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भाषा-चिंतनः निज भाषा उन्नति नहीं

संविधान का अनुछेद 351 मुख्यत: संस्कृत से और गौढ़त: अन्य भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी की समृद्धि पर बल देता है। पर हमने अपनी भाषा का विकास करने के स्थान पर अपनी नई पीढ़ी को अंगरेजी के रस में डुबो दिया।

Author September 9, 2018 4:37 AM
कहीं इस भाषाई विभाजन के कारण भी कोई वैसा ही भयानक दुष्परिणाम तो हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा?

निर्देश निधि

कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाई की भाई द्वारा हत्या नजीर क्या बनी कि इंसान किसी अपने की भी हत्या करने से नहीं चूकता। हमारी भाषा भी इस संवेदनहीनता का शिकार हो गई लगती है। ये वाक्य घिसे-पिटे लग सकते हैं कि जिसकी अपनी भाषा नहीं, उसकी कोई संस्कृति भी नहीं या हमारी भाषा हमारी पहचान होती है, पर सत्य यही है। विश्व में प्रचलित लिपियों में सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि देवनागरी से रूप लेती हिंदी को आजादी के बाद राजभाषा चुना गया। किसी देश में किसी एक भाषा को विशेष स्थान मिलना तो चाहिए ही। हिंदी पर बल इसलिए कि भले सारा भारत हिंदीभाषी नहीं था, पर हिंदी देश में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा अवश्य थी। 1949 में बत्तीस करोड़ लोगों में से चौदह करोड़ हिंदीभाषी थे। इसलिए हिंदी से ही आशा थी कि वह देश को एक सूत्र में पिरो पाती। इसी आधार पर तत्कालीन अधिकांश महत्त्वपूर्ण भारतीय, चाहे वे महात्मा गांधी हों या गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर या नेताजी सुभाषचंद्र बोस, बंकिमचंद्र चटर्जी, दयानंद सरस्वती हों, भारतेंदु या पंडित मदन मोहन मालवीय, सब समवेत स्वर से हिंदी समर्थक थे। आरंभिक विरोध के बाद राजगोपालाचारी भी हिंदी के समर्थक बन गए थे। फिर क्या हुआ, जो हिंदी अपने ही घर में अपना अस्तित्व खोती जा रही है!

महानगरों की छोड़िए, छोटे कस्बों तक में अंगरेजी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं, जहां हिंदी बोलने पर ‘आर्थिक दंड’ है। उत्तर भारत में भी बहुत से स्कूलों में दसवीं तक हिंदी अनिवार्य नहीं। माता-पिता खुश हैं, यह कह कर कि उनके बच्चे के हिंदी में ही सबसे कम अंक आते थे, अच्छा हुआ जो हिंदी से जान छूटी। अब कोई ‘स्कोरिंग सब्जेक्ट’ लिया जा सकेगा। अब उत्तर प्रदेश सरकार ‘अभिभावकों की मांग’ पर नए शिक्षा सत्र में पांच हजार स्कूलों को अंगरेजी माध्यम का बना कर हिंदी के लिए नया संकट ला रही है। अपनी बेहतर भाषा को त्याग कर अंगरेजी के लिए लालायित रहना हमारे स्वयं पर विश्वास का खंडित होना है। सदियों की गुलामी के बाद भी हमने यह सबक बिल्कुल नहीं लिया कि एकजुटता के साथ अपनी धरोहरों को सहेज कर रखना अधिक हितकर होता है।

