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आधी दुनियाः हमारी थोड़ी-सी बेवफाई..

दुनिया में प्रेम को नए ठिकाने मिल चुके हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम और ऑनलाइन डेटिंग की वेबसाइटों के जरिए पूरी दुनिया के साथ हमारे देश के युवा भी बड़ी संख्या में इंटरनेट पर प्रेम की तलाश करते और प्यार के इजहार के लिए इसे अपना माध्यम बनाते हैं।

Author August 26, 2018 5:51 AM
वैसे रिश्तों में टूटन की वजह हमारी जिंदगी में भागदौड़ का बढ़ना हो सकता है। यह भी संभव है कि टीवी, मोबाइल, इंटरनेट की दुनिया ने हमें स्वाभाविक रिश्तों से विमुख करते हुए आभासी रिश्तों की तरफ मोड़ दिया है।

मनीषा सिंह

दुनिया में प्रेम को नए ठिकाने मिल चुके हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम और ऑनलाइन डेटिंग की वेबसाइटों के जरिए पूरी दुनिया के साथ हमारे देश के युवा भी बड़ी संख्या में इंटरनेट पर प्रेम की तलाश करते और प्यार के इजहार के लिए इसे अपना माध्यम बनाते हैं। सिर्फ प्रेम नहीं, बेवफाई का भी एक मंच इस आभासी दुनिया में है और कई सर्वेक्षण साबित कर चुके हैं कि हमारा समाज जीवनसाथी से बेवफाई के मामले में पश्चिमी समाजों से होड़ लेने लगा है। हालांकि सर्वेक्षण यह भी साबित कर रहे हैं कि रिश्तों में बेईमानी के मानकों पर मर्द अपनी संगिनी यानी महिलाओं से काफी आगे हैं।

वैसे रिश्तों में टूटन की वजह हमारी जिंदगी में भागदौड़ का बढ़ना हो सकता है। यह भी संभव है कि टीवी, मोबाइल, इंटरनेट की दुनिया ने हमें स्वाभाविक रिश्तों से विमुख करते हुए आभासी रिश्तों की तरफ मोड़ दिया है। ऐसे में वास्तविक रिश्तों का बासीपन लोगों को जल्दी ही परेशान करने लगता है। यह आकलन महिलाओं और पुरुषों- दोनों पर समान रूप से लागू होता है, लेकिन हमारे समाज का विद्रूप यह है कि वह इसे सिर्फ महिलाओं के संदर्भ से जोड़ता है और जब भी मौका मिलता है, स्त्री को बेवफा बताने और इसका खुल्लमखुल्ला उद्घोष करने से नहीं चूकता। अब तो बेवफाई के मामले में यह मांग भी उठने लगी है कि इसमें सजा का मामला एकतरफा क्यों रहे। यानी अगर मर्द विवाहेतर संबंध बनाता है तो समाज के साथ कानून भी उसे कठघरे में खड़ा करता है, लेकिन ऐसा करने पर स्त्री क्यों बचे। इधर ऐसा एक विचार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने है कि व्यभिचार, विवाहेतर संबंध या मोटे तौर पर बेवफाई के मामलों में औरत को बख्शा न जाए, बल्कि उसे मर्द के बराबर दोषी ठहराने की व्यवस्था बने। अभी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत बेवफाई साबित होने पर केवल पुरुषों को दंडित किया जाता है, महिलाएं ऐसे मामले में आरोपी तक नहीं बनाई जातीं।

इसमें संदेह नहीं कि हमारे देश के पारंपरिक समाजों में परिवार को अहम स्थान दिया गया है। विवाह के बाद सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वजहों के चलते बहुत-सी शादियां टूटते-टूटते रह जाती हैं। इसके अलावा थोड़ा-बहुत डर कानून का भी है, जिनकी वजह से परिवार टिके हुए हैं। लेकिन इनमें भी जब कभी चोरी-छिपे, तो कभी खुलेआम बेवफाई के किस्से सामने आते हैं और ऐसे मामलों में मर्दों को दोषी पाए जाने पर सजा भी दी जाती है। लेकिन परिवार नामक संस्था को इतनी ज्यादा अहमियत देने के बाद भी बेवफाई की अपनी एक चाल है, जो कई परिवारों को भीतर ही भीतर घुन की तरह खाए जाती है। फिर भी समाज और कानून के डर से वह खोखला परिवार बाहर से सुखी-संतुष्ट दिखने का स्वांग रचता रहता है।

यह बेवफाई सीधे तौर पर बलात्कार या वैवाहिक धोखाधड़ी के दायरे में नहीं आती, इसलिए कुछ समाजों में इसे प्रत्यक्षत: अपराध नहीं माना जाता। मामला खुल जाए तो कह-सुन कर या परिवार के भीतर बड़े-बुजुर्गों के साथ मिल-बैठ कर बीच का कोई रास्ता निकालने की कोशिश भी की जाती है। इसके बाद भी अगर बात नहीं बनती, तो मामला कोर्ट-कचहरी में पहुंचता है और ज्यादातर ऐसे मामलों में कानून की राय यह रही है कि मर्द ही इसका दोषी होता है। अब मांग उठ रही है कि अगर बेवफाई एकतरफा नहीं है, तो कानूनन सजा का सिर्फ एक छोर क्यों रहे। दूसरे छोर की बेवफाई के लिए स्त्री भी दंड की भागी बने।

