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कहानीः इत्ते सारे नोट!

‘अब्बा ये पैसे मेरी जेब में थे।’ असगर ने जल्दबाजी में सफाई देते हुए कहा। असगर अभी छोटा है। अब्बा को लगा शायद वह लालच में ऐसा बोल रहा है। उन्होंने प्यार से उसे समझाया- ‘बेटा सड़क पर पड़े पैसे अपने कैसे हो सकते है?’असगर ने अब्बा को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। अब्बा अगर उसे सड़क से पैसे उठाते न देखते तो उसकी बातों पर विश्वास भी कर लेते।

Author July 14, 2019 1:34 AM
असगर अब्बा से आकर बोला- ‘अब्बा हमें ईदी दीजिए, हम सब घूमने बाहर जा रहे हैं।’ ‘हां हां क्यों नहीं?’ कहते हुए अब्बा पैसे निकालने अलमारी की तरफ बढ़े। अलमारी में से हैंगर पर टंगी पतलून उतारी और जेब में हाथ डाला तो दंग रह गए। पैसे तो उसमें थे ही नहीं। जल्दी-जल्दी अलमारी उलट डाली, लेकिन फिर भी पैसे कहीं नहीं मिले।

सिराज अहमद

ईद की नमाज के लिए असगर नई पतलून और कमीज पहन कर अब्बा के साथ खुशी से उछलता हुआ घर से निकला। वह सुबह जल्दी उठ कर फटाफट तैयार हो गया था। पर अब्बा ने उठने में थोड़ी-सी देरी कर दी थी। अब वे तेज कदमों के साथ मस्जिद की तरफ भागे जा रहे हैं। ठंड ने दस्तक दे दी थी। सर्द हवाएं दबंगई कर रही थीं। असगर ने दोनों हाथ पतलून की जेबों में डाल रखे हैं। अब्बा लंबे-लंबे कदमों से चल रहे हैं। असगर दौड़ते हुए उनका पीछा कर रहा है। पतलून की दाईं जेब में उसकी उंगलियों ने कुछ चिकने कागजों को छूकर उसके कदम रोक दिए। उसने झटके के साथ हाथ बाहर खींचा तो सौ सौ के रंगीन और कड़क नोट देख कर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सौ सौ के दस-बारह नोट देख कर उसकी आंखें बड़ी हो गर्इं और वह बुदबुदा उठा- ‘इत्ते सारे नोट!’ तभी हड़बड़ाहट में नोट उसके हाथों से छूट कर सड़क पर जा बिखरे। वह उन्हें उठाने दौड़ा तो अब्बा की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने उसे प्यार से टोका- ‘बेटा सड़क पर से पैसे उठाना अच्छी बात नहीं, पता नहीं किसके हों?’

‘अब्बा ये पैसे मेरी जेब में थे।’ असगर ने जल्दबाजी में सफाई देते हुए कहा। असगर अभी छोटा है। अब्बा को लगा शायद वह लालच में ऐसा बोल रहा है। उन्होंने प्यार से उसे समझाया- ‘बेटा सड़क पर पड़े पैसे अपने कैसे हो सकते है?’असगर ने अब्बा को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। अब्बा अगर उसे सड़क से पैसे उठाते न देखते तो उसकी बातों पर विश्वास भी कर लेते। उन्होंने सड़क पर खड़े होकर आसपास निहारा। दूर-दूर तक उन्हें कोई नहीं दिखा। फिर उनकी नजर रोशन चाचा की चाय की दुकान पर पड़ी। रोशन चाचा की ईमानदारी की चर्चा पूरे मोहल्ले में होती है। अब्बा असगर से पैसे लेकर उनके पास जा पहुंचे। उन्होंने सारी बातें बताई और पैसे उन्हें देते हुए कहा- ‘चाचा अगर कोई अपने पैसों की पूछताछ करता हुआ आपके पास आता है, तो ये उसके हवाले कर दीजिएगा।’ चूंकि रोशन चाचा की चाय की दूकान बिल्कुल सड़क के किनारे ही थी, इसलिए उन्होंने खुशी खुशी जिम्मेदारी ले ली। उन्हें दूसरों की मदद करने में बहुत खुशी मिलती है। पैसे रोशन चाचा के पास रख कर अब्बा को तो तसल्ली मिल गई, लेकिन असगर बेचैन था। उसे एक ही सवाल परेशान कर रहा था कि उसकी जेब में पैसे आए कहां से?

