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शख्सियतः एमएस सुब्बुलक्ष्मी

मदुरै में जन्मी एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने उस वक्त पुरुषों के वर्चस्व वाले कर्नाटक संगीत में अपनी जगह बनाई, जब अघोषित रूप से यह महिलाओं के लिए वर्जित क्षेत्र था।

Author September 16, 2018 6:32 AM
सुब्बुलक्ष्मी को कर्नाटक संगीत में गायन के लिए राज्य स्तर पर ‘सांईवाणी’ और ‘संगीत कलानिधि’ की उपाधि से दी गई।

मदुरै में जन्मी एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने उस वक्त पुरुषों के वर्चस्व वाले कर्नाटक संगीत में अपनी जगह बनाई, जब अघोषित रूप से यह महिलाओं के लिए वर्जित क्षेत्र था। एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने संगीत के क्षेत्र में पुरुषों की निर्भरता को नकारा और अपनी एक अलग पहचान बनाई। ’सुब्बुलक्ष्मी की मां देवदासी समुदाय से थीं। वे मंच पर प्रस्तुतियां देती रहती थीं। सुब्बुलक्ष्मी की परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई, जहां उन्हें बचपन से ही महान संगीतकारों से मिलने का मौका मिलता रहा। उन्होंने कर्नाटक संगीत की शिक्षा बचपन से ही लेनी शुरू कर दी थी। कर्नाटक संगीत के उनके शिक्षक सेम्मनगुड़ी श्रीनीवास अय्यर थे, तो वहीं हिंदुस्तानी संगीत उन्होंने पंडित नारायणराव व्यास से सीखा। सुब्बुलक्ष्मी का पहला कार्यक्रम आठ वर्ष की उम्र में कुंभकोणम में महामहम उत्सव के दौरान हुआ था। इस कार्यक्रम के बाद उनका सार्वजनिक दौरा शुरू हुआ। दस साल की उम्र में उन्होंने रॉकफोर्ट मंदिर में प्रस्तुति दी थी। उनका पहला भक्ति संगीत एलबम आया तब उनकी उम्र दस साल थी। इसके बाद वे मद्रास संगीत अकादमी में आ गर्इं। उन्होंने अपनी मातृभाषा कन्नड़ के अलावा कई भाषाओं में गाया।

आजादी की लड़ाई में योगदान

आजादी की लड़ाई में सुब्बुलक्ष्मी और उनके स्वतंत्रता सेनानी पति सदाशिवम ने पूरा योगदान किया। सुब्बुलक्ष्मी की संगीत से जो भी कमाई होती, उसे आजादी की लड़ाई में और कस्तूरबा फाउंडेशन को समर्पित कर देती थीं। ’महात्मा गांधी सुब्बुलक्ष्मी के गीतों से बहुत प्रभावित थे। उनका कहना था कि अगर सुब्बुलक्ष्मी गीत के बोलों को केवल बिना गाए उच्चारित भी करे, तब भी किसी और के गायन के बजाय मैं उसे सुनना पसंद करूंगा। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद सुब्बुलक्ष्मी को महात्मा गांधी ने ‘हरि तुम हरो भजन गाने’ का संदेश भिजवाया, जिसे सुब्बुलक्ष्मी ने रातोंरात रिकॉर्ड करके गांधी तक पहुंचाया। एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सुब्बुलक्ष्मी का गायन सुना तो कह उठे, ‘ओह, मैं एक अदना-सा प्रधानमंत्री, इस संगीत की मल्लिका के आगे कहां ठहरता हूं।’

फिल्मी सफर

1936 में सुब्बुलक्ष्मी चेन्नई आ गर्इं। उन्होंने अपने फिल्मी करिअर की शुरुआत 1938 में आई फिल्म ‘सेवासदन’ से की। 1945 में उनकी यादगार फिल्म ‘भक्त मीरा’ आई। इस फिल्म में मीरा के भजन सुब्बुलक्ष्मी ने ही गाया था। सुब्बुलक्ष्मी ने ‘सावित्री’ और तमिल में आई ‘मीरा’ फिल्म में काम किया था। उन्होंने ‘मीराबाई’ और ‘शकुंतलाई’ में भी काम किया। पर कुछ फिल्मों के बाद उन्हें लगा कि वे गायन के क्षेत्र में ज्यादा बेहतर काम कर सकती हैं। इसलिए उन्होंने बाद में गायन को ही चुना।

यादगार गीत

सुब्बुलक्ष्मी का प्रात:कालीन गायन ‘सुप्रभातम’ आज भी सराहा जाता है। इन्होंने ‘भज गोविंदम’ का भी गायन किया है। कुजम्मा ने राजगोपालाचारी की रचना ‘कोराईओन रूम इल्लई’ और ‘विष्णु सहस्रनाम’ की भी प्रस्तुतियां दीं। हनुमान चालीसा की प्रस्तुति इनके प्रशंसित गायन में गिना जाता है।

उपलब्धियां

सुब्बुलक्ष्मी को कर्नाटक संगीत में गायन के लिए राज्य स्तर पर ‘सांईवाणी’ और ‘संगीत कलानिधि’ की उपाधि से दी गई। 1968 में उन्होंने संगीत अकादमी मद्रास की पहली महिला अध्यक्षा बनीं। 1982 में लंदन में भारत महोत्सव के उद्घाटन समारोह में उन्होंने गायन प्रस्तुत किया। उन्हें विश्वभारती विश्वविद्यालय द्वारा ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार और ‘देशिकोत्तम’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें ‘सप्तगिरि संगीत विद्यामती’ सम्मान भी मिला। पद्मभूषण के बाद सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से भी उन्हें नवाजा गया।

निधन

वे लंबे समय से मधुमेह से पीड़ित थीं। 11 दिसंबर, 2004 को सुब्बुलक्ष्मी का निधन हो गया।

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