ललित प्रसंग: आधुनिकता और तकनीक

संसार की समूची सांसारिकता और सामाजिकता के लिए जीवन के आख्यान का हमारे आसपास होना जरूरी होता है। आख्यान का रचा जाना मूलत: जीवन को जीए जाने की प्रक्रिया है। जीवन को जी लेना ही विचार का आस्वाद होता है। इसी भूमि पर रचना एक आस्वाद से जीवन की स्थिति को रचते हुए जिंदगी की व्याख्या करती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आधुनिकता एक विचार की अवस्था है। इस अवस्था में अपने समय और समाज में सचेत रहते हुए ही जीवन स्थितियों की व्याख्या की जा सकती है। व्यक्ति और समाज जब एक दिशा में सोचते हैं, तो इस स्थिति में दोनों की सत्ताएं अपनी पहचान के साथ सामने आती हैं। आधुनिकता की विचारयात्रा में व्यक्ति और समाज दोनों को अपने कार्यों से जीवन स्थितियों का निर्माण करना होता है। दोनों बराबर हैं। दोनों ही तर्क से निष्ठा से चालित होते हैं। सभ्यता के विकासक्रम में संस्कृति जिन तत्त्वों को पोषित-पल्लवित करती है वह पूरी तरह से मनुष्य जाति के तर्क और विश्वास से ही परिचालित होते हैं, इससे अलग यहां कुछ भी संभव नहीं है। जीवन को पदार्थ के साथ मन की सत्ता से जोड़ते हुए जो चेतन संसार हमारे सामने आता है वही मूलत: जीवन का आधार होता है। आज हमारे सामने एक वस्तुस्थिति में जो डिजिटल संसार है, वह हमें संसार भर की बातों से, चिंताओं से जोड़ देता है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दुनिया चाहे जितनी दूर हो, पर यह तय है कि डिजिटल संसार में आते ही आपकी दुनिया में अन्यों की दुनिया का दखल शुरू हो जाता है। एक साथ आप कई सारे संसार से जुड़ जाते हैं- कई सारे संसार आपका संसार बनाने-बिगाड़ने लग जाते हैं और कई बार तो यह लगता है अति विस्तारित दुनिया में जिस गति से आदमी अपनी बाहों को फैला रहा है वही बाहें कहीं जड़ न हो जाएं। इस तरह डिजिटल क्रांति में एक संसार खो देने का भय भी लगता है। जिस डिजिटल संसार से वस्तुगत दुनिया हमारे सामने आती, वह वस्तु सत्ता के साथ-साथ मन की सत्ता पर भी राज करती है। दोनों की गति अवस्था में बहुत अंतर है।

संसार की समूची सांसारिकता और सामाजिकता के लिए जीवन के आख्यान का हमारे आसपास होना जरूरी होता है। आख्यान का रचा जाना मूलत: जीवन को जीए जाने की प्रक्रिया है। जीवन को जी लेना ही विचार का आस्वाद होता है। इसी भूमि पर रचना एक आस्वाद से जीवन की स्थिति को रचते हुए जिंदगी की व्याख्या करती है। यह जिंदगी की व्याख्या सही मायने में हमारे संसार की स्थिति को दूसरी स्थिति से जोड़ देती है। जीवन को अपने हिसाब से रचने का सूत्र भी आधुनिकता की देन है। इस तरह संसार की सारी परिक्रमा आधुनिकता के सूत्र में मानवीय जरूरत और तर्क के सहारे सच के साथ खड़ा होने में है। अपनी बात को सही ढंग से लागू करने में है। यह तभी संभव है जब बनी-बनाई जमीन तोड़ कर अपने पैरों पर आगे बढ़ने की कहानी लिखने का साहस हो। यह साहस का सूत्र ही जीवन का निर्माता है। विचार में जीना और विचार के साथ होते समय विचार का नाटक खेलना बहुत आसान है। आज हम सब विचार के साम्राज्य में होने की बात करते हैं। यह भी कहते नहीं अघाते कि पूरी दुनिया के साथ हमारी सामाजिकी है- इस क्रम में समाज में होने और अपने होने की सामाजिकी का आज दावा जितनी तेजी से किया जाता है, उतनी तेजी से किसी युग में नहीं किया गया। हम एक समय में सामने के वस्तु संसार में होते हुए संसार के किसी भी सत्य के आभास से एक क्षण बाद भी साक्षात करने की अवस्था में होते हैं। यह होना एक साथ कई समयों/ कई समाजों और कई संसारों से जोड़ कर सीधे-सीधे वस्तु और विचार की बहुलता से हमें जोड़ देता है। आज कुछ भी नियत/ स्थायी नहीं है, सब बहुत तेजी से बदल रहा है। मन की गति से वस्तु संसार और विचार संसार में बदलाव और गति की अवस्था को एक जीवित संरचना में अपने सामने पाते हैं। इस तरह संसार की गति को जीवन की गति के रूप में देखने-जानने की जरूरत ही आज सबसे बड़ा मानवीय सच है। एक तरंगायित संसार में हम सब आ गए हैं। इस तरंगमई संसार में आदमी वहीं नहीं है जहां तक लोग उसके साथ हैं या जिनके बीच वह उठता-बैठता है, बल्कि वह एक जगह से पूरे संसार की भीड़ में अपने समर्थक अपनी एक मंडली में पहुंच जाता है, जिन्हें प्रत्यक्षत: तो शायद देखा भी नहीं, पर दूर से एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह से जानने-समझने का दावा करते हैं। यह दावा इस कदर होता है कि वैचारिकी के संसार में भी लोग अपना-अपना समूह लेकर घूमते रहते हैं। इस क्रम में लगातार समूह-दर-समूह बनते रहते हैं। समूह की दुनिया में हर तथ्य विचार की तरह आता है, तो विचार की तरह तथ्य को प्रस्तुत करने वाले भी कम नहीं हैं।

