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ललित प्रसंगः पंक्षियों का आना

सदियों से आ रहे हैं। गा रहे हैं, और सुबह सबेरे आज भी हमें जगा रहे हैं या जागे हुए के कानों में कह रहे हैं- हां, भाई आपने ठीक ही सुना है, ये ‘हमारे’ ही बोल हैं। हम पंछियों के। आप अब सुबह की सैर के लिए निकल सकते हैं।

Author May 6, 2018 1:21 AM

प्रयाग शुक्ल

सदियों से आ रहे हैं। गा रहे हैं, और सुबह सबेरे आज भी हमें जगा रहे हैं या जागे हुए के कानों में कह रहे हैं- हां, भाई आपने ठीक ही सुना है, ये ‘हमारे’ ही बोल हैं। हम पंछियों के। आप अब सुबह की सैर के लिए निकल सकते हैं। हां, आज भी, चाहे मुंबई-कोलकाता हो या दिल्ली-चेन्नई-हैदराबाद या पटना-बैंगलुरु या जम्मू-गुवाहाटी या फिर देश का कोई भी नगर-उपनगर, कस्बा-तहसील, गांव या ढाणी (राजस्थान की), भला कहां नहीं हैं, कम या ज्यादा पंछी, सुबह के आकाश में, मंडराते हुए, आते और जाते हुए, अपने बोल सुनाते हुए।
हां, वे सुबह-सुबह ही आ जाते हैं, एक विस्मय-सा भरते हुए! अपनी नींद टूटने पर, अपने घोंसलों से, अपने सोने की जगहों से- सुमित्रानंदन पंत ने लिखा था न!
खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि;
खिली सुरभि, डोले मधु बाल,
स्पंदन कंपन औ, नवजीवन
सीखा जग ने अपनाना;
प्रथम रश्मि का आना, रंगिणि,
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां, है बाल विहंगिनि!
पाया यह स्वर्गिक गाना?

हां, वे देवदूतों की तरह ही तो आते हैं; ऐसा बोध कराते हुए कि अगर वे हैं तो सृष्टि का आनंद भी है, लो, उठो, उसका आनंद लो! हां, वे आते हैं, मानो कहीं दूर से! ऐसा ही तो हमें लगता है! तभी तो बना है यह मुहावरा, ‘पंछियों का आना’! और साहित्यिक कृतियों के नाम भी, उनके ‘आने’ की तर्ज पर ही रखे गए हैं न! ‘पंछी ऐसे आते हैं’। वे सचमुच कभी-कभी तो बहुत दूर से उड़ कर आते हैं, हमारे झीलों-तालाबों-जल भंडारों में, ‘प्रवासी पंछी’, माइग्रेटरी बर्ड्स! पर, वह कथा तो कुछ अलग है। निकट-कथा तो यही है कि वे आते हैं, कहीं आसपास से, कभी-कभी तो अपने ही छज्जों-बरामदों तक से, जैसे कि कबूतर, और बोलने लगते हैं, उनकी बोली सुन कर, हम अपनी अधनींद या उनींद में सोचते हैं, लो आ गए फिर- कबूतर!
हां, चाहे कबूतर-कौव्वे ही क्यों न हों, वे आते हैं, महानगरों के घरों में, उनके आसपास, तारों पर, बचे-खुचे पेड़ों पर, पार्कों में, उद्यानों में, आते हैं वे- तोते और मोर, और अन्य पंछी, जैसे कि वे चित्रित हैं, मिनिएचर चित्रों की हमारी महान परंपरा में, कांगड़ा, राजस्थानी, मुगल शैलियों में- वे तो अब उस तरह नहीं दिखते, उस तरह नहीं आते, पर, पंछी अब भी आते हैं। नहीं आते तो हम चिंतित हो उठते हैं, जैसे कि गौरैया के न आने पर हो उठते हैं!

नहीं, हम सब चिड़ियों के नाम नहीं जानते, उन्हें जानने वाले उस तरह से तो कृषक, कृषक मजदूर, ग्राम निवासी, हमारी बड़ी-बूढ़िनें, बुजुर्ग ही हुआ करते थे गुजरे जमानों के, वे खंजन, नीलकंठ, वे कोकिलें, वे चकवा-चकई, और भी न जाने कितने-सब जाने-पहचाने जाते थे! पर, नहीं जानतीं नई पीढ़ियां, तो उनका क्या दोष! हमने पंछियों को, तमाम, नाम-अनाम पंछियों को, बसने ही कहां दिया है आसपास, कि वे आ जाएं, वे सब, और हमें अपने मीठे बोल सुना जाएं। फिर भी, हम फिर वही दुहराते हैं, कि गनीमत है कुछ तो अब भी आते हैं! हां, पंछी अब भी आते हैं, भले ही उस छवि, उस बिंब के साथ नहीं, जो जयशंकर प्रसाद ने रचा था :
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो, यह लतिका भी भर लाई,
मधु मुकुल नवल रस गागरी
बीती विभावरी जाग री!