खैर, ईद की नमाज पढ़ कर अब्बा-बेटे घर वापस आ गए। अम्मी दौड़ कर सेवई ले आईं। असगर को सेवई बहुत पसंद है, लेकिन आज उसने कम ली। उसके चेहरे पर थोड़ी उदासी भी दिखी। अम्मी ने अब्बा से पूछा- ‘इसे क्या हुआ? डांटा है क्या आपने?’
अब्बा ने सारी बात उन्हें बताई। फिर वह असगर को समझाने लगीं- ‘बेटा ये सोचो जिसके पैसे गिरे होंगे उसके दिल पर क्या गुजर रही होगी।’
‘लेकिन अम्मी, पैसे मेरी ही जेब में थे।’ असगर ने फिर सफाई पेश की। अम्मी ने प्यार से असगर के बालों पर हाथ फेरा फिर बोलीं- ‘अच्छा बाबा मान लिया पैसे तुम्हारी जेब में थे, लेकिन तुम्हारे पास इतने पैसे आए कहां से?’ अम्मी के सवाल का असगर के पास कोई जवाब न था।
थोड़ा समय बीता। दोपहर हो गई। मोहल्ले के बच्चे जब घर में इटकट्ठा हुए तो असगर सब कुछ भूल कर उनके साथ खेलने में मशगूल हो गया। थोड़ी देर बाद असगर अब्बा से आकर बोला- ‘अब्बा हमें ईदी दीजिए, हम सब घूमने बाहर जा रहे हैं।’
‘हां हां क्यों नहीं?’ कहते हुए अब्बा पैसे निकालने अलमारी की तरफ बढ़े। अलमारी में से हैंगर पर टंगी पतलून उतारी और जेब में हाथ डाला तो दंग रह गए। पैसे तो उसमें थे ही नहीं। जल्दी-जल्दी अलमारी उलट डाली, लेकिन फिर भी पैसे कहीं नहीं मिले।
अम्मी और असगर को बुला कर पूछा, लेकिन उनसे भी कोई जानकारी नहीं मिली। अब्बा थोड़ा परेशान हो गए। अम्मी फिर से अलमारी में पैसे तलाशने लगीं।
‘कहीं वे पैसे आपके तो नहीं थे जो मेरी जेब में थे?’ कहते-कहते असगर के चेहरे पर चमक आ गई। अब्बा-अम्मी एक-दूसरे का चेहरा ताकने लगे।
अब्बा चारपाई पर बैठ गए और सोच में पड़ गए। तभी उन्हें कुछ याद आया तो मुस्कुरा पड़े तो अम्मी ने टोका- ‘आपके पैसे गायब हो गए और आप मुस्कुरा रहे हैं!’
फिर अब्बा बोले- ‘असगर सही कह रहा था, पैसे उसकी जेब में ही थे।’
दरअसल, कल रात में अब्बा ने गलती से पैसे अपनी पतलून के बजाय असगर की पतलून में रख दिए थे। चूंकि पतलून का रंग काला ही था, तो वह असगर की पतलून को अपनी पतलून समझ बैठे थे।
‘आपको अपनी और असगर की पतलून में फर्क नहीं लगा।’ अम्मी बोली।
‘अरे, अगर पता चल जाता तो रखता ही क्यों?’ अब्बा कह कर हंसे तो उनके साथ-साथ असगर भी मुस्कुरा दिया।
फिर असगर और अब्बा दोनों रोशन चाचा की दुकान की तरफ चल दिए।

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