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सौंदर्य के बाजार में पुरुष, प्रसाधन का कारोबार और भेदभाव के रंग

अभी तक सजना-संवरना सिर्फ महिलाओं का शौक माना जाता था, पर अब पुरुष भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। पहले गोरेपन की क्रीम का कारोबार महिलाओं को रिझाने में लगा था, पर अब विशेष रूप से पुरुषों के लिए भी ऐसी अनेक क्रीमें बाजार में उपलब्ध हैं। हालांकि सौंदर्य प्रसाधन के प्रति रुझान केवल गोरा दिखने तक सीमित नहीं है। पुरुष अपनी त्वचा को निखारने, बाल कटवाने, युवा दिखने के हर वे उपाय आजमाने लगे हैं, जो पहले महिलाएं आजमाया करती थीं। इस तरह सौंदर्य प्रसाधन और सुंदरता निखारने के कारोबार में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पुरुषों में बढ़ते इस रुझान और सौंदर्य प्रसाधन के बाजार का विश्लेषण कर रही हैं क्षमा शर्मा।

Author Published on: March 31, 2019 2:05 AM
44 प्रतिशत पुरुष लगभग अपने सौंदर्य को बढ़ाने के लिए और खुद की पसंद के उत्पाद ढूंढ़ने के लिए उतना ही समय खर्च करते हैं, जितना कि औरतें। मार्केट रिसर्च ऐजेंसी मिनटेल के एक सर्वे में यह पाया गया।

अब तक सौंदर्य पर स्त्रियों का एकाधिकार रहा है। लड़कियों और बहुओं को ही सुंदर-असुंदर की तुला पर तोला जाता रहा है। विवाह के बाजार में सुंदर यानी की गोरी लड़कियों की भारी मांग की जाती है। इसीलिए तमाम बड़ी अभिनेत्रियों के माध्यम से ऐसे उत्पादों और क्रीमों का जोर-शोर से विज्ञापन किया जाता है, जिन्हें लगाने से ये गोरी हो गईं। इनकी त्वचा निखर गई। इनके ऐसा कहने से उम्मीद की जाती है कि बाकी की लड़कियां इनसे प्रेरणा लेकर इन उत्पादों का इस्तेमाल करेंगी और इन्हें बनाने वाली कंपनियों की झोली भर देंगी। ऐसा होता भी है। लेकिन अब पुरुषों में भी सुंदर दिखने-दिखाने की चाहत बढ़ रही है। इसीलिए शाहरुख खान एक फेयरनैस क्रीम का विज्ञापन करते हैं। सालों पहले ए एंड एम नामक पत्रिका ने सर्वेक्षण में पाया था कि गोरेपन की क्रीमों का उपयोग बड़ी संख्या में पुरुष करते हैं। दक्षिण भारत में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है। सारे सोलहशृंगार अब तक औरतों के लिए रहे हैं। उन्हें कैसे सजना-संवरना चाहिए, इसे प्राचीन ग्रंथों से लेकर आज तक का मीडिया बताता रहता है। सौंदर्य को औरत का एमपावरमेंट या सशक्तिकरण बताया जाता है। कहा जाता है कि सुंदर दिखने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है। तमाम उत्पादों ने भी लगातार ऐसी छवि बनाई है कि जो औरत सुंदर है, वही कमनीय है और जैसे वही जीने योग्य है। रोजगार से लेकर विवाह के बाजार तक उसी का स्वागत है, मांग है। क्योंकि औरत का मतलब सुंदर, और पुरुष का मतलब बलवान। छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरों तक के बाजार सौंदर्य बढ़ाने का वादा करते उत्पादों से भरे पड़े हैं। इनमें भी त्वचा को चमकदार और गोरा बनाने वाले उत्पादों की भरमार है, जबकि डॉक्टरों और त्वचा विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया में कोई भी क्रीम गोरा नहीं बना सकती। हां, इनके अधिक प्रयोग से त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियां जरूर हो सकती हैं।