हां, सुबह के दृश्य में यही तो प्रधान रहे हैं ‘खग-कुल’ और ‘मुकुल’! मानो आकाश से उतर कर पंछी आते हैं, और फिर फूल भी खिल जाते हैं, डालियों-टहनियों में!
पर, काल की गति! बहुत पहले संस्कृत कवि ‘पापाक’ ने लिखा था : ‘हे चकोर की कातर घरवाली/ अपने पंखों से ढक ले अपना कुटुंब/ उसमें से बहुत कुछ तो हो चुका नष्ट/ थोड़ा ही बचा है/ अंधकार हर रहा है दूर/ उग रहा है चंद्रमा।’ (श्रीधर दासकृत सदुक्तिकणामृत : हिंदी अनुवाद, राधावल्लभ त्रिपाठी) तो क्या तो प्रात: या संध्या को, या निशा को, कब सुलभ नहीं रहे हैं पंछी- कैसी आवाज करती हुई चली आती, और चली जाती है, टिटहरी! जो भी हो, सुबह के साथ तो पंछियों का जोग-संयोग गजब ही है!
और बहुतेरे मामलों में हम झेल रहे हैं उनका वियोग! तभी तो रखते हैं, गरम तप्त दोपहरियों में हम मिट्टी के या किसी अन्य सामग्री के पात्र में, उनके लिए पानी भर-भर कर कि वे आएं, पिएं, प्यास बुझाएं और कुछ अपने बोल सुना जाएं! हां, वह जल-पात्र केवल परमार्थ के लिए नहीं होता, कुछ तो ‘स्वार्थ’ के लिए भी होता है, पंछियों के लिए खुला आमंत्रण! आओ, आओ, हमारे जीवन में कुछ रंग, कुछ सुर भरो। चाहे स्वार्थ हो या परमार्थ, आएं पंछी, रहें हमारे आसपास!
हमने देखा है एक संसार पंछियों का, तुलसी-सूर के काव्य में, हमने उसे पाया है छायावाद के कवियों में भी, हमने उसे देखा-सुना है, कितने कौशल से रेखांकित, फणीश्वरनाथ रेणु के ‘परती : परिकथा’ में, हमने उसे जाना है, अन्य बहुतेरी कृतियों में! स्वयं पंछियों पर लिखी गई किताबों से पहचाना है उस संसार को, देखा-सुना है स्वयं आंख-कान से- और कब प्रफुल्लित नहीं हुए हैं उसे पाकर! उसके बिंबों-प्रतीकों ने, कब नहीं दिया हमें भरोसा। कब नहीं बंधाई आशा!
अज्ञेय की एक आरंभिक रचना है :
उड़ चल हारिल लिए हाथ में
यही अकेला ओछा तिनका
उषा जाग उठी प्राची में
किसकी बाट भरोसा किनका!

पंछी हर हाल में अच्छे लगते हैं, जब भी, जब कभी उन्हें हम देखते हैं, घोंसलों में, घास पर चलते हुए, डाल-डालियों-तारों पर, छज्जों-बरामदों में, खिड़की पर, उसके पल्लों में झूलते हुए, और कभी-कभी सचमुच किसी झूले पर बैठे हुए, उनको हवा के संग लहराते हुए- और उड़ान भरते हुए तो देखते ही हैं!
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की, एक बड़ी सुंदर कविता है, ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’। पाठ्यपुस्तकों में भी है, और कई बार लड़के-लड़कियों के मुंह से, कम से कम यह एक पंक्ति सुनी है- ‘हम पंछी उनमुक्त गगन के।’

पंछियों के पिंजरे वाले दिन काफी कुछ तो लद गए हैं। बहेलियों की बात भी अब कम होती दीखती है। हां, उन्हें उन्मुक्त गगन में ही उड़ना चाहिए। वही उनकी जगह है। वास्तव में। पर, धरती भी उनकी उतनी ही है, और धरती के जल-भंडार, जलाशय, समुद्र, नदियां, नहरें, ताल-तलैया भी उनके उतने ही अपने हैं।
‘अज्ञेय’ की असाध्य वीणा में यह अनूठा बिंब है : ‘कमल-कुमुद पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित जलपंछी की चाप।’

पंछी, जलपंछी- इस रूप में भी उनका विभाजन किया जा सकता है, और उस रूप वाले भी तो हैं ही, जो जल-थल दोनों के हैं। वे आकार में नन्हे भी होते हैं, और बड़े भी। हंस, सारस आदि। नन्हे इतने जैसे एक अंगूठे के बराबर। वे काले, भूरे, सफेद, पीले, नीले आदि भी होते हैं, और कई ऐसे, जिनके पंखों में कई रंग भरे होते हैं। सालिम अली जैसे ‘पक्षी पर्यवेक्षक’ ने अपनी पुस्तकों में ये रंग गिनाए भी हैं। अनंत है यह पंछी संसार। जितना उसके भीतर उतरिए, उतना ही आनंद उसके भीतर से प्रवाहित-संचरित होकर आप तक चला आता है।
पंछी आते हैं। आते रहें। यही कामना है। ०

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