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नन्हीं दुनियाः पाश्चात्ताप

मीता दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसके परिवार में मम्मी-पापा और एक भाई था मलय। इधर कुछ समय से मीता के स्वभाव में बदलाव आने लगा था। उसे घूमना-फिरना, महंगी चीजें खरीदना अच्छा लगता।

Author May 6, 2018 1:58 AM

पारुल शर्मा

मीता दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसके परिवार में मम्मी-पापा और एक भाई था मलय। इधर कुछ समय से मीता के स्वभाव में बदलाव आने लगा था। उसे घूमना-फिरना, महंगी चीजें खरीदना अच्छा लगता। वह हमेशा अपनी सहेलियों के साथ मौज-मस्ती करना चाहती थी। पर स्कूल की पढ़ाई भी जरूरी थी। इसलिए उसकी मम्मी उसे समय पर काम पूरा करने की हिदायत देती रहतीं। मगर वह तो ठहरी मनमौजी। मम्मी की टोका-टाकी उसे पसंद नहीं आती। उसकी एक सहेली थी रमा। रमा और उसकी बहुत पटती थी। दोनों स्कूल साथ जातीं। एक दिन स्कूल जाते समय रमा कुछ उदास थी। मीता ने उससे कहा, ‘आज तो तुम्हारा बस्ता बड़ा चमक रहा है। नया है क्या?’ रमा अपनी दादी के बारे में सोच रही थी। उसने बताया कि दादी की तबीयत बहुत खराब है। पहले उन्हें बहुत तेज बुखार आया, फिर बेहोश हो गर्इं। पर मीता का ध्यान रमा के बस्ते पर था। उसने रमा की बात को अनसुना कर दिया और बोली, ‘बता न कहां से खरीदा नया स्कूल बैग। मुझे भी ऐसा ही बैग खरीदना है।’ रमा ने बुझे मन से कहा, ‘यह तो मेरे पापा लाए थे।’

दोनों घर पहुंचीं। मीता ने टाई खोल कर दूर पटकी। जूते तेजी से उतारे और पुराने बस्ते को जोर से पलंग पर पटकते हुए मां से बोली, ‘मुझे नया बैग चाहिए। रमा ने भी नया बैग खरीद लिया है। बस मैं ही हूं, जो पुराने बैग में किताबें ले जा रही हूं। मुझे कब मिलेगा नया बैग।’ मां ने कहा, ‘दिला देंगे। पहले हाथ-मुंह धोकर खाना खा लो।’ मां की बात सुनते ही मीता को गुस्सा आ गया। वह पैर पटकती हुई अपने कमरे में गई। वहां से उसने जोर-जोर से मां को जवाब देना शुरू कर दिया- ‘आप हमेशा मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं। मेरी क्लास के सब बच्चे नई-नई चीजें लाते हैं। आप सबसे बाद में दिलाती हैं।’ मां बोलीं, ‘खाना खा लो, शाम को जब पापा आ जाएंगे मैं उनसे बात करूंगी।’ पर मीता को तो जैसे जिद सवार थी। उसने मां का हाथ जोर से झिड़का और टेबल पर हाथ मारा। सारा खाना जमीन पर बिखर गया। मीता का भाई भी उसके व्यवहार से डर गया। मां जैसे ही कुछ बोलने को हुर्इं, मीता चिल्ला पड़ी- ‘मुझे नहीं खाना, नहीं खाना। मत दिलाओ नया बैग। मैं तो ऐसे ही करूंगी। चली जाओ मेरे सामने से। न मुझे खाना अच्छा लगता है न आप। गंदी मम्मी। मुझे नहीं चाहिए ऐसी मम्मी।’ वह पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई।

मीता की मम्मी उसकी रोज की जिद और बढ़ते गुस्से से बहुत परेशान थी। वह मीता को जितना समझातीं, प्यार दुलार करना चाहतीं, मीता और जिद्दी होती जा रही थी। शाम को मीता के पापा घर आए तो दिन भर की घटना जान कर वे भी बहुत परेशान हुए। वे मीता के कमरे में गए। उसे पुचकारा और कहा, ‘देखो अब तुम बड़ी हो रही हो, मां से ऐसा व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता। एक स्कूल बैग पर इतना गुस्सा! चलो तैयार हो जाओ, बैग दिला देते हैं।’