मगर औरतें ही नहीं, अब पुरुष भी सिर्फ बलवान और ‘माचो’ नहीं, सुंदर और स्मार्ट दिखना चाहते हैं। सौंदर्य प्रसाधन बनाने वालों के लिए यह सुनहरा मौका है, इसलिए वे अब पुरुषों को भी तरह-तरह से लुभा रहे हैं। अपने उत्पादों की लोकप्रियता के लिए मशहूर हस्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें अपना ब्रांड एंबेसडर बना रहे हैं। उनके लिए बनाई जाने वाली क्रीमों, बालों को काला करने वाले रंग या खिजाब आदि के विज्ञापनों के लिए बड़े-बड़े अभिनेताओं को चुन रहे हैं। पुरुषों के लिए ब्यूटी पार्लर से लेकर तमाम किस्म के सैलून खुलते जा रहे हैं। बालों को भी किस और कितनी तरह से बनाया जाए, कैसे बनाया जाए यह सीख रहे हैं। यहां तक कि दाढ़ी-मूंछें भी। हाल ही में जब विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान से आए तो उनकी जैसी मूंछें बनवाने की होड़ लग गई। पुरुष अपनी ऐसी मूंछें बनवा कर सोशल मीडिया पर अपने फोटो साझा करने लगे। मानो अभिनंदन की जिस वीरता की बातें मीडिया में छाई रहीं, उनका मुख्य कारण उनकी मूंछें ही हों। इसलिए वैसी ही मूंछें चाहिए। अब पुरुष सिर्फ अपने बालों तक सीमित नहीं हैं। वे अपनी त्वचा को भी आकर्षक बनाना चाहते हैं। यही नहीं, चेहरे और शरीर पर पड़ी झुर्रियां हटवाने के लिए बोटोक्स के इंजेक्शन लगवा रहे हैं। वे अपनी त्वचा को किस तह से आकर्षक और युवा दिखाएं इसके लिए समय-समय पर त्वचा विशेषज्ञों के पास जा रहे हैं।

प्रसाधन का कारोबार: अगर सोचें कि आखिर कौन से पुरुष खुद को अधिक स्मार्ट और सुंदर दिखाने की दौड़ में शामिल हैं, तो पता चलेगा कि ये वे लोग हैं जिनकी जेब में इतने पैसे हैं कि वे अपनी तमाम दैनंदिन जरूरतों को पूरा करने के बाद खुद को अच्छा और सुंदर दिखाने के लिए इन्हें खर्च कर सकते हैं। यानी कि मध्यवर्ग के पुरुष। इसीलिए कंपनियां अब ऐसे-ऐसे उत्पाद लेकर आ रही हैं, जो इन पुरुषों की इच्छाओं, कामनाओं और जरूरतों को देख कर बनाए गए हैं। बताया जाता है कि बाजार में इस तरह के छिहत्तर उत्पाद फिलहाल मौजूद हैं। जबकि 2009 में ऐसे उत्पादों की संख्या मात्र अठारह थी। दिलचस्प तो यह है कि अब भारतीय पुरुष भी अपने सौंदर्य को बढ़ाने वाले उत्पादों को खोजने में उतना ही समय खर्च कर रहे हैं, जितना महिलाएं करती हैं। यहां तक कि वे सौंदर्य और स्मार्टनेस बढ़ाने वाली उन बातचीतों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं, जो अब तक महिलाओं के लिए ही मानी जाती थीं। पुरुषों की यह चाहत महानगरों तक ही सीमित नहीं है। छोटे शहरों में भी अब बोटोक्स और लेजर ट्रीटमेंट पुरुषों के बीच तेजी से जगह बना रहे हैं। भारत के शहरों में दस में से दो पुरुष चेहरे को ठीक कराने के लिए क्लीनिक्स में जा रहे हैं। नाक और जबड़ों को ठीक करा रहे हैं। पांच साल पहले पुरुषों के लिए ज्यादा से ज्यादा त्वचा की साधारण देखभाल या खुजली मिटाने वाले सलाहकार होते थे। जबकि अब वे अपने माथे की रेखाएं ठीक करा रहे हैं। आंखों के आसपास पड़ी क्रो लाइंस को ठीक कराने आ रहे हैं। पंद्रह से बीस प्रतिशत चेहरे के दाग, धब्बे मिटवा रहे हैं। इस इलाज में एक बार में आठ हजार रुपए तक खर्च हो रहे हैं। चेहरे की सुंदरता बढ़ाने और ठीक कराने के ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें अब तक औरतें आती रही हैं, मगर अब पुरुषों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

महानगरों में सुंदर दिखने के लिए पुरुष कितना समय खर्च कर रहे हैं। एक दिन में वे अपने शरीर पर बाइस मिनट, बालों पर इक्कीस मिनट और चेहरे पर अठारह मिनट खर्च कर रहे हैं। अगर हिसाब लगाया जाए तो कमोबेश यही स्थिति छोटे शहरों में होगी। त्वचा की देखभाल के लिए अब गोरेपन की क्रीमें तथा फेसवाश भी शामिल हो गए हैं। नीलसन कंपनी के मुताबिक गोरेपन की क्रीमों और फेसवाश का व्यापार बढ़ कर पांच सौ पचहत्तर करोड़ तक जा पहुंचा है। त्वचा की देखभाल में मदद करने वाले उत्पादों का व्यापार और बाजार हर साल नौ प्रतिशत की गति से बढ़ रहा है। पुरुषों के बीच गोरेपन की क्रीमों की भारी मांग है। इसके बाद तैलीय त्वचा और बालों से तेल हटाने वाले उत्पादों का नंबर आता है। एक मशहूर गोरेपन की क्रीम बनाने वाले अधिकारी का कहना है कि अब तक पुरुष गोरे दिखने के लिए उन्हीं क्रीमों का छिप-छिप कर इस्तेमाल करते थे, जिनका इस्तेमाल औरतें करती हैं।

