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विशेष: त्योहार के दिनों में स्वास्थ्य की देखभाल, उत्सव के संग सेहत का रंग

उत्वधर्मिता हमारे देश की संस्कृति है और उत्सव का मतलब है मिलना-जुलना, देवी पंडाल और मेले। लेकिन जब लोगों को इससे दूर रहना पड़ जाएगा तो उनका अवसाद में आना स्वाभाविक है। वैसे भी अक्तूबर से मौसम बदलता है, जिसका असर दिमागी सेहत पर भी पड़ता है।

कोरोना महामारी के चलते त्योहारों पर अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है।

जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।’ दुर्गोत्सव शुरू होने के पहले प्रधानमंत्री ने टीवी पर देश के नाम संदेश दिया तो इसके मायने हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ अक्तूबर के अंत से लेकर आगे के दो महीनों के लिए चिंता जता चुके हैं। त्योहारों का यह मौसम कोरोना के मामलों में चिंताजनक वृद्धि ला सकता है।

दुर्गोत्सव तो समापन पर है लेकिन अभी क्रिसमस तक के उत्सवी माहौल में अतिरिक्त उत्साह से बचना है। अभी तक उम्मीद की खबर यही है कि ये दो महीने हमने कम नुकसान के साथ निकाल लिए तो फरवरी तक हमें कोरोना को लेकर राहत मिल सकती है। इसलिए इस बार त्योहारी मौसम की सबसे बड़ी तपस्या सेहत का खयाल रखते हुए घर के अंदर ही उत्सव को उत्साह के साथ मनाना है। त्योहार एक सांस्कृतिक अवधारणा है लेकिन इस समय हमें वैज्ञानिक अवधारणा को ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत है।

त्योहार और अवसाद
उत्सवधर्मिता हमारे देश की संस्कृति है और उत्सव का मतलब है मिलना-जुलना, देवी पंडाल और मेले, लेकिन जब लोगों को इससे दूर रहना पड़ जाएगा तो उनका अवसाद में आना स्वाभाविक है। वैसे भी अक्तूबर से मौसम बदलता है, जिसका असर दिमागी सेहत पर भी पड़ता है। डॉक्टरों ने इस बात को लेकर चिंता जताई है कि त्योहारों के इस मौसम में पाबंदियों के कारण लोगों में अवसाद बढ़ सकता है। कोरोना के लंबा खिंच जाने के कारण वैसे भी देश की बड़ी आबादी अवसाद के गिरफ्त में है।

दशहरा-दिवाली, ईद की धूम के कारण लोगों को निजता से निकल कर सार्वजनिकता में जाने का मौका मिलता है और वे दिमागी स्तर पर मबजूत बनते हैं। लेकिन इस बार घरों में कैद रहने के कारण मन को खुश करने का यह मौका भी नहीं मिलने वाला है। इसलिए जरूरी यह है कि आप घर के अंदर ही उत्सवों का पूरा आनंद लें और कम संसाधनों में एक-दूसरे को खुश करने की कोशिश करें।

हमें उत्सवधर्मिता से मिलने वाली इस ऊर्जा का अहसास होता है तभी तो हम पूरे साल दिवाली, ईद, क्रिसमस जैसे बड़े त्योहारों का इंतजार करते हैं। लेकिन इस बार यह इंतजार भी नहीं है तो हमें खुद को मजबूत बनाना होगा। अपने संसाधनों के हिसाब से मन लायक पका-खाकर खुश रहने की पूरी कोशिश करनी होगी। समय और सेहत दोनों की यह साझी दरकार है।

बच्चे और बुजुर्ग
बच्चे और बुजुर्ग संवेदनशील होते हैं। अपनी उपेक्षा महसूस होते ही अवसाद में जा सकते हैं। कोरोना के समय में बच्चों और बुजुर्गों को घर में ही रहने की सलाह दी गई है। पूजा-पाठ में नियम-कायदे पूरे न होने के कारण बुजुर्गों को मानसिक अशांति हो रही है तो हर बार की तरह पूजा पंडालों में मस्ती नहीं करने के कारण बच्चों की दुनिया भी बोझिल है।

इसलिए घर में ऐसा माहौल बनाएं कि वे समझ पाएं कि सारी पाबंदियां इनकी भलाई के लिए है। बच्चे तो फिर भी अपने हिसाब से खेल-कूद कर मन बहला लेते हैं लेकिन यह वक्त बुजुर्गों के लिए सबसे कठिनाई भरा है। इसलिए घर के बुजुर्गों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं और उनके मन को बहलाने के लिए जो कुछ भी आप कर सकते हैं, जरूर करें।

बुजुर्ग जिन रिश्तेदारों को ज्यादा याद कर रहे हों, वीडियो कॉलिंग पर उनकी बात कराएं। इस बार रामलीला से लेकर बहुत सारे धार्मिक उत्सव आनलाइन हो रहे हैं तो बुजुर्गों को बड़े स्क्रीन पर उन्हें ये सब दिखाएं। बहुत से बुजुर्ग खुद से स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं तो उनकी पसंद के बारे में जान कर वो चीजें उन तक मुहैया कराएं।

याद रहे कोरोना का कायदा
त्योहारों में बाहर निकलें तो शारीरिक दूरी बरतने और मास्क पहनने का पूरा ध्यान रखें। अलग-अलग जगहों से ज्यादा खरीदारी करनी हो तो दस्ताने का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। फिलहाल खुली जगह पर खाने-पीने से बचें। गैरजरूरी चीजों की खरीदारी न करें तो ही बेहतर। त्योहार की तैयारी करते हुए घरों की सफाई भी हिसाब से करें क्योंकि ऐसा करते हुए संक्रमण का खतरा हो सकता है। अति सफाई के नाम पर शरीर को थका कर सेहत खराब करने का खतरा न उठाएं।

उत्सवों को लेकर किसी तरह के पारिवारिक और सामाजिक दबाव में न आएं। इन दिनों घरों में रहना ज्यादा होता है तो तेल, मैदा और चीनी के ज्यादा इस्तेमाल वाला खाना बहुत न खाएं। त्योहार के नाम पर किसी भी तरह की ढिलाई न करें।
(यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। उपचार या स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए विशेषज्ञ की मदद लें।)

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