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नन्ही दुनियाः कहानी – पेड़ और बादल

गोविंद शर्मा की कहानी

प्रतीकात्मक चित्र

गोविंद शर्मा

वह छोटी लड़की गुड़िया परेशान थी। उसके यहां बरसात नहीं हुई थी। उसने उड़ कर जाते बादलों से बार-बार कहा- यहीं बरसो, यहीं। हमें बरसात की जरूरत है। कोई बादल न बोला, न रुका। वह रूठ कर घर के भीतर जाने वाली थी कि एक बादल रुक गया। वह बोला- पानी बरसाने के लिए हमें क्यों कह रही हो। हम तो वे बादल हैं, जो बरस कर वापस अपने घर जा रहे हैं। हमारे भीतर पानी नहीं है। तो, जाते समय तुम यहां क्यों नहीं रुके? बरसात के बिना हम सब परेशान हो रहे हैं। हमारे कहीं और बरसने का आदेश मिला था। हमारे यहां कब बरसोगे तुम लोग?

बादल ने कुछ सोचा और बोला- पानी लेकर बरसने की मेरी बारी तो अब एक महीने बाद आएगी। तब मैं तुम्हारे लिए स्पेशल आर्डर लेकर आऊंगा। तुम्हारे यहां जरूर बरसूंगा। गुड़िया खुश हो गई। ताली बजा कर नाचने लगी। बादल बोला- अपने घर का, खेत का पता बताओ मुझे। जब पानी से भरा होता हूं, तो बरसने की जल्दी होती है। गुड़िया ने कहा- अरे, हमारा घर तो कोई भी दूर से पहचान लेगा। देखो, घर के सामने सात पेड़ हैं। घर के पीछे भी सात पेड़ हैं। घर की दोर्इं तरफ तीन और बार्इं तरफ चार पेड़ हैं। कुल हुए इक्कीस। ऐसा नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलेगा।

ठीक है, एक महीने के लिए बाय बाय…। ठीक एक महीने बाद वह दिन आ गया। गुड़िया जानती थी कि जब भी बरसात आती है, उसके घर की छतें चूती हैं। वह छाता खोल कर बैठ गई। सारा दिन बैठी रही। रात में भी बादल के बरसने का इंतजार किया। कई बादल घर के ऊपर से गुजरे, पर बरसा कोई नहीं। गुड़िया सोच रही थी- हो सकता है, वह बादल अपनी ड्यूटी पर न आया हो या उसको कहीं और भेज दिया हो। बादल देखने के लिए वह घर से बाहर आई। पहले तो वह खुद बादलों को आवाज लगाती थी, अब एक बादल खुद ही उसे देख कर रुक गया।

बादल बोला- ऐ गुड़िया, तुम्हारा घर कहां है? गुड़िया खुश हो गई। अरे, यह तो वही दोस्त बादल है। अब आया है बरसने। अरे भाई, जहां मैं खड़ी हूं, वहीं तो है हमारा घर। जल्दी बरसो न हमारे घर पर। क्या कह रही हो? यह तुम्हारा घर है? एक महीने पहले तुमने मुझे घर का जो पता बताया था, यह तो वह नहीं है। तुमने बताया था कि घर के आगे सात, पीछे सात, एक तरफ तीन और दूसरी तरफ चार पेड़ हैं। कुल इक्कीस पेड़। मुझे तो यहां एक भी दिखाई नहीं दे रहा। पहले तुम बरसात कर हल्के हो जाओ। फिर बताती हूं…।
मैंने तुम्हें बताया था कि जब हम पानी से भरे होते हैं, तब हमें बरसने की जल्दी होती है। मैंने तुम्हारा घर खूब ढूंढ़ा। तुम्हारा घर नहीं मिला, तो मैं कहीं और बरस आया हूं। मैं खाली हूं।

गुड़िया मायूस हो गई। उदास स्वर में बोली- मैंने तो रोका था, पर बापू नहीं माने। बोले- पैसों की जरूरत है। उन्होंने सारे पेड़ एक व्यापारी को बेच दिए। वह सबको काट कर ले गया। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। हम बादल तो ऊपर उड़ते हुए पेड़ों से ही जगह को पहचानते हैं। पेड़ नहीं तो बरसात नहीं। अब कुछ नहीं हो सकता है। अब तो इस वर्ष का हमारा काम पूरा हो गया। अगले वर्ष… नहीं अभी तुम या तुम्हारे बापू ज्यादा नहीं तो, उतने ही पौधे उसी जगह लगा दोगे, तो मैं अगले वर्ष बरसने के लिए जरूर आऊंगा। जाते बादल को गुड़िया ने टा-टा किया, वह एक बार उदास हुई, पर सदा के लिए नहीं। अगले ही दिन सबने देखा- वह और उसके बापू पौधारोपण कर रहे हैं।

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