यहां संख्या के हिसाब से आदमी की लोकप्रियता तय होती है। संख्या सामाजिक बन जाती है। संख्या कार्य का गुणात्मक या परिणाम परक मूल्य कुछ भी नहीं करती, पर यह तय है कि यहां और कोई तरीका नहीं है अपने आप को समझने का। आधुनिकता की इस विचार यात्रा में एक गति है। बहुत तेजी से लगता है कि लोग आपके साथ हैं या नहीं हैं। साथ होने का भ्रम पाले हुए स्माइली की टिक्की को लेकर आप घूम सकते हैं। यह कहते हुए मगन हो सकते हैं कि आपको इतने लाईक्स आए और जब तक समर्थन में स्माइली नहीं आते, विचार करने वाला तथाकथित विचारक बार-बार अपने यंत्र की अपडेट स्थिति को देखता रहता है। जाने-अनजाने अपसेट होता रहता है। इस अवस्था में अपने को सामान्य करने के लिए एक गलियारे से दूसरे गलियारे में घूम आते हैं। पर सच है कि कहीं भी कोई सामान्य नहीं है, न टिक्की देने वाला, न टिक्की पाने वाला। सबके सब एक असामान्यता के विचार में जी रहे हैं। एक होड़ और हड़बड़ी मची है। आधुनिकता के के लिए लोकतांत्रिक समाजों की भूमि बहुत उर्वर होती है। वैसे आधुनिकता की पूरी विचारणा मानवीय अस्तित्व की उस जिज्ञासा से है, जब वह यह सोचता है कि वह क्यों है? उसके होने के मायने क्या हैं? अपने मायने को समझने और सिद्ध करने में जो कुछ मानवीय अस्तित्व के साथ बुद्धि का राज हमारे सामने लाता है। यह बात अलग है कि संसार में आदमी सबसे पहले वस्तु के धरातल पर सामने आता है पर वस्तुमयता के संसार में आते ही विचार की दुनिया शुरू हो जाती है। विचारों की दुनिया में आदमी बचा ही नहीं, अब तो हम एक ऐसे ‘चिपीकृत’ समय में आ गए हैं कि सब कुछ तय चिप ही करेगा। चिप के अलावा कुछ भी नहीं है। बुद्धितंत्र को बक्से में रख कर आदमी चिप के जादू में खो गया है। डिजिटल होते समय में कोई भी ऐसा नहीं है जो डिजिटल का विरोध करते हुए भी डिजिटल न होना चाहता हो। सब डिजिटल हो रहे हैं, सब एक गतिकीय संसार में मुग्धता के साथ शामिल हो रहे हैं और अपने होने को इसी तरह परिभाषित करना चाहते हैं पर सच में देखा जाए तो जीवन में स्थायित्व और नैतिकता को छोड़ कर केवल गति को बांचती दुनिया के सहारे कहां और कितना चला जा सकता है!

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