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शख्सियत: ऐसा था पत्रकार व साहित्यकार से लेकर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का राजनीतिक जीवन

केएम मुंशी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्वराज पार्टी की सदस्यता ली लेकिन जब 1930 में गांधी ने नमक सत्याग्रह शुरू किया तब मुंशी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।

Author Updated: December 23, 2018 6:28 AM
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (जन्म-30 दिसंबर, 1887- मृत्यु- 8 फरवरी, 1971)

गुजरात के भरूच में जन्म केएम मुंशी एक कुशल राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, वकील और लेखक थे। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा भरूच के आरएस दलाल हाई स्कूल से की थी। उनकी आगे की पढ़ाई वड़ोदरा से हुई, जहां उन्होंने पढ़ाई में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। वड़ोदरा कॉलेज में अपने शिक्षकों में से श्री अरबिंदो घोष से वे अधिक प्रभावित थे। इसके अलावा वे महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और भूलाभाई देसाई से भी प्रभावित थे। वे गुजराती और अंग्रेजी के लेखक भी थे। गुजराती साहित्य में वे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे प्रख्यात बैरिस्टर और कानूनविद् भी थे।

राजनीतिक जीवन
केएम मुंशी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्वराज पार्टी की सदस्यता ली लेकिन जब 1930 में गांधी ने नमक सत्याग्रह शुरू किया तब मुंशी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। भारत छोड़ो आंदोलन और कई अन्य आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने केंद्रीय विधानसभा में भी अपनी सेवा दी। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का संविधान निर्माण में भी बहुत बड़ा योगदान था। वे कई समितियों में प्रमुख सदस्य के रूप में रहे। वे मौलिक अधिकारों पर बने प्रारूप, सलाहकार और कई उपसमितियों के सदस्य रहे। उन्होंने मौलिक अधिकारों पर एक प्रारूप तैयार किया था, जिसे मसौदा समिति को सौंपा था।

आजादी के बाद मुंशी को हैदराबाद का राजनयिक दूत और व्यापार एजंट बनाया गया। केएम मुंशी उस समिति में भी थे जो देश का झंडा तैयार कर रही थी। भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में बनी संविधान निर्माण समिति में भी सक्रिय सदस्य के रूप में अपना योगदान दिया। 1952 से 1957 तक वे उत्तर प्रदेश के गर्वनर भी रहे। 1959 में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया और अखंड हिंदुस्तान अभियान शुरू किया। उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालचारी के साथ मिलकर स्वतंत्र पार्टी का निर्माण किया। यह पार्टी दक्षिणपंथी विचारधारा को मानती थी। बाद में मुंशी जनसंघ में शामिल हो गए। 1964 में वे विश्व हिंदू परिषद की बैठक के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने अलग पाकिस्तान की मांग का भी विरोध किया था।

पत्रकार व साहित्यकार के रूप में मुंशी
उन्होंने गुजराती मासिक ‘भार्गव’ की भी शुरुआत की। वे यंग इंडिया के संयुक्त संपादक भी रहे। उन्होंने 1954 में एक पत्रिका निकाली जिसे भारतीय विद्या भवन ने प्रकाशित किया था। वे गुजराती साहित्य परिषद और हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारतीय विद्या भवन की भी स्थापना की। उन्होंने शिक्षा और पर्यावरण के लिए भी महत्त्वपूर्ण काम किए। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की हिंदी और अंग्रेजी में अच्छी पकड़ थी। इसके अलावा उन्हें गुजराती, कन्नड़, तमिल, मराठी, आदि भाषाओं में भी साहित्य रचा। केएम मुंशी ने विभिन्न भाषाओं में 127 पुस्तकें लिखीं। उनकी पहली कहानी मारी कमला 1912 में स्त्री बोध पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने ‘गुजरात’ का भी संपादन किया। वे पत्रकार के अलावा ख्याति प्राप्त साहित्यकार थे। उन्होंने उपन्यास, नाटक, कहानी, निबंध, आत्मकथा, जीवनी आदि विधाओं में लिखा। निधन- उनका निधन 8 फरवरी 1971 को हो गया। मृत्यु के बाद उनके नाम से कई निर्माण हुए।

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