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नाज खान का लेख : जो डूबा सो पार

इस्लाम की रहस्यवादी शाखा के तौर पर विकसित हुआ सूफीवाद करीब एक हजार साल पुराना है। सूफीवाद को असल पहचान अल गजाली के समय से मिली। इसके बावजूद अपनी सरलता के बल पर सूफीवाद विश्व के कोने-कोने तक पहुंचा। आज सूफीवाद समूचे विश्व में फैला हुआ है और सौ से अधिक सिलसिलों में बंटा हुआ है। इस बारे में बता रही हैं नाज खान।

Author नई दिल्ली | July 16, 2016 23:17 pm
इस्लाम की रहस्यवादी शाखा के तौर पर विकसित हुआ सूफीवाद करीब एक हजार साल पुराना है। सूफीवाद को असल पहचान अल गजाली के समय से मिली।

बुल्ला की जाना मैं कौन, न मैं मोमिन विच मसीतां, न मैं विच कुफर दीयां रीतां।’ बुल्ले शाह के इस कलाम में पे्रम की जो संकल्पना है, असल में वही सूफीवाद है। इसमें भक्त की पहचान महज पे्रम है। बंदा अपने रब का आशिक है और उसके इश्क में किसी तरह के डर, स्वर्ग-नरक के विचार को जगह नहीं है। सूफियों के तसव्वुफ यानी अध्यात्म का संबंध रूहानियत से है। यह एक आंतरिक अहसास है, जो रूह को इस मायावी संसार से अलग हटाकर ईश्वर से जोड़ता है। इस्लाम में पे्रमभक्ति के आधार पर सूफीवाद का उदय हुआ। मगर रोमानी संगीत और ईश्वरीय पे्रम की अवधारणा इसे अलग बनाती है। आत्मा से परमात्मा का यह जुड़ाव एक ऐसी रहस्यवादी दुनिया को रचता है जिसे महज भक्त और उसका ईश्वर ही जान सकते हैं।

सूफी एक फारसी शब्द है इसका अर्थ विवेक है। कुरआन में जाहिरा तौर पर यों तो सूफीवाद का जिक्र नहीं है, लेकिन अध्यात्म की जिस अवस्था से सूफी अपने रब तक पहुंचता है उसे जरूर कुछ संकेतों से बयान किया गया है। पूरी तरह से सांसारिकता का त्याग और अपने रब पर निर्भर हो जाना जहां इसकी खासियत है, वहीं गुरु का महत्त्व और पीरी-मुरीदी जैसी व्यवस्था सूफीवाद को दर्शाती है। सूफियों का सादा जीवन भी इस्लाम के उस संदेश का ही रूप है जिसमें जरूरत से ज्यादा धन-संचय की मनाही की गई है और सादगी भरे जीवन को अहमियत दी गई है। आखिरी नबी का तो पूरा जीवन ही त्याग, सादगी, सहनशीलता और अध्यात्म का जो रूप हमारे सामने पेश करता है वह अपने रब से इश्क की एक मिसाल है। यों तो सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में कई व्याख्याएं हैं, लेकिन अरब में अस्हाबे-सुफ्फा (छायादार जगह) इसकी सबसे बेहतर वजह मालूम होती है। सुफ्फा मस्जिदे-नब्वी में एक ऐसी छायादार जगह थी जहां बेआसरा और गरीब लोग ठहरते और नबी का साथ पाते थे। सादा, संतोषी और सरल जीवन इन लोगों की खासियत थी। सांसारिक सुखों और विलासिताओं का त्याग न सिर्फ इन लोगों के जीवन का हिस्सा बना बल्कि आगे चलकर यही सूफी विचारधारा के तौर पर भी उभरा। इस्लामी ग्रंथों में इसे तसव्वुफ यानी अध्यात्म के तौर पर समझा जा सकता है जिसका रास्ता रब के प्रति सच्चे इश्क से गुजर कर मिलता है। यानी ‘मैं’ का खो जाना और ‘तू’ हो जाना। इश्क की इसी अवस्था में लीन होकर सूफी मंसूर अल हलाज ने खुद को ‘अन-अल-हक’ यानी ‘मैं सत्य हूं’ कहा था। रब से इसी प्रीति को लेकर बुल्ले शाह ने अपने गुरु के पैरों पर गिरकर उनसे गुहार लगाई थी, ‘मुझे रब से मिला दे’, तब गुरु ने जवाब में कहा था, ‘मुश्किल नहीं है बस खुद को भुला दे।’

