ताज़ा खबर
 

मुद्दाः समाज में बुजुर्गों की जगह

प्राय: देखा जाता है कि हमारे समाज में बुजुर्गों की स्थिति सम्मानजनक न होने का एक बड़ा कारण ‘झूठी इज्जत’ है।

नई पीढ़ी के भीतर भी बड़े बूढ़ों के लिए सम्मान और प्रेम की भावना जगाने के लिए समाज में विभिन्न संस्थाओं, संगठनों को बढ़-चढ़ कर कार्य करना चाहिए।

भावना सरोहा

प्राय: देखा जाता है कि हमारे समाज में बुजुर्गों की स्थिति सम्मानजनक न होने का एक बड़ा कारण ‘झूठी इज्जत’ है। इसी कारण उनकी संतानों में उनके प्रति बदसलूकी करने की हिम्मत बढ़ जाती है। चीन के शांघाई शहर से सीख लेनी चाहिए, जहां वृद्ध माता-पिता के साथ अगर उनकी संतान किसी भी प्रकार की ज्यादती करती है और वृद्ध उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करते हैं, तो संतान की ‘क्रेडिट रिपोर्ट’ पर असर पड़ता है। उन्हें किसी भी प्रकार का कर्ज या वित्तीय सुविधा लेने में कठिनाई आती है। इसी कारण वहां बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं बहुत कम होती हैं। हाल में हेल्प-एज इंडिया का एक सर्वे आया है, जिसमें सभी राज्यों में से दिल्ली मात्र एक ऐसा राज्य है, जहां बुजुर्गों के साथ सबसे कम बदसलूकी होती है।

इसका एक कारण यह है कि यहां बुजुर्ग अपनी सुरक्षा को लेकर ज्यादा सचेत हैं। चाहे हम बुजुर्गों की सुरक्षा की बात करें या उनके सम्मान या उनकी देखभाल की; यह इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपनी सुरक्षा के प्रति कितने सचेत हैं, अपने अधिकारों के बारे में कितनी जानकारी रखते और आर्थिक रूप से कितने सशक्त हैं। अगर इन चीजों का अभाव है, तो कुछ बचे-खुचे ‘श्रवणकुमार’ ही हैं, जो अपने मां-बाप की आज निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। कई बार देखा गया है कि अपनी वृद्धावस्था की तैयारी न करने की वजह से व्यक्ति अपने अंतिम पड़ाव पर कष्ट झेलता है। कई घरों की कहानी है कि जब सास-ससुर सक्षम होते हैं, तो बहू के साथ सहज व्यवहार नहीं करते और अंत में जब बहू पर निर्भर रहना पड़ता है तो बहू भी उनकी कुछ खास इज्जत नहीं करती है।

कई बार बेटी को बहू से ज्यादा तवज्जो देने की वजह से भी मां-बाप बहू-बेटे से दूर हो जाते हैं। कई बार बेटी के शादीशुदा जीवन में मां-बाप का हद से ज्यादा हस्तक्षेप बेटी और ससुराल में भावनात्मक दूरी का कारण बनता है। कई बार आपस में बहुत बात न करने के कारण भी भावनात्मक लगाव नहीं हो पाता है। बड़ों का बात-बात पर टोकना भी बच्चों को रास नहीं आता और फिर वे बुजुर्गों को नजरंदाज करना शुरू कर देते हैं। जब वृद्ध मां-बाप की आर्थिक और शारीरिक स्थिति कमजोर होती है और वे बच्चों पर पूर्ण आश्रित हो जाते हैं, तो उस समय बच्चों को अपने बच्चों के भी खर्चे नजर आने लगते हैं, इसीलिए कई बार मां-बाप के खर्चों से वे बचना चाहते हैं। अगर व्यक्ति के पास धन हो तो उसे अपने लिए जरूर बचा कर रखना चाहिए, ताकि उसे वृद्धावस्था में किसी की ओर मुंह उठा कर न देखना पड़े और बच्चों को भी वे बोझ न लगें।

कई बार बुजुर्गों के ऊपर उनके बच्चों द्वारा दबाव डाला जाता है कि वे पूजा-पाठ में व्यस्त रहें। वही वृद्धावस्था में करने के लिए सबसे आदर्श और सर्वोच्च कार्य है। अगर इसके अलावा वे अपने शौक की कोई चीज करना भी चाहें, तो उन्हें मन मारना पड़ता है, जिसके कारण उन्हें अपना बुढ़ापा बोझ जैसा लगने लगता है। वे उसे उत्साहित होकर नहीं जी पाते हैं। वृद्धावस्था में न चाहते हुए भी वृद्ध पति-पत्नी एक ही घर में एक दूसरे से दूर-दूर रहते हैं, ताकि बहू-बेटा, पोता-पोती कुछ गलत न सोचें। यह बूढ़े मां-बाप पर हद से ज्यादा अत्याचार है। हम किस मानसिकता को ढो रहे हैं? बुजुर्ग अगर अकेला है, उसका साथी इस दुनिया में नहीं है और अगर वह किसी विपरीत लिंगी वृद्ध से मिलता, बात करता है तो भी उसे शक के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है।