बहुत से हिंदीभाषी बुजुर्गों को, अपने नाती-पोतों को खेलाते समय बर्ड को बल्ड और मंकी को अंकी कहते सुना है। ऐसी क्या मजबूरी है कि बच्चों को बर्ड को चिड़िया और मंकी को बंदर कह कर पुकारना नहीं सिखाया जा सकता? आखिर ये बुजुर्ग अमीर खुसरो की तर्ज पर यह क्यों नहीं कह सकते कि ‘मैं हिंदी की तूती हूं, तुम्हें मुझसे कुछ बोलना हो तो हिंदी में बोलो।’ भारत की स्वतंत्रता से पहले इन्हीं बुजुर्गों का यह सपना जरूर रहा होगा कि जब अपना राज होगा तो अपनी भाषा भी होगी। स्वदेशी आंदोलन के समय विदेशी वस्त्र तो फूंके, पर भाषा नहीं। हमारे तो संविधान का प्रारूप ही विदेशी भाषा में बना। बड़ी विडंबना यह रही कि हिंदी के पक्ष में बोलने वालों ने भी अपना मत अंगरेजी में रखा। भाषा संबंधी अनुच्छेदों पर तीन सौ से अधिक बार संशोधनों की प्रस्तुति के बाद, अंतत जब 14 सितंबर, 1949 को हिंदी भाषा संविधान का भाग बनी, तो सारे देश के एक सूत्र में बंधने की आशा बंधी। पंद्रह वर्षों के लिए अंगरेजी को कामकाज की भाषा रखा गया। योजना थी कि धीरे-धीरे अंगरेजी को हटा दिया जाएगा पर, ‘पंद्रह वर्ष बीतने से पूर्व ही’ अंगरेजी को अनिश्चित काल के लिए बनाए रखने का प्रस्ताव पारित हो गया। और बेचारी राजभाषा हिंदी सह-भाषा बन कर रह गई।

1956 में अनुच्छेद 350 (क) संविधान में अंत:स्थापित हुआ और यह निर्दिष्ट हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए। काश, कि तभी समितियां गठित हो जातीं, जो प्राथमिक ही नहीं उच्च शिक्षाओं के लिए भी पुस्तकों के लेखन में जुट जातीं। उच्चतर शिक्षा- शोध, ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य, न्याय-नियम, शासन-प्रशासन, राजनीति, इंजीनियरिंग, मेडिकल या सभी तकनीकि विषयों की पुस्तकें तैयार कर दी जातीं। क्योंकि मात्र साहित्य किसी भाषा को जीवित नहीं रख सकता। कैसी विडंबना है कि हिंदी अपने ही घर में पराएपन का दंश झेल कर लहूलुहान है। किसी देश ने अपनी भाषा के साथ ऐसा अन्याय तो नहीं किया होगा। प्रवासी भारतीय तो विदेश जाकर मातृभाषा का एक शब्द भी बच्चों को सिखाना अपनी तौहीन समझते हैं, जबकि हर मस्तिष्क की कम से कम दो भाषाएं सीख लेने की क्षमता जरूर होती है। जब बरस दो बरस में वे बच्चे भारत आते हैं तो अपने हिंदीभाषी बुजुर्गों से संपर्क साधने का कोई सूत्र उनके पास नहीं होता और वे अपनी जड़ों से कट जाते हैं। हम दूसरी भाषाओं को पढ़ें तो जरूर, पर अपनी भाषा की बेहतरी के लिए।

संविधान का अनुछेद 351 मुख्यत: संस्कृत से और गौढ़त: अन्य भाषाओं से शब्द लेकर हिंदी की समृद्धि पर बल देता है। पर हमने अपनी भाषा का विकास करने के स्थान पर अपनी नई पीढ़ी को अंगरेजी के रस में डुबो दिया। हम उधार की वस्तुएं लेकर उतने आराम से नहीं रह सकते, जितने कि अपनी वस्तुओं में। हम याद रखें न रखें, पर दूसरा हमेशा याद रखता है कि वे वस्तुएं उसकी हैं। उसका याद रखना ही हमारे स्वाभिमान और उन्नति का दरकना है। बेशक हमने अंगरेजी भाषा से बहुत कुछ सीखा है, पर साधन को ही साध्य बना कर बैठ जाना कहां की बुद्धिमत्ता है। यह मान्य तथ्य है कि दास, स्वामी का अनुकरण करता है, तो क्या हम अब भी दासता की प्रवृत्ति ही जी रहे हैं? जैसे हमने अतीत में राजनीतिक तौर पर विभाजित होकर सदियों तक गुलाम रहने का दुष्परिणाम भुगता, कहीं इस भाषाई विभाजन के कारण भी कोई वैसा ही भयानक दुष्परिणाम तो हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा?

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