नवीं और दसवीं सदी में जब इस्लाम अरब से निकलकर पूरे विश्व में स्थापित हो रहा था तो सूफीवाद भी उसके भीतर जन्म ले रहा था। सूफीवाद की कोमलता और पे्रम का ही असर था कि बहुत जल्द यानी तेरहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच सूफीवाद ने विश्व में अपनी जड़ें जमा लीं। सूफीवाद में ईश्वर सबसे सुंदर है, सभी को उसके ध्यान, स्मरण में खुश रहना चाहिए। सूफीवाद में ईश्वर माशूक और सूफी आशिक है तभी तो प्रेम को समर्पित खुसरो ने भी कहा था, ‘खुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वा की धार, जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।’

भारत में सूफीवाद को स्थापित करने का श्रेय सूफी संत ख्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती को है। बारहवीं सदी में वह अफगानिस्तान से भारत आए और पे्रम की भावना को विकसित कर हिंदू-मुसलिमों के बीच एकता को बढ़ावा दिया। जिस तरह मध्यकालीन भारत में हिंदुओं में भक्ति आंदोलन शुरू हुआ, उसी तरह मुसलमानों में सूफीवाद ने अपनी जगह बनाई। सूफियों ने आम लोगों की बोली को अपनाया और सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श को जीवन में उतारा। घास-फूस से बनी झोपड़ियां और कच्चे मकान उनकी रिहाइशगाह थे। सूफी संत दिखावे से दूर अपनी मर्जी से सादा जीवन बिताते थे। सूफीवाद में गुरु की महत्ता है। उनकी निगाह में गुरु ईश्वर प्राप्ति का पथ-प्रदर्शक है। दरअसल, सूफीवाद का आधार ईश्वर के प्रति वैसा ही अलौकिक पे्रम है जो भक्तिवाद की खासियत है। भक्तिवाद और सूफीवाद दोनों में गुरु को श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो अपने गुरु की मृत्यु को सहन नहीं कर पाए और कुछ समय बाद उन्होंने भी दम तोड़ दिया था। इस दरम्यान पे्रम और भक्ति से पे्ररित जो काव्य उन्होंने लिखा वह आत्मिक प्रेम के भाव और पीड़ा को व्यक्त करता है, ‘खुसरो बाजी पे्रम की खेलूं पी के संग, जीत गई तो पिया मोरे हार गई तो मैं पी संग।’

भारत में मुख्य तौर पर इसके चार सिलसिले हैं- सुहरावर्दी, चिश्तिया, कादिरिया और नक्शबंदीय संप्रदाय। सूफियों ने सूफीवाद के जरिए पे्रम को अहमियत दी और समझाया कि रब से डर कर नहीं बल्कि उसे सबसे सुंदर और सत्य समझकर पे्रयसी की तरह पे्रम करने से भी मुक्ति मिलती है। नवीं और दसवीं सदी में राबिया बसरी और नूरी जैसी महिला सूफी संत भी हुई। उन्होंने लोगों को समझाया कि ‘अल्लाह से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उससे इश्क करना चाहिए।’ सूफीवाद ने इस विचार को अहमियत दी कि स्वर्ग और नरक की सोच के पार जाकर भी रब को पाया जा सकता है। सूफीवाद से पहले तक लोगों का मानसिक और भावनात्मक संसार जन्नत के सपनों और दोजख की आग के डर के बीच तक सीमित था। यह वह दायरा था जो इंसान को उसको अपने रब के समीप होने से रोकता था। सूफीवाद ने स्वर्ग और नरक के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को बदला। शेख निजामुद् दीन औलिया के मुताबिक ईश्वर भक्ति दो तरह की है। एक में अल्लाह की इबादत, रोजा, हज आदि आते हैं और दूसरे में गरीब, दुखियों और असहाय लोगों की सहायता। अपने इसी दृष्टिकोण की वजह से वह जनता में प्रिय हुए।

