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इतिहासः बंटवारे की लकीर

वे हादसों के दिन थे। कमोबेश हर घटना हादसों की मानिंद घट रही थी। चारों तरफ विसंगतियां, विरोधाभास भरे पड़े थे। यह एक ऐतिहासिक विरोधाभास था कि जिस तारीख को पाकिस्तान अस्तित्व में आया, उस दिन तक उस देश की सीमाएं तय नहीं हो पाई थीं।

आखिर रेखाएं खींच दी गर्इं। पंजाब के पश्चिमी भाग को पश्चिमी पंजाब और पूर्वी भाग पर पूर्वी पंजाब के नाम की पर्ची चस्पां कर दी गई।

वे हादसों के दिन थे। कमोबेश हर घटना हादसों की मानिंद घट रही थी। चारों तरफ विसंगतियां, विरोधाभास भरे पड़े थे। यह एक ऐतिहासिक विरोधाभास था कि जिस तारीख को पाकिस्तान अस्तित्व में आया, उस दिन तक उस देश की सीमाएं तय नहीं हो पाई थीं। लगभग साढ़े चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को लगभग आठ करोड़ लोगों के लिए आबंटित किया जाना था। स्वतंत्र पाकिस्तान 14 अगस्त को अस्तित्व में आ गया था। 15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहरा। मगर दोनों देशों के बीच सीमा रेखा एक दिन बाद 16 अगस्त को ही खींची जा सकी। यानी आजादी पहले मिल गई, सीमाएं बाद में तय हुर्इं।

इन सीमा रेखाओं की निशानदेही जिस सीमा आयोग ने की, उसके अध्यक्ष एक आर्किटेक्ट सर सिरिल रैडक्लिफ थे। यह भी शायद उस काल की सबसे बड़ी विसंगति थी कि एक ऐसे शख्स को इस ऐतिहासिक निशानदेही का काम सौंपा गया, जो इससे पहले पर्यटक के रूप में भी कभी भारत नहीं आया था। ब्रिटिश पॉर्लियामेंट ने 15 जुलाई, 1947 को ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ पारित किया। इस कानून के तहत सिर्फ एक माह बाद यानी 15 अगस्त, 1947 को ‘ब्रिटिश भारत के प्रांतों’ को दो सार्वभौम प्रभुसत्ता संपन्न देशों के बीच विभाजित किया जाना था। एक का प्रस्तावित नाम ‘यूनियन ऑफ इंडिया’ और दूसरे का ‘डोमिनियन ऑफ पाकिस्तान’ था। विभाजन से पहले भारत का लगभग चालीस प्रतिशत भाग छोटे-बड़े राजाओं, महाराजाओं, नवाबों के अधिकार में था। ये रियासतें वैसे ब्रिटिश नियंत्रण में थीं। उनके विदेशी मामले पूरी तरह ब्रिटिश-साम्राज्य द्वारा ही तय होते थे। संचार व्यवस्था भी लगभग पूरी तरह ब्रिटिश नियंत्रण में थी। मगर संविधान के अनुसार ब्रिटिश सरकार न तो उन्हें स्वतंत्र घोषित कर सकती थी, न ही उनका विभाजन कर सकती थी। मगर ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ के अनुसार उन्हें यह अधिकार दे दिया गया कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें या चाहें तो दोनों में से किसी एक देश में विलीन हो जाएं। इसके साथ ही कुछेक को छोड़ शेष लगभग सबने दोनों में से एक देश चुन लिया।

आखिर रेखाएं खींच दी गर्इं। पंजाब के पश्चिमी भाग को पश्चिमी पंजाब और पूर्वी भाग पर पूर्वी पंजाब के नाम की पर्ची चस्पां कर दी गई। पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान को मिला, पूर्वी पंजाब भारत को। यही बंगाल में हुआ। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान को दे दिया गया, जबकि पश्चिमी बंगाल भारत के खाते में दर्ज कर दिया गया। ‘नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस’ जिसे पख्तूनिस्तान भी कहा जाता था, ने एक विवादास्पद जनमत संग्रह के जरिए पाकिस्तान में मिलने की इच्छा जताई। इस जनमत संग्रह में पख्तून आंदोलन से जुड़े कबीलों और लोगों ने कोई शिरकत नहीं की थी। वैसे जनमत संग्रह में भी पाक-समर्थकों को स्पष्ट या भारी बहुमत नहीं मिल पाया।

पंजाब में मसला बेहद पेचीदा था। जनसंख्या का अनुपात लगभग हर जगह मिलाजुला था। कहीं भी सीधी विभाजक रेखा खींचना मुश्किल था। कोई भी रेखा, सड़क तंत्र, रेल तंत्र, संचार तंत्र, सिंचाई तंत्र और बिजली तंत्र को तहस-नहस किए बिना मुमकिन नहीं था। खेतों की स्थिति भी यही थी। मगर दलीलों, सामान्य बुद्धि, तकनीकी और ऐतिहासिक-भौगोलिक मजबूरियों को एक तरफ हाशिए पर सरका दिया गया। बस विभाजन रेखाएं खींच दी गर्इं। इस सारी कवायद के लिए दो सीमा आयोग गठित हुए थे। एक बंगाल के लिए और दूसरा पंजाब के लिए। दोनों का ही अध्यक्ष सर सिरिल रैडक्लिफ को बनाया गया। रैडक्लिफ 8 जुलाई, 1947 को पहली बार भारत पहुंचे थे। उन्हें अपने समूचे कार्य के लिए पांच सप्ताह का नपा-तुला समय दिया गया।