अगर वे अकेले हों तो अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए नए साथी का चुनाव उन्हें डिप्रेशन जैसी कई बीमारियों से दूर रखता है और वे खुशी से थोड़ा और लंबा जीवन जी सकते हैं। शारीरिक रूप से कमजोर होने की स्थिति में भी वे एक-दूसरे का छोटे-छोटे कार्यों में सहयोग करते हैं, जिससे परिवारवालों पर उनकी निर्भरता थोड़ी कम होती है। घर के सदस्यों को ऐसा माहौल बनाने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें बूढ़े मां-बाप और बच्चे बैठ कर एक साथ बातचीत कर और समय बिता सकें। इसके अलावा सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों को इसमें बढ़-चढ़ कर कार्य करना चाहिए। पोता-पोती के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग होती है उसमें दादा-दादी, नाना-नानी की उपस्थिति का भी स्वागत किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दादा-दादी, नाना-नानी के साथ बच्चों की संयुक्त गतिविधियां स्कूल में अनिवार्य कर देनी चाहिए, ताकि वे एक-दूसरे के साथ अधिक समय व्यतीत कर सकें। इस प्रकार बुजुर्गों के प्रति परिवार की उपेक्षा में थोड़ी कमी अवश्य आएगी।

बुजुर्ग प्राय: पुराने समय में अटके रहते हैं। वे अक्सर यह कह कर कि ‘हमारे समय में तो…’ हर चीज की तुलना करते रहते हैं। उन्हें नए जमाने को नई चीजों के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास करना चाहिए। कई बार युवा पीढ़ी के साथ सामंजस्य न बिठाने का कारण नई पीढ़ी को लेकर उनके भीतर ईर्ष्या जैसी भावनाएं आ जाती हैं। जैसे वे उनकी तरह जीवन नहीं जी सकते हैं, उनकी तरह पहन-खा नहीं सकते हैं। चाह कर उनकी तरह जवान, सुंदर नहीं बन सकते हैं और इच्छा होते हुए भी युवकोचित कार्यव्यवहार नहीं कर सकते हैं। युवा पीढ़ी का बुजुर्गों के प्रति नजरिए की बात करें, तो पुराने समय में बुजुर्गों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

अगर कोई उनसे बदसलूकी कर भी दिया करता तो समाज उस पर लानतें भेजता था। खाट के सिरहाने भी बैठने की हिम्मत किसी कम उम्र के व्यक्ति की नहीं होती थी। भोजन सबसे पहले बड़े को खिलाया जाता था। अब बुजुर्गों के उस सम्मान में गिरावट आई है और इस गिरावट की जिम्मेदार बहुत हद तक नई तकनीक है, जिससे पुराने लोग जुड़ नहीं पाते हैं। पर आज के समय में सेवानिवृत्ति के बाद जो थोड़े-बहुत लोग नई तकनीक से जुड़ गए हैं, वे भी युवा की तरह अपना अलग संसार बना रहे हैं। घरों में अब बच्चे दादी-नानी से कहानी सुनना पसंद नहीं करते हैं। उनके लिए आकर्षक चित्रों सहित कहानियां टीवी और इंटरनेट पर सहज उपलब्ध हैं। बेटी-बहू दादी-नानी के नुस्खे सब यू ट्यूब से उपलब्ध कर लेती हैं।

बच्चों के लिए दूल्हा-दुल्हन ढूंढ़ने की जिम्मेदारी पहले बड़े-बूढ़ों की हुआ करती थी। पर अब यह जिम्मेदारी भी इंटरनेट ने ले ली है। वह घर में बैठे-बिठाए रिश्ता खोजता है, जिससे बुजुर्गों की यहां उपेक्षा होने लगी। इंटरनेटी संबंध जितने जल्दी जुड़ते हैं उतनी ही जल्दी टूटते भी हैं। ऐसे दौर में जब रिश्ते बहुत तेजी से टूट रहे हैं, मान-मर्यादा कहीं पीछे छूटती जा रही है, तो हमारे बड़े-बूढ़ों को बहुत समझदारी से काम लेना होगा। उन्हें घर के कामों में दिलचस्पी लेनी चाहिए। नई पीढ़ी के मनोविज्ञान और उनके जीवन की व्यस्तता को समझते हुए सामंजस्य बिठाने की कोशिश करनी चाहिए। ठीक इसी प्रकार नई पीढ़ी के भीतर भी बड़े बूढ़ों के लिए सम्मान और प्रेम की भावना जगाने के लिए समाज में विभिन्न संस्थाओं, संगठनों को बढ़-चढ़ कर कार्य करना चाहिए।

Next Stories
1 परिदृश्यः भारतीय सांस्कृतिक बनावट को तोड़ती संकीर्णता
2 प्रसंगः हिंदी गजल की चुनौतियां
3 कहानीः मुझे वहां ठिठकना है…
ये पढ़ा क्या?
X