सूफियों ने सादगी को अपनाने और दिखावटी व्यवहार के त्याग पर जोर दिया और बताया कि आध्यात्मिक उपलब्धि अपने भीतर ही रब को खोज लेने में है। सूफियों का जीवन लोगों के लिए आदर्श रहा है और उनकी वाणी ईश्वर और भक्त के मध्य सच्चे प्रेम को प्रकट करती रही है। सूफीवाद ने जहां मानवता को एक किया, वहीं धर्मों के नैतिक-आध्यात्मिक पक्ष पर भी जोर दिया। सूफीवाद की इसी सरलता ने लोगों को प्रभावित किया। कण-कण में ईश्वर को महसूस करने वाले भक्त को हर जगह रब ही दिखाई देता है। सूफी मंसूर अल हलाज का ‘अन-अल-हक’ वाक्य जीव और आत्मा के विलीन हो जाने की इसी अनुभूति को शब्द देता है। जीव और परमात्मा के बीच जब पे्रम ही प्रेम पनप जाता है तो सारे भेद मिट जाते हैं। हालांकि, मंसूर अल हलाज के शब्दों को दुनियावी चश्मे से देखा गया और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया। बुल्लेशाह ने कहा ही है, ‘इक नुक्ते विच गल मुकदी’, यानी एक बिंदु से बात पलट सकती है।

सूफीवाद को सबने अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। लेकिन इसका सार ईश्वर के प्रति समर्पण ही है। सूफी संत जुनैद के मुताबिक अपने नफ्स यानी इंद्रियों को ईश्वर के साथ इस तरह जोड़ दें कि फिर उसी की मर्जी पर छोड़ दें कि वह जो चाहे करे। इसका सीधा आशय समर्पण से है। सांसारिकता से मन हटा कर ईश्वरीय सौंदर्य पर मुग्ध होने से मोक्ष प्राप्त होता है। हजारों वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं का सार भी यही था। सैयदुल तहरीन ने अध्यात्म का संबंध अच्छे अखलाक यानी मीठी वाणी से जोड़ा है तो मौलवी अशरफ थानवी ने कहा है, ‘अपने अहम को मिटाने का नाम ही अध्यात्म है।’ सूफीवाद में पे्रम, त्याग और समर्पण की उस भावना का वास है जो न सिर्फ पे्रम से जोड़ती है बल्कि ईश्वर से मिलन का कारण भी बनती है। हालांकि, सूफी दुनिया से पूर्ण विमुखता को नहीं स्वीकारते। वे उसमें भागीदारी को बढ़ावा देने की वकालत करते रहे हैं। दुनिया में रहकर दुनिया से विमुख बने रहना भी उनकी खासियत है। सूफीवाद की एक विशेषता यह भी है कि इसमें संगीत और रक्स को भी स्थान है। अध्यात्म-रूहानियत में रमने के बाद बंदे पर एक ऐसी अवस्था हावी हो जाती है जब वह दीवानों की तरह मस्ती में झूमने लगता है। तन-मन की सुध खोकर गाने लगता है। समझा जाता है कि इस अवस्था में वह पापरहित हो जाता है। इसके पीछे सूफीवाद का एक ही तर्क है कि जो भी करना है दिल से करो, फिर चाहे रब की इबादत हो या संगीत में रमना। दोनों का आधार दिल को उज्जवल कर ईश्वर की याद में खो जाना होना चाहिए।

