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नन्ही दुनियाः कहानी – धरतीपुत्र

अपने खेतों में लहलहाती फसलों को देख कर एक किसान फूला नहीं समा रहा था। उसकी मेहनत का रंग खेतों में झूमती हुई क्यारियों से साफ दिखाई दे रहा था।

Author Published on: October 28, 2018 6:51 AM
प्रतीकात्मक चित्र

गोविंद भारद्वाज

अपने खेतों में लहलहाती फसलों को देख कर एक किसान फूला नहीं समा रहा था। उसकी मेहनत का रंग खेतों में झूमती हुई क्यारियों से साफ दिखाई दे रहा था। किसान को खुश देख कर बीज अंदर ही अंदर जल रहा था। उसके जलने का कारण यह था कि वह सोचता था कि यह किसान अपनी झूठी शान दिखा रहा है… इनकी मेहनत से नहीं बल्कि मेरे बीज के कारण इतनी अच्छी फसल इसके खेत में तैयार हुई है। यह बात जब खेत की मिट्टी को पता चली, तो वह बीज से बोली, ‘बीज भैया इस खेत में अच्छी फसल होने का कारण तुम नहीं मैं हूं… अगर मैं उपजाऊ नहीं होती तो भला इतनी बढ़िया खेती थोड़ी ना होती।’ अब मिट्टी को भी बीज की तरह घमंड चढ़ने लगा।

मिट्टी और बीज के घमंडी व्यवहार के बारे में पानी को पता चला तो वह भी उछलते हुए बोला, ‘अरे ओ बीज और मिट्टी, तुम दोनों ध्यान से सुनो… इस खेत में अच्छी फसल होने का कारण मैं हूं… अगर मैं मीठा पानी नहीं होता तो क्या खाक पैदा होती यहां फसल। तुम दोनों के कारण नहीं, बल्कि मेरे कारण इस किसान के खेतों में इतनी अच्छी फसल तैयार हुई है।’ पानी की बातें सुन कर खेतों में जमा गोबर से नहीं रहा गया। वह टेढ़ा मुंह करके बोला, ‘अरे तुम तीनों गए भाड़ में… इस फसल का कारण हूं मैं… अगर मैं बीज और मिट्टी को उर्वरा शक्ति नहीं देता, तो क्या कभी इतनी बढ़िया फसल तैयार हो सकती थी।’ बीज, मिट्टी पानी और गोबर की बड़ी-बड़ी बातें सुन कर हवा भी बिन बोले नहीं रह सकी। वह सनसनाती हुई बोली, ‘तुम चारों की ऐसी की तैसी… न बीज, न मिट्टी न पानी, और न ही इस सड़ेले गोबर की वजह से खेती तैयार हुई है… यह तैयार हुई है मेरे कारण समझे…। अगर इन पौधों को ताजा हवा नहीं मिलती, तो क्या ये इतना लहलहा सकती थी?’

खेत के एक कोने में पड़े हल ने कहा, ‘तुम सब अपने मुंह मिंया मिट्ठू बन रहे हो… मैं बीज को अगर मिट्टी में बोता नहीं, तो क्या तुम लोग इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे होते यहां। इस फसल का एकमात्र कारण मैं हूं भैया।’ हल की बातें सुन कर बैलों से भी बिना बोले रहा नहीं गया। वे बोले, ‘अरे हल के बच्चे, अगर तुझे खेतों में हम नहीं खींचते, तो क्या तू बीज को जमीन में बो पाता… चल फालतू की बातें करता है।’ किसान की मेहनत का कोई जिक्र तक नहीं कर रहा था। बस सब अपनी-अपनी हांक रहे थे। तभी सूरज ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘अरे तुम सब बेकार की बातें छोड़ो और एक बात का ध्यान रखो… इस किसान की मेहनत ही इसका मूल कारण है, वरना मैं भी कह सकता हूं कि बिना मेरे क्या इन फसलों को भोजन मिल सकता था। मेरे कारण ही तो इतनी हरियाली है, वरना तो तुम जानते हो कि बिना धूप के फसल नष्ट हो जाती है।’

यह बात बादल ने भी सुन ली। वह बोला, ‘सूरज दादा ठीक कह रहे हैं दोस्तो, किसान की लगन, उसकी मेहनत, उसका पसीना भी इस फसल को उगाने में काम आया है।’ ‘वह कैसे?’ बीज ने पूछा। बादल बोला, ‘मानता हूं तुम बीज हो, तुम्हारे बिना फसल नहीं बन सकती, लेकिन तुम्हें जीवन देने में इस मिट्टी का बड़ा योगदान है…।’ गोबर बोला, ‘मिट्टी का क्यूं… मेरा क्यों नहीं? ‘अरे गोबर भैया… मिट्टी ने बीज के लिए मां की कोख का काम किया है। धरती हमारी मां है और मिट्टी ही धरती, यह बीज को अपने भीतर समाती नहीं, तो बीज पौधा कैसे बनता?’ सूरज ने समझाया। हल ने उछल कर कहा, ‘इसे धरती में रोपा तो मैंने ही न।’ ‘हां-हां तुम्हीं ने इन बैलों की मदद से इन्हें धरती में बोया, लेकिन इस पानी को पीकर और गोबर की खाद को खाकर मिट्टी ने बीज का भोजन तैयार कराया और हवा ने इनमें प्राण फूंके तभी तो पौधा बन कर बीज बाहर आ पाया।’ बादल ने सभी को समझाते हुए कहा।

सूरज बीच में बोला, ‘अगर बादल भैया वर्षा नहीं करते तो पानी कहां से आता…।’ यह सुन सभी चुपचाप हो गए। उनकी चुप्पी तोड़ते हुए आसमान बोला, ‘देखो किसान ने आप सभी की मदद से इतनी बढ़िया फसल तैयार की है… आप सब तो अलग-अलग बिखरे पड़े थे। तुम्हारे गुणों को मिला कर किसान ने परिश्रम किया और इसका फल आप सभी देख रहे हैं कि किसान कितना खुश है आज। अगर बीज अच्छा नहीं होता, मिट्टी अच्छी नहीं होती या गोबर-पानी और हवा अच्छे नहीं होते तो बेचारा किसान आज रोता…। किसान धरती पुत्र है, वह मानव की भूख मिटाता है। वह अन्नदाता है। इसलिए उसकी मेहनत, लगन और निष्ठा पर कभी किसी को उंगली नहीं उठानी चाहिए।’ आसमान की इतनी अच्छी-अच्छी बातें सुन कर सभी ने तालियां बजाई। बीज और उनके साथियों को समझ में आ चुका था कि हम सबका अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है। आपसी सहयोग से ही देश का विकास होता है।

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