इन क्रीमों को इस्तेमाल करना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। इसलिए हमने पुरुषों की दुनिया में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद खासकर गोरेपन की क्रीम बाजार में उतारी, जिसे इस्तेमाल करके वे गर्व महसूस कर सकें। हमारी क्रीम ने इस अवसर का लाभ उठाया। क्योंकि पिछले पंद्रह सालों से पुरुषों के बीच फेयर और हैंडसम का मुहावरा प्रचलित हुआ और एक तरह से उनका लीडर बन बैठा। त्वचा और बालों के मामले में पुरुष उन्हीं ब्रांडस का इस्तेमाल करते रहे हैं, जो बाजार में उपलब्ध हैं। ये अक्सर बालों की चमक बढ़ाने या रूसी को दूर करने के लिए होते हैं। लेकिन पुरुष अब अपने सौंदर्य को बढ़ाने के लिए इससे भी आगे सोच रहे हैं। और कंपनियों के लिए लाभ प्राप्त करने, नए-नए ब्रांड बाजार में लांच करने और मुनाफा कमाने का बेहतरीन मौका है। कंपनियों का कहना है कि पुरुष जिस तेजी से खुद को सुंदर और स्मार्ट दिखाने के लिए जागरूक हो रहे हैं, इससे उन्होंने महिलाओं के क्षेत्र में दस्तक दे दी है। महिलाओं के उपयोग में जो उत्पाद या ब्रांड आते हैं, उनका बाजार अगर सालाना बारह प्रतिशत बढ़ रहा है, तो पुरुष भी कोई इनसे पीछे नहीं हैं। उनकी उपस्थिति इस बाजार में नौ प्रतिशत आंकी गई है। सेल्फी जेनरेशन के आ जाने से इस बाजार की और तेजी से बढ़ने की संभावना है। उपभोक्ता कंपनियों के लिए भगवान होता है क्योंकि उसकी बढ़त ही कंपनियों के छप्पर फाड़ मुनाफे को बढ़ती है। पुरुष सौंदर्य उत्पादों को बनाने वाली कंपनियों के लिए नया भगवान है।

भेदभाव के रंग: कंपनियों के अधिकारियों की बातों पर अगर ध्यान दें तो पुरुषों की परिभाषा देने वाला पुराना मुहावरा- टाल, डार्क एंड हैंडसम अब अपनी जगह खो चुका है। पुरुषों को भी चाहिए अब गोरापन। गोरापन अब जैसे जेंडर न्यूट्रल बन चुका है। एक बात और हर एक व्यापार अपनी ही शर्तों से चलता है। वह लिंग भेद का भी बखूबी इस्तेमाल करता है। एक तरफ फेयरनैस क्रीम के विज्ञापन कहते हैं कि इन्हें लगाने वाली औरतें सशक्त होती हैं। दूसरी तरफ वे ये भी बताते हैं कि औरतों और मर्दों में भेद है इसीलिए औरतों के लिए अलग उत्पाद और पुरुषों के लिए अलग। इसके अलावा वे इस तरह का भेद दिखाने और करने में भी पीछे नहीं रहते। वरना ऐसा कैसे है कि औरतों की क्रीम को लगाने में पुरुष शर्मिंदा हों। कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने और पैसा कमाने के लिए हर हथकंडा इस्तेमाल करती हैं। गोरा बनाने की वकालत करना एक प्रकार से रंगभेद को ठीक बताना है। जहां सांवले लड़के, लड़कियों, स्त्री पुरुषों की कोई जगह नहीं। पूंजीवाद के बारे में कहा जाता था कि वह हर तरह की वर्जनाओं और रूढ़ियों को तोड़ता है। वह हर कट्टर विचार का विरोधी होता है। मगर अब हम देख रहे हैं कि पूंजीवाद अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए न केवल कट्टरवाद, बल्कि गोरेपन को बढ़ावा देने वाले रूढ़िवादी विचार को भी पाल-पोस रहा है। इसके अलावा भारत की पैंसठ प्रतिशत युवा आबादी को सिर्फ राजनेता ही नहीं विभिन्न कंपनियां भी अच्छे अवसर की तरह देख रही हैं। इन पैंसठ प्रतिशत में अगर आधी आबादी लड़कियां भी हों तो आधी आबादी लड़कों की भी है। किसी भी कंपनी के मुनाफे के लिए ये लड़के या पुरुष बहुत बड़ी संख्या है। ये युवा हैं, किसी न किसी काम में भी लगे हैं तो इनके पास खर्च करने को पैसे भी हैं। और सुंदर तथा स्मार्ट दिखने की होड़ में अधिक पैसे खर्च भी करने पड़ें तो कोई गम नहीं।

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