मीता का नया स्कूल बैग आ गया था। उसे लेकर इठलाती हुई वह स्कूल पहुंची। उसे लगा कि कोई उसकी तरफ नहीं देख रहा, न ही बैग की तारीफ कर रहा है। तभी उसकी निगाह संजय के पास जुटी बच्चों की भीड़ पर पड़ी। वह भी उस ओर बढ़ी। सोचा, देखूं तो माजरा क्या है। संजय के हाथ में नया मोबाइल था। वह बड़ी शान से सबको दिखा रहा था। मीता की आंखें चमक उठीं। मोबाइल! मीता सोचने लगी, पापा कह रहे थे मैं बड़ी हो गई हूं। तो क्या मुझे भी मोबाइल मिल सकता है। मीता सोचने लगी, कितना मजा आएगा जब मैं मोबाइल से सेल्फी लूंगी। दोस्तों, सहेलियों से बात कर सकूंगी। अपनी फोटो भी भेज सकूंगी। मीता का मन मोबाइल के लिए मचलने लगा।

मीता की नई फरमाइश सुन कर पापा हैरान रह गए। फिर बोले, मोबाइल तो स्कूल में ले जाने की इजाजत नहीं है और फिर पढ़ाई! मीता की मां ने भी पापा की बात का समर्थन किया। मीता को मां का बोलना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। फिर भी मां के गले में हाथ डाल कर बोली, ‘मां तुमसे बात करने में कितनी आसानी होगी। मुझे स्कूल से या ट्यूशन से आने में देर होती है, तुम मेरी सहेलियों के घर फोन करती रहती हो, मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरे पास फोन होगा तो कोई परेशानी नहीं होगी।’
मीता के तर्कों के सामने माता-पिता चुप रह गए। मीता का नया मोबाइल आ गया था। अब तो मानो मीता के कदम जमीन पर ही नहीं थे। दोस्तों पर रौब जमाने का नया खिलौना जो उसके हाथ लग गया था। सुबह-शाम बस सेल्फी और दोस्तों की फोटो खींचती।

एक दिन मलय ने मीता का फोन छिपा दिया। मीता ने घर में हंगामा खड़ा कर दिया। मां ने दोनों की लड़ाई रोकने की कोशिश की, पर मीता ने मां की एक न सुनी और मलय के हाथ से फोन लेने को झपटी। मां ने मलय से फोन लिया और गुस्से में जोर से जमीन पर पटक दिया। बोलीं, ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।’ फोन के दो टुकड़े हो गए। मीता अपने मोबाइल की ऐसी दुर्दशा देख चिल्लाने लगी, ‘मैं आपसे नफरत करती हूं। मुझे नहीं चाहिए ऐसी मां।’

अगले दिन मीता की मां को तेज बुखार आ गया। मलय ने देखा कि मां बिस्तर पर लेटी हुई है, लेकिन मीता मां को अनदेखा कर भीतर चली गई। मलय ने मां का माथा छुआ, वह तप रहा था। वह जल्दी से एक कटोरी में पानी लाया और मां के सिर पर पट्टियां रखने लगा। मीता ने फ्रिज खोला और ब्रेड पर जैम लगा कर खाने लगी। शाम को पापा मां को अस्पताल ले गए। वहां डॉक्टरों ने उनको दाखिल कर लिया। मलय ने पूछा, ‘मां कहां है? मीता भी पीछे खड़ी थी। पापा ने बताया मां अभी दो-चार दिन अस्पताल में ही रहेंगी। पापा की बात सुन मीता को रमा की दादी की बात याद आई। वह डर गई। उसने पापा से कहा, ‘मैं आपके लिए चाय बना दूं?’ पापा मना करते इससे पहले वह रसोई में चाय बनाने लगी। वह सोचने लगी, क्या मैं इतनी बुरी हूं। सबसे लड़ती हूं। अपनी मम्मी से भी।

वह चाय लेकर गई और पापा से बोली- ‘पापा मुझे माफ कर दो। मेरी वजह से मां की तबीयत खराब हुई है। पापा मुझे मां के पास ले चलो। मैं उनसे माफी मांगना चाहती हूं। मैं अभी मां के लिए खिचड़ी बनाती हूं।’ पापा और मलय मीता के बदले व्यवहार से चकित थे। पापा बच्चों को लेकर अस्पताल पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘लो, मीता ने तुम्हारे लिए खिचड़ी बनाई है।’ मां ने खाने का डिब्बा हाथ में लिया और उनके आंसू छलक आए। मीता मां के गले लग कर रोने माफी मांगने लगी। ०

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