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खोया हुआ युवा

आज की युवा पीढ़ी अजीब संक्रमण के दौर से गुजर रही है। उसमें कुछ करने, कुछ पाने की बेचैनी तो है, कहीं पहुंचने की हड़बड़ी तो है, पर साफ दिखता है कि उसका दिशाबोध कहीं खो गया है। वह एक साथ बहुत कुछ पाना चाहती है, बहुत कुछ करना चाहती है, पर परिणाम सार्थक नहीं दे पाती। उसे बाजार की चमक, तकनीकी संसाधनों की धमक लुभाती है, वह उसका भरपूर दोहन भी करती है, पर एक अजीब तरह की विचार-शून्यता में जी रही है। न वह ठीक से अपनी परंपराओं से जुड़ी रह पाई है और न ठीक से नएपन से तालमेल बिठा पा रही है। आज की युवा पीढ़ी की स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं सुधीश पचौरी।

Author May 6, 2018 01:12 am
एक वक्त था, जो बहुत पुराना नहीं हुआ है, जब युवाओं में कुछ नई हरकतें और नई हलचलें थीं।

एक वक्त था, जो बहुत पुराना नहीं हुआ है, जब युवाओं में कुछ नई हरकतें और नई हलचलें थीं। पिछली सदी के सातवें दशक में दुनिया भर के युवा की प्रोफाइल एक ‘विद्रोही’ की थी। वह ‘यथास्थिति’ का, ‘यथास्थितिवाद’ का विरोधी था और बदलाव चाहता था। विएतनाम की आजादी चाहता था और हमलावर अमेरिका का विरोध करता था।
इसका असर चौतरफा था। फ्रांस में छात्रों ने दगाल की सरकार को हिला दिया था। अमेरिका में विएतनाम विरोधी प्रदर्शनों ने वहां के शासकों को विएतनाम से हटने को विवश कर दिया था। कुछ बरस बाद भारत में भी युवा का यही विद्रोही रूप उभरा, नक्सलवाद आया, मार्क्सवाद पर बहसें, पूंजीवाद पर बहसें रहीं, विकल्प की बातें होतीं, साहित्य-संस्कृति में, यहां तक कि फिल्मों में समांतरतावादी आंदोलन चले। साहित्य बदला, उसका सुर बदला, तेवर बदले, क्योंकि बदलाव की मांग नीचे से ऊपर तक रही।
तब पढ़ाई और करिअर ही काफी नहीं था, पढ़ाई और करिअर के साथ विरोध का स्वर भी जरूरी था।
आपातकाल के बाद एक बार फिर युवा का मिजाज बदला। वह एक ही साथ पढ़ने वाला और बदलने वाला बना। इस दौर में भी वह एक आकुलता भरा युवा रहा, जिसे कुछ नया करना है, कुछ बनाना है। करिअर ही जीवन नहीं है, करिअर एक साधन है, साध्य कुछ बड़ा है। बड़ा विचार, बड़ा आइडिया, कुछ बड़ा करके दिखाना, अपने से बाहर निकलना और समाज को बनाना था।

तब तक हर युवा के पास उसका गांव, उसका मुहल्ला, उसका शहर, उसका राज्य, उसका देश, उसका समाज था, उसकी संस्कृति थी और आग्रह-दुराग्रह थे। तब तक हर युवा के पास उसका शास्त्र रहा, कोई सिद्धांत, कोई रचनात्मक विचार, कोई विकल्प रहा, चिंतन रहे, चिंताएं रहीं, विकल्प रहे न जाने कितने संगठन, कितनी स्वयं सेवी संस्थाएं और केंद्र बने और चीजें राजनीतिक, वैचारिक बनीं। एक ओर बड़ी सत्ता रही, दूसरी ओर उसे बदलने वाले नाना विकल्पों के नक्शे रहे और इन विकल्पों के लिए बहसें रहीं, विचार रहे। विचारक रहे। उनके संदर्भ रहे। एक प्रकार का आदर्शवाद सामने रहा।युवा के पास उसका एक लोक रहा और एक शास्त्र रहा, एक समाज रहा, एक सिद्धांत रहा, एक विचार रहा या विचारों का गुच्छ रहा! हर एक के पास एक नई उत्तेजना रही, जो देर तक सबको सक्रिय रखती रही।

