनमें से कोई एक संतान पैदा करने में अक्षम हो। पत्नी की उम्र 23 से 50 साल के बीच हो और पति की उम्र 26 से 55 साल के बीच हो। उनकी पहले से कोई संतान नहीं हो या पहले से जो संतान है वह मानसिक या शारीरिक व्याधि से या ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो जो जानलेवा हो। सरोगेट मां उनकी कोई करीबी रिश्तेदार होनी चाहिए और उसका न सिर्फ शादीशुदा होना जरूरी है बल्कि उसको एक बच्चा भी होना चाहिए। इसके अलावा उसकी उम्र 25 से 35 साल के बीच होनी चाहिए। वह पहले कभी सरोगेट मां नहीं बनी हो और शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हो। इस प्रक्रिया के लिए संतानेच्छुक दंपति को सरोगेट मां का समस्त चिकित्सकीय खर्च उठाने के साथ-साथ उसे बीमा की सुविधा भी मुहैया करानी चाहिए। इस प्रक्रिया के लिए सरोगेट मां को इसके अतिरिक्त कोई भुगतान नहीं किया जाएगा। सरोगेट बच्चा संतानेच्छुक दंपति का जैविक शिशु माना जाएगा और उसपर सरोगेट मां का किसी तरह का कोई अधिकार नहीं होगा।

विधेयक में केंद्र और राज्य सरकारों को एक सक्षम प्राधिकारी नियुक्त करने को कहा गया है जो आवेदक द्वारा प्रस्तुत उक्त तथ्यों की सत्यता को प्रामाणित कर प्रक्रिया का अनुमोदन करेगा। विधेयक के अनुसार सरोगेसी के लिए कोई शुल्क लेना या देना, सरोगेसी का विज्ञापन देना, सरोगेट मां का शोषण करना आदि दंडनीय अपराध होगा जिसके लिए दस वर्ष के कारावास की सजा और दस लाख रुपए तक जुर्माना होगा। विधेयक के अनुसार सरोगेसी की प्रक्रिया के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में उसके खिलाफ अपील भी नहीं की जा सकेगी। सरोगेट गर्भ को गिराने की स्थिति में गर्भ का चिकित्सकीय समापन कानून, 1971 के अनुरूप सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और सरोगेट मां की सहमति भी जरूरी होगी लेकिन इसमें संतानेच्छुक दंपति की सहमति असहमति की जरूरत नहीं होगी।

गरीब महिलाओं के शोषण को रोकने का प्रयास : सरकार ने हालांकि इस विधेयक के जरिए देश में सरोगेसी की आड़ में हो रहे गरीब महिलाओं के शोषण और इस प्रक्रिया के एक व्यवसाय के रूप में फलने-फूलने की स्थिति पर लगाम लगाने की कोशिश की है, लेकिन देश में कुछ निहित स्वार्थी तबके ऐसे हैं जो इस प्रयास को नेस्तनाबूद करने के लिए कमर कसे तैयार हैं। शायद यही वजह है कि यह विधेयक 2016 से ही बार-बार संसद में लाया जाता रहा लेकिन किसी न किसी वजह से पारित नहीं हो पा रहा है। ०

अभी और तैयारी की जरूरत: एडवोकेट अनुजा कपूर सरोगेसी को औरतों पर एक और प्रताड़ना बताती हैं। वे सरोगेसी के बजाए आइवीएफ और अडोप्शन (गोद लेना) को बढ़ावा देने की बात करती हैं। वे कहती हैं कि आज भारत में कई बच्चे ऐसे हैं जो मां का आंचल चाहते हैं, लेकिन उन्हें कोई गोद नहीं ले रहा है। अनुजा बताती हैं कि सरोगेसी संबंधी कानून के गलत इस्तेमाल पर सरकार ने सजा का प्रावधान तो रखा है लेकिन कोई लड़की कैसे साबित करेगी कि उसके साथ कुछ गलत हुआ है। सरोगेसी के लिए पूरा पैटर्न बनाना होगा। सिर्फ कानून बनाकर काम नहीं होगा।

अनुजा कहती हैं कि सरोगेसी के लिए कोई क्लिनिक नहीं है। सरोगेट मां की काउंसलिंग भी होनी चाहिए। उसका भी कोई प्रावधान नहीं है। अनुजा कहती हैं कि सीमित समय के लिए सरोगेट मां को आर्थिक मदद करने से उस औरत को वापस उसकी पहले वाली स्थति में पहुंचाना आसान नहीं है। इसकी कोई व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। वे कहती हैं कि सरोगेट मां के अधिकार कहां हैं। सरोगेसी संबंधी कानून में ज्यादातर अधिकार तो बच्चा चाहने वाले दंपति के हैं। अनुजा कहती हैं कि सरोगेसी का संबंध सिर्फ तलाकशुदा, विधवा या रिश्तेदार के बच्चा पैदा करने का नहीं है बल्कि ये बच्चा और मां के बीच की बात है। क्या मां और बच्चे के सभी अधिकारों को ध्यान में रखा जा रहा है।

