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शख्सियत: ‘इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा’ – सलिल चौधरी

विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी हुकूमत बंगाल के चावल उत्पादन पर काबिज हो गया। फिरंगियों की इस मनमर्जी के कारण तब लाखों लोगों की भूख से मौत हुई थी। सलिल दा ने इसी त्रासद अनुभव पर एक फिल्म की कहानी लिखी, जिसे उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी के जरिए विमल राय तक पहुंचाई। इस तरह यह कहानी 1953 में फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के रूप में पर्दे पर नजर आई।

हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार सलिल चौधऱी।

हिदी सिनेमा के सौ साला सफर में संगीत से लेकर अभिनय तक कई ऐसे प्रयोग आजमाए गए हैं, जो आज मील के पत्थर हैं। बात चूंकि हम सलिल चौधरी की कर रहे हैं तो यह देखना-समझना खासा दिलचस्प है कि उन्होंने सिनेमा में संगीत के प्रयोग को विधागत इकहरेपन से न सिर्फ बाहर निकाला बल्कि उसे प्रबुद्धता और प्रतिबद्धता के जनवादी सरोकारों से भी जोड़ा। सलिल दा सिर्फ संगीतकार नहीं थे, वे लेखक और कवि भी थे। ‘दो बीघा जमीन’ जैसी महान फिल्म की कहानी उन्होंने लिखी थी। इसलिए उनके कार्य और सिनेमा में योगदान को सिर्फ सरगमी मिठास के तौर पर देखना मुनासिब नहीं है।

दरअसल, वे एक प्रबुद्ध संगीतकार से भी आगे एक ऐसे विचारशील कलाकार थे, जिसकी प्रतिबद्धता सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के प्रति रही। वे अपने संगीत से मानवता के उन स्वेद पक्षों का स्पर्श करते रहे, जिन पक्षों की उनसे पहले सांगीतिक कोमलता के नाम पर अवहेलना हो रही थी। बिमल राय, ख्वाजा अहमद अब्बास, राज कपूर, साहिर लुधियानवी और शैलेंद्र जैसे लेखक-कवियों और फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा में जिस नव-यथार्थवाद दौर को तारीखी तौर पर लाया, सलिल दा का नाम ऐसे लोगों में प्रमुखता से शामिल है।

बंगाल के 24 परगना जिले के गांव में 19 सितंबर, 1922 को उनका जन्म हुआ। उन्हें शुरू से ही पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का शौक था। उनका बचपन मोजार्ट और बीथोवियन जैसे बड़े संगीतकारों की छाया में गुजरा। उनके इस शौक और लगन ने उन्हें फिल्मों में एक ऐसे संगीत का विधान रचने के लिए प्रेरित किया, जिसमें लोक की स्थानीयता से लेकर पाश्चात्य संगीत का खुलापन तक सबका समावेश था। सलिल दा संगीत के बड़े आलोचक भी रहे। अपने समकालीन गायकों-संगीतकारों के बीच उनकी इस आलोचनात्मकता के कारण सहमति-असहमति वाले उनके कई किस्से मशहूर हैं। दिलचस्प है कि सलिल दा खुद को मजाक में ‘मोजार्ट रिबॉर्न’ भी कहते थे।

संगीत के प्रति उनके लगाव का आलम यह था कि चाय बागानों में काम कर रहे मजदूरों तक के साथ बैठकर उन्होंने उनके संगीत के बारे में जाना-सीखा। महज छह-सात साल की उम्र में ही उन्होंने हारमोनियम, सितार और बांसुरी बजाना शुरू कर दिया था। वह ब्रितानी हुकूमत का दौर था, जिसके विरोध में सलिल दा ने अपना पहला जनगीत ‘बिचार पति तुमार बिचार’ संगीतबद्ध किया जो कि उस दौर में काफी लोकप्रिय रहा। यह गीत उन्होंने 1945 में अंडमान जेल से लौटने के बाद लिखा था। उन्हीं दिनों वे छात्र आंदोलन में कूद पड़े और भारतीय जननाट्यसंघ (इप्टा) से जुड़े।

विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी हुकूमत बंगाल के चावल उत्पादन पर काबिज हो गया। फिरंगियों की इस मनमर्जी के कारण तब लाखों लोगों की भूख से मौत हुई थी। सलिल दा ने इसी त्रासद अनुभव पर एक फिल्म की कहानी लिखी, जिसे उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी के जरिए विमल राय तक पहुंचाई। इस तरह यह कहानी 1953 में फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ के रूप में पर्दे पर नजर आई।

संगीतकार के तौर पर 1949 में आई ‘परिवर्तन’ सलिल दा की पहली फिल्म थी। उन्होंने बांग्ला, हिंदी, मलयालम समेत 13 भारतीय भाषाओं की फिल्मों में संगीत दिया। ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’, ‘मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, ‘इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा’, ‘न जाने क्यों होता है यह जिंदगी के साथ’ और ‘धरती कहे पुकार के’ सरीखे अमर गीतों को लयबद्ध करने वाले सलील दा पांच सितंबर 1995 को ंइस दुनिया से जरूर रुखसत हो गए, पर उनके संगीत की दुनिया लंबे समय तक आलाप भरती रहेगी। ल्ल

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