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नन्ही दुनिया: कहानी – सुतली बम

पढ़ें मोनिका अग्रवाल की कहानी

Author November 4, 2018 10:19 PM
प्रतीकात्मक फोटो

मोनिका अग्रवाल

सृष्टि जितनी होनहार थी, उतनी ही नटखट। वह रोज कोई न कोई नई शैतानी सोच ही लेती थी। उसके परिवार के बड़े उसे प्यार से ‘शैतानों की अम्मा’ कहते थे। पर वह बच्चों में बहुत प्रिय थी। दिवाली आने वाली थी। सृष्टि को पटाखों का बहुत शौक था। उसने अपने माता-पिता से पॉकेट मनी ली और पटाखे खरीद लाई। ‘अभी दिवाली में दो दिन हैं और तुम अभी से पटाखों में लग गई?’ मम्मी ने कहा।
‘नहीं, ज्यादा नहीं लाई हूं। रोज थोड़े-थोड़े छोडूंगी।’
‘देख सृष्टि, इस बार कोई शैतानी नहीं चलेगी। पिछली बार तो तुमने बराबर वाले वर्मा जी की छत पर बम फेंक दिया था। कितने नाराज हुए थे वे।’ पापा ने समझाया।
‘हां हां पापा, चिंता न कीजिए। अबकी बार मैं वैसी कोई शैतानी नहीं करूंगी। परीक्षाएं जो शुरू होने वाली हैं।’ सृष्टि ने जवाब दिया। पर उसकी आंखों की चमक कुछ और ही बयान कर रही थी।
‘मुझे लगता है, यह लड़की फिर कुछ गड़बड़ करने वाली है।’ सृष्टि की मम्मी परेशान होते हुए बोलीं।
‘कुछ नहीं होगा, इतनी नासमझ भी नहीं है! बस नजर रखो।’ पापा ने कहा।
सृष्टि ने अपनी बच्चों की टोली को बुलाया और कहा, ‘देखो मैं इस बार यह सुतली बम लाई हूं। अब बहुत मजा आएगा। इस बार हम बम हाथ से फोड़ेंगे।’
‘हाथों से कैसे बम फोड़ेंगे दीदी?’
‘अरे! जब फोड़ूंगी तो देखना।’
‘लेकिन मम्मी पापा से डांट पड़ेगी।’
‘कुछ नहीं होगा। वैसे भी दिवाली पर सभी बम फोड़ते हैं। मेरी सहेलियों ने बताया है कि इसे हाथ से जला कर फेकने में बहुत मजे आते हैं। तुम तो यह देखना कि कितना मजा आएगा।’

इंतजार की घड़ियां खत्म हुर्इं। दिवाली का दिन भी आ गया। घर का हर सदस्य खुश था। मम्मी पापा तो इस बात से खुश थे कि ऐसी कोई शैतानी नहीं हुई, जिसका डर था। सृष्टि के माता-पिता दिवाली पूजन की तैयारियां कर रहे थे। मां ने आवाज लगाई, ‘बच्चों आ जाओ दीपक जला लो।’
सृष्टि और उसकी पूरी मंडली घर से बाहर आतिशबाजी के चक्कर में थी। उन्होंने जवाब दिया, ‘अभी थोड़ी देर में आते हैं।’
‘रात को भोजन के बाद सब मिल कर आतिशबाजी छोड़ेंगे, लेकिन छत पर। अकेले आतिशबाजी मत छोड़ना। आतिशबाजी छोड़ते समय बड़ों का साथ होना जरूरी है। तुम लोग अभी बहुत छोटे हो, आओ पहले पूजन कर लेते हैं।’ पापा ने कहा।
‘जैसे ही पूजन की तैयारी पूरी हो जाए, आप हमें आवाज लगा लेना। तब तक हम सब बच्चे यहां पर खड़े हैं।’
‘अच्छा ठीक है! देखो, कोई शैतानी मत करना।’ कह कर सृष्टि के पापा घर के अंदर वापस आ गए।
उनके अंदर जाते ही सृष्टि ने सुतली बम का पैकेट खोला। एक बम लिया, उसे हाथ में पकड़े-पकड़े ही उसके पलीते में आग लगाई और बम हवा में उछाल दिया। बम के फटने पर सब बच्चे खुश होकर ताली बजाने लगे।
‘देखा, कितना मजा आया! मैं कहती थी न!’

बच्चों ने चहकते हुए कहा, ‘बहुत बढ़िया तरीके से बम फूटा! मजा आ गया!’
खुशी से सृष्टि का सीना फूल गया। अब उसने एक, दो, तीन… कई बम ऐसे ही आग लगा लगा कर हवा में उछाल दिए।
बच्चे खुश होकर ताली पीटते और चिल्लाते रहे, ‘अबकी बार तो और भी ज्यादा मजा आया!’
सृष्टि बोली, ‘देखो, अबकी बार मैं एक नहीं, दो बम में एक साथ आग लगाऊंगी। यह कहते हुए सृष्टि ने अपने हाथ में दो सुतली बम उठाए। वह आग लगा ही रही थी कि एक बम हाथ में ही फूट गया और सृष्टि दर्द से कराह उठी- ‘आह!’
बच्चे डर गए। सृष्टि की बहन भाग कर अंदर गई और चुपचाप एक मग में बर्फ का पानी ले आई। उसने फटाफट सृष्टि का हाथ उसमें डाला।
आसपास के बच्चे डर कर अपने-अपने घरों में दुबक गए। जब सृष्टि की बहन ठंडा पानी लेकर आ रही थी, उसके पापा को कुछ शक हुआ। इसलिए वे पीछे-पीछे आ गए।

‘देखा, मैं कह रहा था न… पर तुम सुनती ही कहां हो? अब भुगतो।’ पापा ने डांटा।
दरअसल, वह सुतली बम उछालते-उछालते ही फट गया था, जिससे सृष्टि की हथेली थोड़ी जल गई थी। पापा फौरन सृष्टि को, पड़ोस में रहने वाले डॉक्टर अंकल के घर ले गए।

डॉक्टर अंकल ने सृष्टि के हाथ पर पट्टी बांधा और पूछा कि यह कैसे हुआ। सृष्टि ने सारी बात बताई। डॉक्टर अंकल बोले- ‘बेटा हाथ में लेकर बम फोड़ना तो बहुत गलत बात है और तुम तो एक नहीं दो-दो बम में एक साथ आग लगा रही थी। उसी वजह से तो यह काम हुआ है। एक में आग लगाने के बाद जैसे ही तुम दूसरे को आग लगा रही थी, पहला फट गया… खैर… जो हुआ, हो गया। शुक्र करो कोई अनहोनी नहीं हुई। ‘जी अंकल, सॉरी।… सॉरी पापा! आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा। वादा करती हूं कि अब हमेशा आपकी बात मानूंगी! त्योहार मनाने का मतलब खुशी मनाना है, लेकिन बड़ों के साथ।’

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