इसके बाद नब्बे का दशक आया और चीजें बदलने लगीं। उसके बाद की दुनिया तेजी से बदली। सोवियत संघ गिरा। दुनिया दो ध्रुवीय की जगह एक धु्रवीय होकर रह गई। दुनिया उत्तर-औद्योगिक दौर में प्रवेश कर गई। आधुनिकता की जगह उत्तर-आधुनिकता का दौर आ गया। स्थानीयता के बरक्स हर चीज ग्लोबल हो गई। कंप्यूटर क्रांति हो गई। सूचना क्रांति हो गई, टीवी क्रांति हो गई, उपभोक्ता क्रांति हो गई। विश्व बाजार से जुड़ाव हुआ। सेवा क्रांति हुई। कमोडीफिकेशन हो गया। कार क्रांति हो गई, मोटरसाइकिल क्रांति हो गई, मोबाइल क्रांति हो गई, इंटरनेट क्रांति हो गई, टू जी से फोर जी, फाइव जी तक आ गए। फेसबुक क्रांति हो गई, ट्विटर क्रांति हो गई, इंस्टाग्राम क्रांति हो गई, वाट्सऐप क्रांति हो गई।

युवा एक नया उपभोक्ता बन गया। वह एक विराट आभासी दुनिया का नागरिक बन गया। उसके आसपास की दुनिया एकदम बदल गई। इस जगत में सब कुछ है। सफलता की चमक है, ताकत है, एक हंसता हुआ ‘वितुष्ट’ उपभोक्ता जीवन है, कामना का साम्राज्य है। पर वह विचार, वह आकुलता, वह बेचैनी, वह असंतोष और सहमति नहीं है, जो किसी भी वक्त के अग्रगामी युवा की पहचान होती है। अब तो फिल्म जंजीर या दीवार का ‘एंग्री यंग मैन’ तक नहीं रहा। एक से एक बढ़िया टू-थ्री-फोर बीएचके घर है, ईएमएआई है, लोन है, आने-जाने के लिए कार है, मोटरसाइकिल के पीछे बैठी लड़की है। खाने के लिए कुरकुरे हैं, पीने के लिए आरओ पानी है, कोक है, पेप्सी है, एनर्जी ड्रिंक्स हैं।

कस्बों में, गांवों में टीवी है, मोाबइल है, लेकिन सर्वत्र एक जैसी महानगरीय मेट्रोवादी ख्वाहिशें हैं, कस्बों-गावों के युवा रोजगार से वंचित हैं, अवसर रहित हैं। अभाव है, लेकिन इच्छाएं दिल्ली वाली हैं, इसलिए गुस्सा है, छीन-झपट, एक अनागरिक जीवन है, न बदल सका एक अर्द्ध-आधुनिक अर्द्ध-फ्यूडल दिमाग है, जिसके पास मोबाइल है, जिससे वह दुनिया से जुड़ा है और जितना जुड़ा है उतना ही बेजुड़ा है। सबसे भयानक बदलाव गावों-कस्बों में आया है, जहां सामुदायिक जीवन, जातीय जीवन, कुल-खानदान से नियंत्रित जीवन अचानक अनियंत्रित हो गया है और बड़े नगरों में पलायन है। इस पचास-साठ करोड़ युवा-युवती-जगत के पास यों तो पचास-साठ करोड़ चेहरे हैं, लेकिन सबका एक औसत चेहरा भी है। सबके पास एक न्यूनतम चेहरा है, मानो सबका चेहरा एक ही कारखाने में, एक जैसे सांचे में ढला हो: जीन्स-टीशर्ट, हाथ में स्मार्ट फोन, नीचे मोटर साइकिल पीछे बैठी गर्लफेंड! सिर मशरूम कट या कुछ बौद्धिक-सी छवि, कुछ दाढ़ी बढ़ी हुई, कुछ बड़े-उलझे बाल।