दोनों आयोगों में कांग्रेस और मुसलिम लीग के दो-दो प्रतिनिधि शामिल थे। पर किसी नुक्ते पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद की स्थिति में अंतिम फैसला रैडक्लिफ का होता था। रैडक्लिफ को समय बेहद नाकाफी लग रहा था। मगर इस बारे में वायसराय, कांग्रेस और मुसलिम लीग के नेता अडिग थे। वे समय सीमा बढ़ाने के कतई पक्ष में नहीं थे। इस आयोग में रैडक्लिफ के अलावा शेष सभी सदस्य पेशे से वकील थे। किसी भी सदस्य के पास ऐसा कोई अनुभव नहीं था, कोई भी नहीं जानता था कि विभाजन सीमा कैसे तैयार होती है। रैडक्लिफ को सिर्फ इस बात की संतुष्टि थी कि उनका निजी सचिव क्रिस्टोफर ब्यूमैंट पंजाब की हर स्थिति से पूरी तरह वाकिफ था। एक सुझाव यह भी आया कि इसमें यूएनओ से कुछ विशेषज्ञ ले लिए जाएं। मगर यह सुझाव इसलिए नहीं माना गया क्योंकि विशेषज्ञों द्वारा मीनमेख निकालने, भाषा-संस्कृति, भूसंपत्ति, जनसंख्या, संसाधन आदि के पूरे अध्ययन के पचड़े में पड़ने की आशंका थी।

उधर, बंगाल सीमा आयोग के सामने यह भी सवाल उठा था कि कलकत्ता किसे मिले, भारत या पाकिस्तान को? बंगाल में चिटागांग पहाड़ियों के बौद्ध कबीले कुछ भी फैसला नहीं कर पा रहे थे। अब इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि अगर थोड़ी सावधानी और सजगता से काम लिया जाता तो विभाजन की अकल्पनीय विभीषिका से बचा जा सकता था। ऐसे अनेक मंजर सामने आए, जब किसी एक गांव को बीच से बांटना पड़ा। एक गांव का कुछ भाग पाकिस्तान को मिला, शेष हिंदुस्तान को। रैडक्लिफ घनी आबादी वाले क्षेत्रों के बीच विभाजक रेखा के हक में था। मगर इससे कई ऐसे घर भी बंटे, जिनके कुछ कमरे भारत में गए, कुछ पाकिस्तान में। रैडक्लिफ बार-बार एक ही दलील देते ‘हम कुछ भी कर लें लोग बबार्दी तो झेलेंगे ही।’

रैडक्लिफ का दूसरा मुख्य आधार था ‘कंटिन्युटी’ यानी निरंतरता। यथासंभव इस बात का ध्यान रखा गया कि गांव या कस्बे दूसरे क्षेत्रों में मजहबी आधार पर बिल्कुल अलग न हों। यानी ऐसा न हो कि एक हिंदू-बहुल कस्बा बीच में आता हो और उसके दोनों तरफ मुसलिम कस्बे हों। ऐसी स्थितियों में दोनों तरफ के मुसलिम कस्बों को जोड़ने के लिए चकबंदी की ‘निरंतरता’ का ध्यान अवश्य रखना था। मगर यह मुमकिन न हो सका। बाद में निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ गांवों और कस्बों को बीच में से बांटना पड़ा। रैडक्लिफ को दूसरा आधार, भारत के पुरातत्त्व विभाग से प्राप्त सामग्री को बनाना पड़ा।

पंजाब की नहरों की संरचना के बारे में जानकारी उसे वायसराय के निजी सचिव जार्ज एबेल से प्राप्त हुई। सारा कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि सभी पहलुओं को बारीकी से देख पाना मुमकिन ही नहीं था। तय तो यह था कि रैडक्लिफ-अवार्ड, सत्ता हस्तांतरण से कुछ दिन पहले ही घोषित हो जाएगा। इसे 16 अगस्त तक स्थगित रखा गया, माउंटबेटन के आदेश पर। वे नहीं चाहते थे कि अवार्ड की कुछेक विसंगतियों का असर भारत-पाकिस्तान के स्वाधीनता समारोहों पर पड़े। मगर इस देरी से आम लोगों में बेहद भ्रम फैला, अफवाहें फैलीं और लोग, जो हाथ में आया, उसी को बगल में ठूंस कर दिशाहीन स्थिति में घरों से निकल पड़े। लुटेरों और आपराधिक तत्त्वों के लिए यह एक ‘इलाही’ या ‘ईश्वरीय’ देन थी। उन्हें कट्टरपंथियों से भी मदद मिली। रैडक्लिफ 17 अगस्त को ही वापस लौट गया। वह जानता था कि बहुत-सी दुखद घटनाओं के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा। स्वदेश वापसी पर उसे ‘लॉ-लार्ड’ का पद दिया गया। एक बार उससे एक पत्रकार ने पूछा था कि क्या वह फिर भारत जाना चाहेगा? उसका जवाब था, ‘अगर कोई राजकीय हुक्म मिला, तब भी नहीं। मुझे लगता है कि अगर गया तो वहां दोनों पक्षों के लोग मुझे गोलियों से भून डालेंगे।’

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