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शख्सियत: तेलुगु साहित्य का अक्षर-पुरुष रावुरी भारद्वाज

जिस 'पाकुडु राल्लु' उपन्यास के लिए रावुरी भारद्वाज को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, वह भारत की किसी भी भाषा में नैतिक जोखिम के लिहाज से खासी निर्भीक रचना है। फिल्म जगत की विसंगतियों पर केंद्रित उनका यह उपन्यास आधुनिक तेलुगु उपन्यास साहित्य में एक तरह से मील का पत्थर है।

तेलुगु साहित्यकार रावुरी भारद्वाज।

भारतीय भाषाओं की जड़ें सांस्कृतिक तौर पर काफी गहरी हैं। ये जड़ें एक तरफ जहां भाषाई अस्मिता का विशाल फलक रचती हैं, वहीं इनसे भारतीय संस्कृति की सामासिक विलक्षणता पुष्ट होती है। यह बात उन लोगों को खासतौर पर समझने की जरूरत है जो भाषाई वर्चस्व की बात करते हैं और भारतीय भाषा परिवार की विशालता, विविधता और उनके अंतर्संबंधों को देखने-समझने का अपेक्षित विवेक नहीं रखते।

तेलुगु ऐसी ही एक समृद्ध भारतीय भाषा है, जिसका सांस्कृतिक आधार काफी मजबूत है। आधुनिक भारत में बाजार और शिक्षा माध्यमों के भाषाई इकहरेपन के कारण तेलुगु साहित्य की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी कम जरूर हुई है पर इसका यह कतई मतलब नहींं कि इस भाषा का अवदान आधुनिक भारत के सांस्कृतिक विमर्श में किसी अन्य भाषा से कमतर है। तेलुगु साहित्यकार रावुरी भारद्वाज की चर्चा से पहले यह पृष्ठभूमि इसलिए ताकि हम समझ सकें कि तेलुगु साहित्य की चर्चा करना किसी आधुनिक भारतीय विमर्श से कटना नहीं बल्कि उससे गहरे तौर पर जुड़ना है।

रावुरी भारद्वाज के नाम और कृतित्व की चर्चा तब अखिल भारतीय स्तर पर हुई जब यह घोषणा हुई कि 2012 के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए वे चुने गए हैं। दिलचस्प है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 से मिलना शुरू हुआ। तेलुगु की झोली में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पहली बार 1970 में आया जब विश्वनाथ सत्यनारायण को यह पुरस्कार मिला। इसके 18 साल बाद 1988 में डॉ. नारायण रेड्डी को यह पुरस्कार मिला। रेड्डी से भारद्वाज तक एक लंबा अंतराल है। पर यह अंतराल तेलुगु साहित्य का अपना अंतराल या रचनात्मक सन्नाटा नहीं है।

रावुरी भारद्वाज की ही चर्चा करें तो वे न सिर्फ लगातार रचनाशील रहे बल्कि इस दौरान उन्हें भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में प्रभावशाली हस्तक्षेप भी किया। उन्हें जिस ‘पाकुडु राल्लु’ उपन्यास के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, वह भारत की किसी भी भाषा में नैतिक जोखिम के लिहाज से खासी निर्भीक रचना है। फिल्म जगत की विसंगतियों पर केंद्रित उनका यह उपन्यास आधुनिक तेलुगु उपन्यास साहित्य में एक तरह से मील का पत्थर है।

अलबत्ता एक ‘बोल्ड’ विषय पर उन्होंने जिस साहस और पारदर्शिता के साथ इस उपन्यास के गहन कथानक को गढ़ा, उसको लेकर उन्हें आलोचना भी कम नहीं झेलनी पड़ी। उन्हें तेलुगु साहित्य में कुजात चेतना और प्रतिबद्धता का साहित्यकार तक ठहराया गया।

बहरहाल, रावुरी भारद्वाज का स्थान तेलुगु साहित्य में एक ऐसे वटवृक्ष की तरह है जिसकी छाया और सान्निध्य में एक से ज्यादा पीढ़ी के साहित्यकारों-पाठकों ने काफी कुछ सीखा-पढ़ा है। उन्हें अपने जीवन में अवहेलना बार-बार झेलनी पड़ी। यहां तक कि ज्ञानपीठ भी उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में नसीब हुआ। सक्रिय काल में वे आकाशवाणी से जुड़े रहे । तेलुगु में आकाशवाणी के लिए बाल कार्यक्रम ‘बाला नंदम’ की परिकल्पना उन्होंने ही की थी, जो आज भी लोकप्रिय है।

ज्ञानपीठ से पहले उन्हें रेखाचित्र ‘जीवन समरम्’ के लिए 1983 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपनी कहानियों के जरिए वे आम आदमी के बहुत करीब रहे। वे सच्चे अर्थों में एक स्थितप्रज्ञ संत थे। मजदूरों के जीवन से गुजरते हुए उन्होंने स्वाध्याय और स्वानुभव की एक ऐसी राह चुनी जो उन्हें कबीर, रविदास और दादू की परंपरा से भी कहीं न कहीं जोड़ती है। गरीबों के हिमायती रहते हुए रावुरी ने आजीवन मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष का प्रण निभाया। उनका कथा साहित्य सर्वहारा वर्ग के शोषण और उत्पीड़न का विस्तृत दस्तावेज है।

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