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शख्सियत: निर्भीक महिला सत्याग्रही रुक्मिणी लक्ष्मीपति

1920 के दशक में रुक्मिणी लक्ष्मीपति की रुचि स्वाधीनता आंदोलन तथा स्वदेशी आंदोलनों में बढ़ने लगी। वे महात्मा गांधी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथा सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं से प्रभावित रहीं। उन्होंने राजा जी के नेतृत्व में मद्रास प्रेसीडेंसी में नमक सत्याग्रह में भाग लिया।

Author Updated: December 6, 2020 7:02 AM
Personalityतिरुमति रुक्मिणी लक्ष्मीपति।

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में हर वर्ग और समुदाय ने बराबरी के साथ शिरकत की थी। यही नहीं, यह आंदोलन भारतीय समाज और चरित्र को भी एक साथ नए सिरे से गढ़ रहा था। समाज सुधार के कई तारीखी कदम इस दौरान उठाए गए। बात महिलाओं की करें तो उन्होंने इस दौरान कई मील के पत्थर स्थापित किए। रुक्मिणी लक्ष्मीपति ऐसी ही एक वीरांगना का नाम है, जिसने एक तरफ जहां स्वाधीनता संघर्ष के दौरान निर्भीक सत्याग्रही होने का परिचय दिया, वहीं हरिजन उद्धार जैसे कई सामाजिक अभियानों के लिए काफी प्रतिबद्धता से कार्य किया।

छह दिसंबर, 1892 में प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में जन्मी रुक्मिणी लक्ष्मीपति स्वतंत्र विचारों वाली महिला थीं। उनके अभिभावक कोचीन राज्य के दीवान थे। वे मद्रास के प्रसिद्ध वूमन क्रिश्चियन कॉलेज के पहले सत्र की स्नातक थीं। छात्र जीवन से ही वो उदारवादी विचारों के लिए जानी जाती थीं। कालांतर में उन्होंने डॉक्टर अचंत लक्ष्मीपति, जो स्वयं विधुर थे, उनसे अंतरजातीय विवाह किया। डॉक्टर अचंत चिकित्सक थे और बाद में उनकी रुचि आयुर्वेद तथा भारतीय चिकित्सा पद्धति की दिशा में बढ़ी। यह सब वे अपनी पत्नी के सहयोग और परामर्श से ही कर रहे थे।

1920 के दशक में रुक्मिणी लक्ष्मीपति की रुचि स्वाधीनता आंदोलन तथा स्वदेशी आंदोलनों में बढ़ने लगी। वे महात्मा गांधी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तथा सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं से प्रभावित रहीं। उन्होंने राजा जी के नेतृत्व में मद्रास प्रेसीडेंसी में नमक सत्याग्रह में भाग लिया। इस सत्याग्रह में गिरफ्तार होने वाली वो पहली महिला थीं। ऐसा भी कहा जाता है कि उन्होंने अपने सारे गहने हरिजन कल्याण निधि में दान कर दिए थे।

स्वाधीनता आंदोलन में अपनी शिरकत के दौरान रुक्मिणी कई ऐसे रचनात्मक कार्यक्रमों से भी स्वाभाविक रूप से जुड़ीं, जो उन दिनों महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में विभिन्न रूपों में चल रहे थे। उन्होंने खासतौर पर युवा महिलाओं को खादी कातने तथा रोजमर्रा के जीवन में उसका अधिकाधिक उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं को स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हो कर सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया। रुक्मणि ने भारत स्त्री मंडल और वूमेन इंडिया एसोसिएशन जैसी संस्थाओं से जुड़कर महिला सशक्तीकरण और महिला शिक्षा के लिए कारगर प्रयास किए। अपने इन प्रयासों के क्रम में उन्होंने बाल विवाह का निषेध करने जैसे सामाजिक सुधारों के लिए आवाज़ उठाई।

रुक्मिणी लक्ष्मीपति युवाओं के बीच लंबे समय तक सक्रिय रहीं। कांग्रेस के सदस्य के रूप में उन्होंने यूथ लीग आॅफ कांग्रेस के माध्यम से युवाओं को स्वाधीनता संघर्ष से जोड़ा। 1926 में कांग्रेस ने उन्हें महिला मताधिकार के मुद्दे पर पेरिस में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में शरीक होने के लिए भेजा। 1937 में रुक्मिणी मद्रास विधानसभा की पहली महिला सदस्य चुनी गर्इं और विधानसभा उपाध्यक्ष बनीं। बाद में वे मुख्यमंत्री टी प्रकाशम के मंत्रिमंडल में मंत्री बनीं। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा प्रणाली को प्रचलित करने में अहम भूमिका निभाई।

आज समाज और राजनीति से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। रुक्मिणी लक्ष्मीपति के जीवन और कार्यों को देखकर यह समझा जा सकता है कि महिलाओं की इस उपलब्धि के पीछे कितनी लंबी संघर्ष यात्रा रही है।

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