दूसरा चेहरा है इक्जीक्यूटिव, एमबीए करते, आइटी करते, फार्मल ड्रेस- काला सूट-टाई, जूते पहने, अंग्रेजी में बात करते, पावर पाइंट पे्रजेंटेशन देते, किसी बड़े कॉरपोरेट में काम करते या उसमें प्लेसमेंट के सपने देखते, अमेरिका की किसी बड़ी आइटी में इक्जीक्यूटिव बनने, एक नया स्टीव जॉब्स बनने का सपना देखते, एक नया जुकरबर्ग बनने का सपना देखते और जल्द ही दुनिया का सबसे बड़ा अमीर बनने के सपने देखते या किसी स्टार्ट-अप के मालिक बन डॉलरों में खेलने के सपने देखने में मस्त युवा- युवती का! जो ये नहीं कर सकते, वे रेडियो जॉकी बनने, वीडियो जॉकी बनने, हनी सिंह या बादशाह बनने के सपने देखते हैं। एक नकली नकल की नकल करते हुए अपने ही सपने की हजारवीं फोटों कॉपी जीवन जीने लगते हैं।

यह युवा अपनी मासूमियत खोकर उम्र से पहले युवा हो चला है। उसके शौक बड़ों के शौक हैं, बड़ों की दुनिया में प्रवेश के लिए जो जरूरी है, वह सब करता है। यहां नशा है, पार्टीइंग है, संपर्क साधना है, वाट्सऐप समूह बनाना है, फेसबुक पर नित्य दो-चार घंटे लगाना है, ट्वीट करना है, किसी का फॉलोअर बनना है, किसी को बनाना है, फिर दिखाना है कि मैं ही हीरो हूं, मेरे इतने फ्रेंड्स हैं, इतने फॉलोअर हैं, इतनों को मैंने ड्रॉप कर दिया, इतनों को लिस्ट में शामिल कर लिया। सुबह-दोपहर-शाम-रात में एक साइबर, आभासी कुश्ती लड़ना, इसे मारना, उसे उठाना…।

न समाज है न शास्त्र है, सीधे ‘सेल्फीयुग’ में छलांग है। आत्म या ‘सेल्फ’ अब अर्जित नहीं करना पड़ता, वह एक ‘क्लिक’ से मिलता है। यह आत्म का ‘रिक्त’ होना है, शुद्ध अनात्म होना है। यह नए युवा की हालांकि अतिसरलीकृत, पर सचमुच की मन:स्थिति है। दूसरे शब्दों में, यह मनोव्याधि है। इस जगत के समांतर एक आभासी जगत में मेरे अनार्जित ‘मैं’ की सत्ता है, जिसे मैं सत्ता प्रतिक्षण बनाता हूं और सहमत होने वालों का इंतजार करता हूं, जो असहमत हैं उनको हटाता हूं, हेट करता हूं, ट्रोल करता हूं। मैं सिर्फ पसंदों (लाइक्स) के लिए जीता हूं, जोे मुझे डिसलाइक करे वह नालायक है। मैं उसे उड़ा देता हूं। मैं स्वयं ईश्वर हूं, मैं अपने को ही पूजता हूं। अपनी पसंदों और लाइक्स के बीच सुरक्षित रहता हूं। पसंद नापसंद भी अब सिर्फ बनी-बनाई ‘भाव छवि’ हैं, ‘इमोजी’ हैं। इस तरह मैं अपने सिरजे इस ‘इको चेंबर’ में मस्त रहता हूं।  यहां न किताब है, न सिद्धांत है, न कमिटमेंट है, न समाज है। उनकी जगह मेरी ‘फे्रंडशिप लिस्ट’ है, फॉलोअरों की लिस्ट है, संख्या है। यह ‘पेड’ भी हो सकती है। यह सब मेरे मोबाइल में, कंप्यूटर में, वाट्सऐप और मेरे फेसबुक अकाउंट में है।

हम सब फॉलोअर टू फॉलोअर हैं। हर समय प्रतिक्रियायित हैं। ‘मत’ वाले ‘ओपिनियन वाले’ हैं। तुरंता प्रतिक्रिया ही चिंतन है। प्रतिक्रिया ही विचार है। यही दर्शन है। यह वो वक्त है कि ओपिनियन सबके पास सोचा-समझा, अपना अर्जित किया एक मौलिक विचार किसी के पास नहीं। सबके पास किसी की ओपिनियन की हजारवीं-लाखवीं फोटोकॉपी है।
जीवन सरल हो गया है। मूल पुस्तक को पढ़े बिना, किसी के नोट्स की फोटोकॉपी से काम चल जाता है। लोग इतना पहले ही कर गए हैं, अब कौन मगजमारी करे, स्वाध्याय करे। बाकी ज्ञान के लिए गूगल है, जो गुरु का भी गुरु है। फ्री है। जब चाहो ज्ञान की पुड़िया ले लो। नए ज्ञान के निर्माण की क्या जरूरत?