साथ ही अनुजा कहती हैं कि समिति ने तलाकशुदा, विधवा और एकल महिला को भी सरोगेट मदर बनने की बात कही है। इससे यही जाहिर होता है कि सरकार महिलाओं के रोजगार के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं कर रही है बल्कि उन्हें फिर से बच्चा पैदा करने की मशीन ही बना रही है। वे कहती हैं कि पूरी व्यवस्था ही पितृसत्तात्मक है तो महिलाओं के साथ कितना न्याय हो पाएगा। अनुजा कहती हैं कि बच्चा पैदा करना एक गंभीर सहमति का मामला है जिसे सरोगेसी संबंधी कानून के अनुसार बहुत कैजुअल मान लिया गया है। अनुजा के मुताबिक देश में आइवीएफ और अडोप्शन को बढ़ावा मिलना चाहिए। अनुजा कहती हैं कि कोई भी कानून मानवाधिकार, मां और बच्चे के मौलिक अधिकार आदी को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए।

अनुजा के मुताबिक, सरोगेसी को लेकर 2016 के बिल में जो खामियां थीं, वही 2019 में भी हैं। वे कहती हैं कि 2016 में सरोगेसी के व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की बात की गई थी। और इसे परोपकारी कार्य कहा था। अब जो सुझाव दिए जा रहे हैं उनमें सरोगेसी को व्यावसायिक न होने पर तो जोर है और साथ ही महिला को सीमित समय तक के लिए चिकित्सकीय खर्च की भी बात है, लेकिन एक महिला जो मां बन रही है, उसके मां बनने के बाद भी शरीर में बहुत से बदलाव आते हैं। प्रेगनेंसी के बाद अन्य कई समस्याएं होती हैं, उस पर ध्यान नहीं दिया गया।

ये बात सिर्फ उसका खर्च उठाने की नहीं है बल्कि उसकी भावनात्मक मानसिक स्थिति की भी है। अनुजा बताती हैं कि इंडियन काउंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) ने सरोगेसी मामले के नियमन की भी बात की थी और उन्होंने असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) बिल लाने का सुझाव दिया था, जिससे एआरटी क्लिनिक के तहत सरोगेसी का विकल्प दिया जा सके, लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। अनुजा सवाल कहती हैं कि ये एआरटी क्लिनिक भारत में कितने हैं। एआरटी को ठीक से लागू किया जाना चाहिए। अनुजा कहती हैं कि अगर कोई दंपति बाद में बच्चा नहीं लेना चाहता तो सेरोगेट मदर के पास क्या कानून है। इन सभी बिंदुओं पर भी सरकार को सोचना चाहिए।

विदेशों में अलग है तस्वीर: अन्य देशों के साथ तुलना करने पर हम देखते हैं कि भारत की ही तरह नीदरलैंड, युनाइटेड किंगडम (यूके), दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस, यूनान में भी सरोगेसी की यह प्रक्रिया व्यावसायिक नहीं है। दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस में सरोगेट मां के लिए चिकित्सकीय खर्च और बीमा की व्यवस्था के अलावा उसे किसी तरह का भुगतान नहीं किया जाता, जबकि यूके और नीदरलैंड में इस पर उचित या वाजिब खर्च किया जाता है। रूस में इसके व्यावसायिक उपयोग की अनुमति है। यूके में किसी जोडेÞ को सरोगेसी के लिए चिकित्सकीय अनिवार्यता होना जरूरी नहीं है। वहीं, भारत के अलावा उक्त देशों में संतानेच्छुक जोड़े का शादीशुदा होना भी जरूरी नहीं। इन देशों में सरोगेट मां कोई भी हो सकती है उसका संतान चाहने वाले दंपति की करीबी रिश्तेदार, शादीशुदा या एक बच्चे की मां होना जरूरी नहीं।

यूके, दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस में सरोगेट मां की उम्र की भी कोई सीमा नहीं है, जबकि नीदरलैंड में उसे अधिकतम 44 वर्ष का होना चाहिए। इस विधेयक के अनुसार भारत में जहां कोई महिला जीवन में सिर्फ एक ही बार सरोगेट मां बन सकती है। वहीं, इन देशों में इसके लिए कोई सीमा नहीं है। भारतीय विधेयक में हालांकि सरोगेट मां का शादीशुदा होना जरूरी है लेकिन सरोगेसी के लिए उसके पति की सहमति या असहमति लेने का कोई जिक्र नहीं है लेकिन दक्षिण अफ्रीका और ग्रीस में वह जरूरी है जबकि यूके और नीदरलैंड में इसे जरूरी नहीं माना गया है। कानून के उल्लंघन की सूरत में जहां भारत में दस वर्ष कारावास का प्रावधान है वहीं, नीदरलैंड में अधिकतम एक साल यूके में अधिकतम तीन महीने, ग्रीस में अधिकतम दो साल और दक्षिण अफ्रीका में अधिकतम दस साल की सजा का प्रावधान है, लेकिन रूस में इसके लिए सजा का कोई प्रावधान ही नहीं है।

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