ताज़ा खबर
 

शख्सियत: स्मृति और आधुनिकता के साझे का चितेरा तैयब मेहता

तैयब मेहता के कला जीवन की शुरुआत काफी दिलचस्प रही। उन्होंने सबसे पहले फिल्मी दुनिया में अपनी किस्मत आजमाई। पर यह दुनिया न उन्हें ज्यादा रास आई और न ही उन्हें अपने कलात्मक तजुर्बे के लिए कोई खास मौके ही मिले। वहां से कुछ बनता न देख 1952 में उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से उन्होंने डिप्लोमा किया। कला की शिक्षा के लिए तैयब पांच साल लंदन में रहे। उन्होंने अमेरिका का भी दौरा किया। इस दौरान उन्होंने पश्चिम के कला संस्कारों को नज़दीक से समझने की कोशिश की।

प्रसिद्ध चित्रकार तैयब मेहता।प्रसिद्ध चित्रकार तैयब मेहता।

रंग, छवि, शैली और सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार के लिहाज से भारतीय कला इतिहास की समकालीनता को देखने-समझने के लिए जरूरी है कि हम कला की उस आधुनिकता को समझें, जो भारतीय कला जगत को विश्व के साथ कई स्तरों पर जोड़ती है। 1925 में गुजरात में जन्मे तैयब मेहता का नाम इस लिहाज से खासा अहम है। वे देश में प्रगतिशील कला आंदोलन में सक्रिय कलाकारों में शामिल थे। उन्होंने एक तरफ कला के यूरोपीय प्रयोगों को समझा, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने भारतीय जीवन, समाज और संस्कृति को गहरे तौर पर प्रभावित करने वाले मिथों-चरित्रों और स्मृतियों को अपनी अभिव्यक्ति के लिए चुना।

तैयब मेहता के कला जीवन की शुरुआत काफी दिलचस्प रही। उन्होंने सबसे पहले फिल्मी दुनिया में अपनी किस्मत आजमाई। पर यह दुनिया न उन्हें ज्यादा रास आई और न ही उन्हें अपने कलात्मक तजुर्बे के लिए कोई खास मौके ही मिले। वहां से कुछ बनता न देख 1952 में उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से उन्होंने डिप्लोमा किया। कला की शिक्षा के लिए तैयब पांच साल लंदन में रहे। उन्होंने अमेरिका का भी दौरा किया। इस दौरान उन्होंने पश्चिम के कला संस्कारों को नज़दीक से समझने की कोशिश की।

सत्तर के दशक में तैयब मेहता ने आम इंसान के द्वंद्व का विलक्षण विरूपण करते हुए एक फिल्म भी बनाई- ‘कुदाल’, जिसे पुरस्कृत किया गया और यह काफी सराही गई। पर इससे आगे कोई सिलसिला नहीं बन पाया। इस दौरान लंबे समय तक तैयब खामोशी और तल्लीनता के साथ काम करते रहे। उनका नाम कला दुनिया से इतर आम समाज के बीच सहसा 2002 में गूंजा। वैसे कला की दुनिया में भी वो गूंज किसी धमाके से कम न थी और इसकी वजह भी खास थी। उनकी ‘सेलिब्रेशन’ नाम की पेंटिंग तीन लाख डॉलर से ज्यादा में बिकी। दुनिया की कला बोली के इतिहास में यह एक बड़ी घटना थी। इसके बाद 2005 में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘काली’ की भी कुबेरी बोली लगी। 2007 में वे एक बार सुर्खियों में लौटे जब उनकी ‘क्रिस्टीन’ नाम की तस्वीर की करोड़ो डॉलर की बोली लगी। 2008 में भी उनकी एक और पेंटिंग लाखों डॉलर की बोली के बाद खरीदी गई।

तैयब मेहता महान चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन और सैयद हैदर रजा के समकालीन थे। उन्होंने इन दिग्गज चित्रकारों के साथ ‘प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ में मिलकर काम किया था। समकालीन भारतीय कला इतिहास में तैयब ही अकेले ऐसे चित्रकार रहे, जिनका काम इतनी अकल्पनीय कीमतों में बिका है। पर इन महंगी नीलामियों और लोकप्रियता से उनकी कला और उनके मन-मिजाज को समझना मुश्किल है।

तैयब एक शांत, खामोश, बेचैन, सजग और जनचेतना के चितेरे थे। प्राचीन स्मृतियों के चित्रण और मिथकीय चरित्रों से अपनी कला को गढ़ने और रंग-आकार देने वाले तैयब अपनी कृतियों में अवसाद और उदासी के बीच शौर्य, साहस, जीवंतता और विपुल ऊर्जा के लिए जाने जाते हैं। उनकी पेंटिंग ‘काली’ हो या ‘महिषासुर’, ये सभी आधुनिक चिंताओं को संबोधित कलाकृतियां हैं और उनकी कलात्मक बारीकियां बेजोड़ हैं।

वे अपने कला कर्म के प्रति इतने खामोश समर्पण वाले थे कि संतुष्ट न होने तक अपनी पेंटिंग को कला दीर्घाओं में जाने से बचाते रहते थे। सृजनात्मकता की अपनी जिद की खातिर उन्होंने कई कैनवस भी नष्ट किए। उनका मानना था कि सार्वजनिक होने वाली कला में कोई खोट नहीं रहनी चाहिए। दो जुलाई, 2009 को उनका निधन हो गया। तैयब अपनी कला के साथ प्रयोग और अन्य विलक्षणताओं के साथ लंबे समय तक कलात्मक अनुराग की दुनिया में याद किए जाते रहेंगे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दाना पानी: परंपरा भी प्रयोग भी
2 पानी को लेकर दावे और शोध: जल के साथ सेहत की बात
3 शख्सियत: मलयालम साहित्य की अम्मा बालमणि अम्मा
ये पढ़ा क्या?
X