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‘स्मरण’ कॉलम में लोकेंद्र नामजोशी का लेख : व्यंग्य का महारथी

व्यंग्य लेखन की विधा को हल्के-फुल्के मनोरंजन की परिधि से बाहर निकालकर समाजहित से जुड़े प्रश्नों के व्यापक कैनवस से जोड़ने वाले हिंदी के ख्यातिनाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की रचनाएं आज प्रासंगिक हैं।
हरिशंकर परसाई

व्यंग्य लेखन की विधा को हल्के-फुल्के मनोरंजन की परिधि से बाहर निकालकर समाजहित से जुड़े प्रश्नों के व्यापक कैनवस से जोड़ने वाले हिंदी के ख्यातिनाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की रचनाएं आज प्रासंगिक हैं। लगातार गर्त्त में जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को बहुत ही निकटता से पकड़ने वाले शायद वे पहले हिंदी के व्यंग्यकार थे। परसाईजी ने अपने लेखन की शुरुआत उस दौर में की जब व्यंग्य लेखन को साहित्यक जगत में दोयम दर्जे का समझा जाता था। उस पर यदि व्यंग्य लेखन का विषय समसामयिक राजनीति पर केंद्रित हो तो उस लेखक को एक प्रकार से साहित्यिक जगत में बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता था। यह वह दौर था जब, दशकों से चली आ रही इन्ही विसंगतियों के कारण व्यंग्य लेखन को अपनाने में तमाम लेखक झिझक महसूस करते थे। लेकिन राजनीतिक चेतना से परिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी परसाईजी ने इसी मिथक को तोड़ने के लिए अपनी कलम का भरपूर उपयोग एक अस्त्र के रूप में किया।

लिहाजा, 30-35 साल पहले उन्होंने देश की राजनीतिक विद्रूपताओं पर अपनी व्यंग्य रचनाओं से जो प्रहार किए, वह अभूतपूर्व था। उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। इसकी बानगी हम उनकी ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ रचना में पूरी शिद्दत के साथ महसूस कर सकते हैं, जिसमें वे लिखते हैं, ‘…श्रद्धा पुराने अखबार की तरह रद्दी में बिक रही है। विश्वास की फसल को तुषार मार गया है। इतिहास में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा और विश्वास से हीन नहीं किया गया होगा। जिस नेतृत्व पर श्रद्धा थी, इसे नंगा किया जा रहा है। जो नया नेतृत्व आया है वह उतावली में अपने कपडेÞ खुद उतार रहा है। कानून से विश्वास उठ गया है। अदालत से विश्वास छीन लिया गया है। बुद्धिजीवियों की नस्ल पर ही शंका की जा रही है। कहीं कोई श्रद्धा नहीं विश्वास नहीं। अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूं, ‘यह चरण छूने का मौसम नहीं लात मरने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।’

दरअसल, तत्कालीन राजनीति में शायद ही कोई ऐसी विसंगति रही हो जिसमें उनके शब्दों ने मर्मांतक आघात न पहुंचाया हो। उनका लेखन सीधे मर्म पर चोट करने वाला हुआ करता था। उनकी रचनाओं का दायरा इतना व्यापक था कि उसमें जनसाधारण से लेकर बड़े से बड़े राजनीतिक नेता, प्रशासक, विश्व के बड़े राजनयिक, अवसरवादी, पदलोलुप, पूंजीपति, दलाल, भ्रष्टाचारी तो होते ही थे, साथ ही शोषण, अपराध, अकाल, बाढ़, भुखमरी, दंगे, धार्मिक अनाचार और छद्म के भीतर जकडेÞ हुए पंडे, पुजारी, महात्मा जैसे विषय भी शामिल रहते थे।

एक बार बड़े लोगों के क्लब में भाषण देने के बाद अपनी मन:स्थिति का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं, ‘मैं देश की गिरती हालत, महंगाई गरीबी बेकारी भ्रष्टाचार पर बोल रहा था और खूब बोल रहा था। मै पूरी पीड़ा से गहरे आक्रोश से बोल रहा था। पर जब मैं ज्यादा मार्मिक हो जाता वे लोग तालियां पीटने लगते थे। मैंने कहा- हम बहुत पतित हैं तो वे लोग तालियां पीटने लगे। और मैं समारोह के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसें, उसमें क्या कभी कोई क्रांतिकारी हो सकता है? होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबड़े टूटेंगे।’

उनका जन्म 22 अगस्त 1922 को जमानी, होशंगाबाद मध्य प्रदेश में हुआ था। परसाईजी ने अठारह वर्ष की उम्र में जंगल विभाग में नौकरी की। उसके बाद खंडवा में छह महीने अध्यापन। दो वर्ष जबलपुर में शिक्षण की उपाधि ली। 1942 से वहीं माडल हाई स्कूल में अध्यापन कार्य किया। उसके बाद 1943 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। 1943 से 1957 तक निजी स्कूलों में नौकरी की। लेकिन आखिरकार नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन की शुरुआत। परसाईजी ने जबलपुर से ‘वधासु’ नाम की साहित्यिक मासिकी निकाली। नई दुनिया में ‘सुनो भई, साधो’ नई कहानियां में ‘पांचवां कालम’ और ‘उलझी-उलझी’ और कल्पना में ‘और अंत में’ स्तंभ लिखा। इसके अलावा कहानियां, उपन्यास और निबंध लिखे। मुख्य धार व्यंग्य ही रहा। राजनीतिक विसंगतियों पर अपने चिंतन के तरकश से शब्दों के बाण चलाने वाले व्यंग्य के इस महारथी की प्रासंगिकता सदैव बरकरार रहेगी।

समसामयिक घटनाओं को अपनी विलक्षण दृष्टि से देखने की अदभुत क्षमता के चलते उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक विसंगतियों का चित्रण करने में जो महारत हासिल की थी उसका तोड़ असंभव है। इन्हीं विशेषताओ के चलते वे साहित्यिक जगत में व्यंग्य विधा को नई ऊंचाइयां प्रदान करने में कामयाब रहे।

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