युवा तो युवा अब तो बड़े-बड़े पढ़े-लिखे तक नहीं पढ़ते, विचार नहीं करते, विचार करने वाले बुद्धिजीवी की सरेआम खिल्ली उड़ती है। जब फ्री की ‘फाटोकॉपी’ से काम चल सकता है, तो पढ़ने-सोचने का सिरदर्द क्यों मोल लें? ऐसी इंटलेक्ट और इंटेलेक्चुअल की क्या जरूरत, जो जोखिम बन जाए?
ज्ञान से दुश्मनी का एक संपूर्ण पैकेज मिल रहा है।
आप आज के किसी युवा की छवि बनाएं, आपको वह कुछ इस तरह की मिलेगी: हाथ में मोबाइल, कान में आडियो, मुंह के सामने एक बोलने का स्पीकर और आभासी जगत से संवाद। बगल में चलते आदमी से ‘नो टाक’। दुनिया से ‘कनेक्ट’, अपने पास वाले से ‘नो कनेक्ट’! यह आभासी जगत एक ऐसा ब्लैक होल है, जिसमें युवा घुसे रहता है और वह ब्लैक होल उसे वापस उगलता रहता है।

यह नई दिमागी गुलामी है: ज्ञान चाहिए तो गूगल है। समझ चाहिए तो यू टयूब है, जो मांगोगे वही मिलेगा। न कहीं आना, न कहीं जाना। सब कुछ एक क्लिक दूर है। दुनिया से जुड़े हैं, लेकिन घर से, पास-पड़ोस से बेगाना हैं। सुनना कम है, देखना कमतर है, आबजर्वेशन कमतर है। सिर्फ बोलना है, पोस्ट लिखनी है। मैसेज भेजना है, लाइक करना है, डिसलाइक करना है। मैं उसे लाइक करता हूं, वह मुझे लाइक करता है- मेरे सुख का जगत इतना भर है। यही वीरता है, यही शूरता है, यही व्यक्तित्व है और यही कृतित्व है।
करोड़ों युवा कामनाएं मुरझा गई हैं। बड़े बनने के सपने गरीबी ने दसवीं-बारहवीं तक छीन लिए हैं। एक नौकरी निकलती है, तो दस हजार आवेदन करते हैं। अपना युवा जगत एक विराट बेरोजगार जगत है, जिसे कभी हम मोटरसाइकिल दनदनाते उन्मद समूहों में देखते हैं या दलों के लिए नारे लगाने वालों के रूप में देखते हैं। एक सार्थक श्रम से वंचित और अपने ज्ञान से वंचित पीढ़ी किसी भी दिशा में बहलाई-फुसलाई और भड़काई जा सकती है।

अधिक हुआ तो अपना युवा एक एनजीओ हो जाता है। वह झंडा उठा सकता है, आपका एजंडा लागू कर सकता है। चुनाव उसके लिए रोजगार का सबसे बड़ा अवसर है।
ऐसा नहीं कि वह एकदम बर्बाद है। नहीं, उसके सपने, उसकी कामनाएं उसके विचार की क्षमता सब किसी ने शॉर्ट सर्किट कर दी है। वह एक फ्यूज्ड बल्ब है। करंट देने पर भी जल नहीं पाता। जो आगे निकल गए हैं, उनको लुढ़कने का डर है। जो पीछे रह गए हैं, उनको हीनता संचालित गुस्सा है। इसे आसानी से घृणा में, घृणा भाषण में बदला जा सकता है। दंगाई में बदला जा सकता है और हिंदू मुसलमान में बदला जा सकता है।