महिलाओं को बेवफाई के लिए दंडित करने की व्यवस्था बनाने की मांग के साथ जो हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया गया है, उसमें गुजारिश की गई है कि व्यभिचार को पहले की तरह दंडनीय बनाए रखा जाए। इसका अभिप्राय यह है कि कानून को हल्का करने से विवाह नामक संस्था की पवित्रता पर असर पड़ेगा और लोग बेवफाई को आतुर हो जाएंगे। असल में यह धारणा एक विडंबना ही है कि हमारे समाज में विवाह कानून के भय से टिके हैं न कि आपसी प्रेम और विश्वास के सहारे। पर जिस मसले पर अब ज्यादा उल्लेखनीय ढंग से विचार हो रहा है, वह स्त्री की बेवफाई का है। इससे इनकार नहीं कि धीरे-धीरे खुल रहे समाज में स्त्री जैसे-जैसे अपने हक-हकूक जान रही है, उसे प्रेम के लिए नीरस खूंटों से बंधा रहना भी गवारा नहीं हो रहा है। ऐसे समाज में, जहां शादी-ब्याह में आज भी स्त्री की कोई मर्जी नहीं चलती और सौ में निन्यानबे मामलों में पति चाहे जैसा हो, उसे औरत स्वीकार ही कर लेती है। पर एक फीसद मामले में अगर विवाह के बाद कोई स्त्री शादी से बाहर जाकर अपने मन लायक कोई साथी चुनती है, तो इसे बर्दाश्त करना समाज और कानून को भारी पड़ने लगा है और अब उसे दंडित करने की जरूरत महसूस होने लगी है। अच्छा होगा कि बेवफाई के इस दूसरे छोर पर तोहमतें लगाने और उसे प्रताड़ित करने का कानूनी रास्ता तलाशने से पहले उन तथ्यों-सर्वेक्षणों को देख लिया जाए जो बताते हैं कि बेवफाई का पलड़ा आखिर किस तरफ ज्यादा झुका हुआ है।

कई सर्वेक्षण साबित कर चुके हैं कि हमारा समाज जीवनसाथी से बेवफाई के मामले में पश्चिमी समाजों से अब कोई ज्यादा पीछे नहीं है और रिश्तों में ऐसी बेईमानी के मानकों पर मर्द महिलाओं से काफी आगे हैं। रिश्तों में टूटन की वजह कुछ भी हो, पर इतना तय है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में अब असंतोष की मात्रा कुछ ज्यादा बढ़ गई है। इस पर इंटरनेट और स्मार्टफोन जैसे आधुनिक तकनीकी इंतजामों ने दूसरी शादियों से तुलना के ऐसे-ऐसे जरिए उपलब्ध कराए हैं कि लोग अपने जीवनसाथी की मामूली खामियों को कुछ ज्यादा ही नोटिस करने और किसी नए साथी की तलाश करने लगते हैं। वैसे तो यह आकलन महिलाओं और पुरुषों, दोनों पर समान रूप से लागू होता है, लेकिन हमारे समाज का विद्रूप यह है कि वह इसे सिर्फ महिलाओं के संदर्भ से जोड़ता है और जब भी मौका मिलता है, स्त्री को बेवफा बताने और इसका खुल्लमखुल्ला उद्घोष करने से नहीं चूकता।

यह मामला असल में बेवफाई के मर्दवाद का है। ज्यादातर मर्दवादी समाजों में इसी तरह का चलन है, जहां पुरुष के बेवफा निकल जाने, एक या ज्यादा महिलाओं से प्यार में धोखा करने को सामान्य घटना माना जाता है, पर अगर एक स्त्री ऐसा करती है, तो उससे बदला लेने की नीयत से पूरा पुरुष समाज उस पर टूट पड़ता है। पूछा जाने लगता है कि आखिर उस मर्द में क्या खामी थी, जो बेवफाई की? यही हमारे समाज का असली विद्रूप है। बेहतर होगा कि किसी स्त्री को बेवफा बताने और उसके लिए दंड की मांग करने से पहले कोई मर्द संबंधों में बरती खुद की ईमानदारी की भी जांच कर ले। बेवफाई का एकतरफा ढिंढोरा पीटने से बेहतर यही होगा कि जितनी आजादी की मांग मर्द अपने लिए कर रहे हैं, रिश्तों में उतनी नहीं तो थोड़ी-सी बेवफाई का हक अपनी संगिनी को भी दें। बदलते समय के साथ अगर प्रेम और शादी की पवित्रता का मसला तेजी से आधुनिक हुआ है और इसमें जिंदगी भर किसी एक के साथ टिके रहने की शर्त में सेंध लग रही है, तो बेवफाई को लेकर भी अब हमारे नजरिए में कुछ फर्क आना चाहिए।

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