दीवानों के लिए कोई नियम-कायदे नहीं होते। अल्लाह के इश्क में डूबे बंदों को भी हर जगह रब दिखता है। फिर चाहे वह रब की कोई रचना हो या कुदरत का कोई शाहकार। संगीत की स्वरलहरियां भी सूफियों के लिए उनके अध्यात्म का ही एक अंग और अपने गुरु से मिलन का जरिया है। पिया-मिलन की इसी खुशी में जब मस्त होकर सूफी झूमने लगते हैं तो उन्हें पे्रम की अनुभूति होती है। सूफियों की दरगाहों पर जो नात, हम्द और मनकब्त गूंजते हैं- इनमें प्रेम, समर्पण और तारीफ के भाव होते हैं और अकीदत के साथ गाए जाते हैं। इन्हीं में से एक कव्वाली है। भारत में कव्वाली का आगमन ख्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती के समय हुआ। कुछ लोग अमीर खुसरो के समय इसकी शुरुआत बताते हैं। ईश्वर के प्रेम से सराबोर कलाम को जब आस्था और सुरों के साथ पेश किया जाता है तो सूफियाना कव्वाली की शक्ल ले लेता है। सुरों का ऐसा समां बंधता है कि आत्मा से परमात्मा के मिलन की अनुभूति होती है। शायद यही वजह है कि सूफियों की दरगाहों पर रूहानी संगीत की धुनें लोगों को अध्यात्म की एक अलग दुनिया में ले जाती हैं। ऐसा समझा जाता है कि संगीत रुह को न सिर्फ सुकून देता है बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच के फासले को भी भरता है। पे्रम में बावरे सूफी जब मस्ती में आंखें बंद कर झूमते हैं तो उन्हें अपने रब की निकटता महसूस होती है। फिर दुनिया का उन्हें होश नहीं रहता। हालांकि सूफी विचारधारा और उनके इस पे्रम को दूसरा तबका बेहतर निगाह से नहीं देखता। नतीजे में कई बार सूफी विरासत को मिटाने की कोशिशों की गर्इं।

दरगाहों को नेस्त-ओ-नाबूद किया गया और सूफी गायक आतंक का निशाना बने। ‘भर दे झोली मेरी या मुहम्मद, लौट कर मैं न जाऊंगा खाली’, कलाम से जिन साबरी बंधु को दुनिया में एक अलग पहचान मिली। उसी घराने के पैंतालीस साल के अमजद साबरी 22 जून, 2016 को कुछ लोगों की गोलियों का निशाना बनाए गए। 2014 में ‘जियो टीवी’ पर उनका एक कार्यक्रम हुआ था। इसमें उन पर ईशनिंदा के आरोप लगे और जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं थीं। दरअसल, सूफीवाद में संगीत को परम परमात्मा की अनुभूति का एक रास्ता समझा जाता है। हालांकि, इस्लाम में संगीत की पूरी तरह मनाही है।

मगर सूफीवाद में संगीत से उपजने वाले आध्यात्मिक सौंदर्य को ईश्वर से एकाकार होने का सबसे अहम बिंदु माना गया है। इसमें संगीत एक जरिया है- रब तक पहुंचने का। संगीत की स्वरलहरियों में डूबकर सूफी प्रेम के उस समुद्र में गहरे उतर जाते हैं, जहां उन्हें परमात्मा की प्राप्ति होती है। सूफी दर्शन का संगीत से संबंध कैसे और कब कायम हुआ, इस बारे में प्रामाणिक जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन सूफी जलालउद्दीन रूमी की एक कविता इस ओर इशारा जरूर करती है कि तेरहवीं सदी तक आते-आते संगीत सूफीवाद का अभिन्न अंग बन चुका था। दरगाहों में कव्वाली का रिवाज और तुर्की का दरवेश नृत्य इसी संगीत परंपरा का बेजोड़ नमूना है। वहीं सूफी बुल्ले शाह ने संगीत को प्रेम से कुछ यों जोड़ा है,
‘तेरे इश्क नचाया करके थैया-थैया’

तो अमीर खुसरो अपने प्रेम की अठखेलियों को यों शब्द देते हैं,
‘छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलाइके’

जलालउद्दीन रूमी के मुताबिक, ‘जब हृदय में परमात्मा के लिए अगाध प्रेम उमड़ता है तब निसंदेह परमात्मा भी हमारे पे्रम में सराबोर होते हैं।’ सूफीवाद में पिया यानी पीर को श्रेष्ठ स्थान दिया गया है और पूरी विद्या ईश्वरीय पे्रम से ओत-प्रोत है। इसमें संगीत एक खास भूमिका अदा करता है। इसलिए सूफी संतों की दरगाहों पर सुर-संगीत आम बात है। फिर चाहे अजमेर की ख्वाजा मुईउद्दीन चिश्ती की दरगाह हो, दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन औलिया, बरेली की शाहदाना वली और खानकाहे नियाजिया की दरगाह, इनका संगीत से गहरा ताल्लुक रहा है।

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