जो काम करता है, वह तुष्ट नहीं। जो नहीं करता, वह असंतुष्ट है। सब्जी बेचता है। छोटी दुकानों, दफ्तरों में काम करता है। अमेजन, फ्लिपकार्ट के आर्डर को अपनी पीठ पर ढोकर आपके घर तक लाता है। बस अड्डे पर, रेलवे स्टेशन पर पानी बेचता है। वह रिक्शा चलाता है, आॅटो चलाता है, टैक्सी चलाता है, लेकिन उसके मन में एक दर्द कसकता है: कम पढ़ पाने का दर्द। पीछे छूट जाने का दर्द और सपनों को छोड़ देने का दर्द! यह दर्द जब रचनात्मक नहीं हो पाता, तो यही उसे मारपीट करने वाला, शारीरिक ताकत से छीनझपट करने वाला, चोर-उचक्का, छेड़छाड़ करने वाला और रेपिस्ट तक बना देता है। दलीय सुरक्षा उसे दंगाई बना देती है। उसकी ‘तंग नजर’ में सब बातों का इलाज मारधाड़, सुपारी और हिंसा है यहां डायलाग नहीं होते। सीधे ‘हिसाब’ होते हैं। जनतंत्र उसके लिए एक आफत है, असहमति और मतभेद उसके लिए असह्य है। आत्मरति में डूबे रहने वाले व्यक्ति को आलोचना पंसद नहीं आती।

अधिकारों के प्रति सजगता और अपनी बात को वायरल कर देने की कला ने उसमें कुछ नाराजगी भरी है, लेकिन ये नाराजियां सत्ताओं द्वारा आसानी से गोद लेकर पुचकार दी जाती हैं। पर बहुत जल्द वह अपने गुस्से के कारणों को भूल जाता है। भुलाने के सामान भी कम नहीं। अकेलापन, गुस्सा, नशा और पोर्न आभासी दुनिया की नई अलामते हैं। आप जिस आभासी जगत में हरदम रहते हैं, उसकी अनंतता और अनजानेपन से त्रस्त आप उसे जीतने के लिए आकुल रहते हैं और जब आप सिर्फ एक मत और एक चित्र बन कर रह जाते हैं और औरों को भी वैसा करते देखते हैं, तो आप कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि लोगों का ध्यान आपकी ओर जाए। इसके लिए आप कुछ भी कर सकते हैं, एक से एक उत्तेजक घृणा भाषण दे सकते हैं, अपनी हिंसा को, हत्या का सीधा प्रसारण कर सकते हैं। आप ऐसा कुछ भी कर सकते हैं, जिससे दुनिया आपको जाने, चाहे दो सेकेंड ही जाने! एक पूरी पीढ़ी अपने भीतर से ‘खाली’ हो रही है। ऐसी खाली पीढ़ी सिर्फ तस्वीरों, चिह्नों में जीती है, ओपिनियनों में जीती है और साइबर संसार में अपने को प्रिय पाकर वह वास्तविक संसार का खुदा समझती है।

यह आाभसी जगत वास्तविक को दरकिनार कर देता है और आप निंरतर एक ‘हाइपर रीयल’ में रहने लगते हैं और इस तरह एक हवा हवाई यानी ‘उड़ता जीवन’ जीने लगते हैं। आप अपने फेक को रीयल समझने लगते हैं। जमीनी यथार्थ आपके लिए सिर्फ एक फोटो है, जिसे उसने सिर्फ अपनी पसंद से आपके जमीनी यथार्थ पर चिपका दिया है। बिना अपने समाज से साक्षात जुड़े, बिना उसके दुख-सुख में हिस्सा लिए आप एक बने-बनाए दुख-सुख में हिस्सा लेते हैं। उसके लिए दुख भी आभासी है, सुख भी आभासी है।

अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद यह युवा ज्ञानी-समाज की हमदर्दी का पात्र है। ‘केअर’ का पात्र है। अगर यह अपने मोबाइल से उतर, अपने वाट्सऐप, अपने फेसबुक से उतर, अपनी दनदनाती मोटरसाइकिल से उतर कर जमीनी यथार्थ को बार-बार स्पर्श करे, सूंघे, उसकी आवाजों को अपने आसपास की आवाजों को कानों से सुने, आसपास की जनता की परेशानियों को अपनी आंखों से देखे और सोच-विचार कर विकल्प खोजे, तो जमीनी विकल्प अवश्य मिलेंगे। विकल्प कभी बने-बनाए नहीं मिला करते। उनको धैर्य से मेहनत से, उदारता से सहनशीलता से बनाना होता है! आभासी दुनिया की चमक में खोया हुआ यह युवा अपने आप को तभी पा सकता है! वाट्सऐप और फेसबुक आदि अपने आप में अलम नहीं। असली चीज साक्षात ऐंद्रिक जीवन है। उसे छुए बिना, उसे जिए बिना हकीकत से नहीं मिल सकते। १

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