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नन्ही दुनियाः लौट आई प्रतिष्ठा

रूपमती तालाब के उत्तर में हरे-भरे चरागाहों के बीच में एक सुंदर छायादार पीपल का वृक्ष था। वह इतने रमणीक स्थान पर था कि वहां से पूरी घाटी का विहंगम दृश्य साफ-साफ दिखाई देता।

Author July 29, 2018 7:13 AM
कुछ दिनों में अपनी डूबी हुई प्रतिष्ठा को फिर से पाकर मधुमक्खियों का समूह गर्व का अनुभव करने लगा।

दिनेश चमोला ‘शैलेश’

रूपमती तालाब के उत्तर में हरे-भरे चरागाहों के बीच में एक सुंदर छायादार पीपल का वृक्ष था। वह इतने रमणीक स्थान पर था कि वहां से पूरी घाटी का विहंगम दृश्य साफ-साफ दिखाई देता। पक्षी हों या जीव, जो एक बार रूपमती के पीपल की अपनत्व भरी छांह का सुख पा लेता तो फिर जीवन में वह वहां से जाने का नाम ही न लेता। यही रानी मधुमक्खी के साथ भी हुआ।

वह एक दिन रूपाभ का प्रदूषण-भरा उजाड़ जंगल छोड़ कर अपने लिए नया बसेरा ढूंढ़ने निकली, तो रूपमती का यह पीपल उसे पहली ही नजर में भा गया। बस, फिर क्या था, वह पूरे दल-बल के साथ वहां पहुंच गई।

सुंदर पर्यावरण और हरियाली देख उसने अपना बाकी जीवन वहीं बिताने का फैसला कर लिया। एक दिन उसने अपने पूरे दल को संबोधित करते हुए कहा- ‘साथियो! जीवन में रहने के लिए अच्छा और अनुकूल वातावरण भी ईश्वर की ही कृपा से प्राप्त होता है। लेकिन अच्छे वातावरण को और अच्छा तथा सबके लिए उपयोगी बनाना जीव के हाथों पर निर्भर करता है। यहां रह कर हम ऐसा काम करें कि बाकी जीव हमसे प्रेरणा लेकर रूपमती तालाब को स्वर्ग बना दें।’

‘इसमें भला संदेह क्या है महारानी जी? हमने कब ऐसा नेक काम नहीं किया है? हमेशा हमारे दल के चर्चे रहे हैं इन कामों के लिए।’ सबने एक स्वर में कहा।

‘स्वर्ग सरीखे रूपमती तालाब को देख कर अब मेरा मन है कि मैं तुम पर अंकुश लगाना छोड़ दूं… अब तुम प्रत्येक, अपने-अपने विवेक से कुछ अच्छा काम करो और मैं तुम्हारे काम का यहां बैठ कर मूल्यांकन करती रहूं, बस…। क्या मंजूर है यह?’

सबने एक स्वर से हामी भरी। अब क्या था, सब मधुमक्खियां अपने-अपने मन से काम के लिए निकाल पड़तीं, शाम को आकर अपना-अपना हिसाब देतीं। कुछ मधुमक्खियां शहद बटोरने का काम करतीं, कुछ जंगल के सौंदर्य का ध्यान रखतीं, तो कुछ जंगल के उजाड़ हिस्सों में फल-फूलों के नए-नए बीज बोकर उसे हरा-भरा करने में जुटे रहते।

रानी मधुमक्खी सबके कामों को देखती और प्रसन्न होती। पीपल के पेड़ पर पहली बार तैयार किया गया शहद इतना स्वादिष्ट हुआ कि जंगल के जीव उसकी प्रशंसा करते नहीं थके। जब से रानी ने उन पर नियंत्रण करना छोड़ दिया था, तो भीतर-भीतर कुछ मधुमक्खियां मनमानी भी करने लगीं थीं, जिससे अनुशासन में कमी आने लग गई थी। जंगल तो हरा-भरा हो गया, लेकिन उनके बनाए शहद से दूसरे जीव बीमार होने लगे।

रानी इस बात से चिंतित हो गई। वह इसका कारण जानने का प्रयास करने लगी। एक दिन उसने दस-बारह मधुमक्खियों को कुछ दूरी पर बने सार्वजनिक पेशाबघर पर जाकर वहां से पेशाब में चीनी के कण बटोरते देखा। उसे समझते देर न लगी कि यही बीमारी की जड़ है।

एक दिन उसने पूरी सभा बुलाई और कड़े स्वर में कहा- ‘साथियो! इससे पहले कि मैं कोई कठोर कदम उठाऊं, दोषी अपना दोष स्वीकार कर ले… अन्यथा मुझे मालूम हो गया है कि यह किसकी कारस्तानी है। जैसे एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है… उसी तरह से तुम्हारे एक गंदे काम ने हमारी वर्षों के अच्छे कामों को मिट्टी में मिला दिया है। अगर स्वीकार कर लो तो कोई दंड नहीं दिया जाएगा।’

सब खुसुर-पुसुर करने लगीं। अंतत: बारह मधुमक्खियों ने सिर नीचे कर अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा- ‘महारानी जी! हमने आलस्यवश और अधिक स्वतंत्रता मिलने के कारण ही भूलवश ऐसा किया। हमें माफ कर दो। हमारी गलतियों के कारण हम सबकी प्रतिष्ठा पर आंच आई है, इसका हमें खेद है। आज के बाद हम कभी ऐसा काम नहीं करेंगे।’

महारानी ने उन्हें तो माफ कर दिया, लेकिन फिर से पूरी मधुमक्खियों को अपने नियंत्रण में ले लिया। उसे लगा कि बिना नियंत्रण के कुटुंब तबाही के कगार पर पहुंच जाते हैं।

कुछ दिनों में अपनी डूबी हुई प्रतिष्ठा को फिर से पाकर मधुमक्खियों का समूह गर्व का अनुभव करने लगा।

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