ताज़ा खबर
 

शख्सियतः अशफाक उल्लाह खान

स्वतंत्रता आंदोलन में नरम और गरम दोनों दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इस आंदोलन में एक समय ऐसा आया, जब कुछ क्रांतिकारियों को लगा कि अंग्रेजों से केवल नम्रता से बात करके कुछ नहीं होने वाला है।

अशफाक उल्ला खान

स्वतंत्रता आंदोलन में नरम और गरम दोनों दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इस आंदोलन में एक समय ऐसा आया, जब कुछ क्रांतिकारियों को लगा कि अंग्रेजों से केवल नम्रता से बात करके कुछ नहीं होने वाला है। आजादी के लिए कुछ सख्त कदम उठाने होंगे। यही वह समय था जब आंदोलन को क्रांतिकारी रूप देने के लिए हथियारों की जरूरत थी, जिसके लिए ट्रेन का खजाना लूटना आवश्यक हो गया। क्रांतिकारियों ने रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अंग्रेजी सरकार की धन लूटने का निश्चय किया। 9 अगस्त, 1925 को सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन काकोरी स्टेशन पर रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्लाह खान समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने ट्रेन से खजाना लूटने की योजना बनाई। इस योजना को अंजाम तक पहुंचाने वाले स्वतंत्रता सेनानी, कवि और हिंदू-मुसलिम एकता को बढ़ावा देने वाले अशफाक उल्लाह खान ही थे।

व्यक्तिगत जीवन

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाकउल्लाह खान में बचपन से ही उत्साह और देश के लिए कुछ करने का जुनून था। उन्हें कविता, घुड़सवारी, निशानेबाजी और तैराकी का बहुत शौक था। अशफाक तीन भाइयों से छोटे थे। घर में उन्हें अच्छू नाम से बुलाया जाता था।

बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती

आजादी के आंदोलन में रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान की दोस्ती हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक मानी गई है। अशफाक हमेशा से किसी क्रांतिकारी दल में शामिल होना चाहते थे। वे बिस्मिल से मिलना चाहते थे। कई बार मिलने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। पर जब 1922 में रामप्रसाद बिस्मिल ने असहयोग आंदोलन को लेकर एक बैठक बुलाई, तो उसमें अशफाक भी आए, जहां अशफाक की मुलाकात बिस्मिल से हो ही गई। बिस्मिल अशफाक से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी पार्टी ‘मातृवेदी’ का सक्रिय सदस्य बना लिया।

राजनीतिक भागीदारी

अशफाक यह समझ गए थे कि स्वतंत्रता आंदोलन को बल देने के लिए सिर्फ क्रांतिकारी गतिविधियां काफी नहीं, बल्कि राजनीतिक भागीदारी भी आवश्यक है। 1921 की अमदाबाद कांग्रेस में रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक भी शामिल हुए। जब गांधी ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया तो शाहजहांपुर के कई कांग्रेसी स्वयंसेवकों ने इसका विरोध किया। इसी तरह जब 1922 में गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तब गया कांग्रेस के स्वयंसेवकों ने इसका जम कर विरोध किया था। बाद में 1922 में गया कांग्रेस में दो दल बन गए, जिसमें से एक दल स्वराज पार्टी और दूसरा क्रांतिकारी पार्टी का था। इसके बाद अशफाक और बिस्मिल क्रांतिकारी पार्टी के कामों में शामिल हो गए।

काकोरी कांड के बाद गिरफ्तारी

काकोरी कांड में खजाने की लूट के बाद ब्रिटिश सरकार की पुलिस अशफाक और उनके साथियों को पकड़ने में जुट गई। अशफाक के कई साथी गिरफ्तार हो गए, लेकिन अशफाक गिरफ्तारी से बच निकले। इसके बाद वे नेपाल, कानपुर, बनारस, बिहार आदि राज्यों में कुछ-कुछ काम करते रहे। पर दिल्ली में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अंतिम समय

‘मेरे ये हाथ इंसानी खून से नहीं रंगे। खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।’ ये वाक्य अशफाक ने फांसी लगने के दौरान कहे थे। अशफाक फांसी की सजा से भी नहीं घबराए। वे 19 दिसंबर, 1927 को रोज की तरह उठे, सुबह के कामों से निवृत्त हुए। फिर कुरान को पढ़ा और फांसी के तख्ते पर जाकर खड़े हो गए।

Next Stories
1 मुद्दाः समाज में बुजुर्गों की जगह
2 परिदृश्यः भारतीय सांस्कृतिक बनावट को तोड़ती संकीर्णता
3 प्रसंगः हिंदी गजल की चुनौतियां
ये पढ़ा क्या?
X