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विचार बोध: जोगन मीरा की भक्ति

संसार से परम ब्रह्म तक के मार्ग में मीरा को डर, अपमान और तिरस्कार जैसे सांसारिक नियंत्रण नहीं रोक पाते हैं। उनकी यात्रा का न कोई प्रारंभ है और न कोई अंत है। समर्पण और आनंद के परम भाव में मीरा भक्ति में नाचती रहती हैं, गाती रहती हैं। मीरा की कहानी यह बताती है कि अध्यात्म का मार्ग ‘चुना’ नहीं जा सकता है।

मीराबाई राजसी ठाठबाट के प्रति उदासीन रहते हुए हमेशा कृष्ण के प्रेम में स्वयं को डूबोए रखा।

रोहित कुमार

मीरा आस्था में नहाई हमारी परंपरा की वो घनी छांव हैं जो तपते जीवन को सहलाती हैं। आज जब आस्था और ईश्वर दोनों को लेकर नकार का विमर्श जब-तब सतह पर आने लगता है तो मीरा हमारे सामने तपाकी सोच को स्थिर होने के शीतल सबक की तरह सामने आती हैं।

मीरा ने राजसी ठाठ के प्रति उदासीनता दिखाते हुए कृष्ण भक्ति में खुद को समर्पित कर दिया। राजस्थान के मेड़ता इलाके में जन्मी मीरा की किशोरावस्था में शादी हुई और उसी कच्ची उम्र में उनके पति का देहांत भी हो गया। लेकिन मीरा ने उस दौर की हर रीत और कुरीति को नकारते हुए, लोक-लाज की परवाह किए बगैर अपना रास्ता तय किया।

उन्हें हमेशा हौसला देने वाले पति और ससुर दोनों दुनिया से विदा हो गए तो जोगन मीरा को समाज ने स्वीकार नहीं किया। फिर भी दुनिया के ताने-बाने में बिना फंसे और तानों की परवाह किए बगैर मीरा अपनी धुन में मगन रहींं। न सिर्फ राजस्थान बल्कि अपने भक्तिरस से सबको सराबोर करने वाली मीरा के पद भारतीय साहित्य का अमिट हिस्सा हैं।

मीरा का जीवन हमें उमंग और उम्मीद से भरता है, क्योंकि हमारे देश के युवा, खास तौर से किशोरियां और युवतियां अपने नजरिए से दुनिया देखना, कहना और जीना चाहती हैं। मीरा के यहां अध्यात्म के पदचिह्न खोजने वालों के आगे हमेशा यह चुनौती रही है कि वे एक तरल मन को पढ़ने के लिए बुद्धि या दर्शन का कौन सा सूत्र पकड़ें। अध्यात्म का आशय अगर आत्म साक्षात्कार ही है तो मीरा इस आशय को गीति-साधना के साथ पूरी करती दिखती हैं। पर यह आत्म- साक्षात्कार भक्ति दर्शन का कोई सीधा सूत्र नहीं विकसित करता।

यहां तो सूत्र और शास्त्र के नाम पर एक ही स्थिति है और वह स्थिति है प्रेम और भक्ति के अथाह तक उतरी एक स्त्री की मन:स्थिति, जिसे पढ़ने के लिए भी एक तरल और उलझन रहित मन की जरूरत है। दिलचस्प है कि महावीर की यात्रा तप के मार्ग से पूरी हो जाती है पर बुद्ध उस मार्ग पर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। बुद्ध को ध्यान का मार्ग पकड़ना होता है। कबीर घर का काम करते हुए भी इस यात्रा में सफल हो जाते हैं।

मीरा की आध्यात्मिक यात्रा भी जीवन की कुछ घटनाओं के प्रभाव में शुरू होती है। लेकिन मीरा का मार्ग महावीर, बुद्ध या कबीर के मार्ग से अलग है। वे जिस तरह प्रभु के रंग में रंगती हैं, वह एक अलग ही अनुभव है।

अध्यात्म के कोई नियम-कायदे या शास्त्र मीरा ने औपचारिक रूप से नहीं पढ़े थे, पर अध्यात्म उन पर स्वत: उतरने लगता है। वे प्रभु के गीत गाने लगती हैं तो शब्द स्वयं लयबद्ध होने शुरू हो जाते हैं। अलौकिक का लौकिक से यह अद्भुत संगम ही मीरा होना है। मीरा की अध्यात्म की इस यात्रा में कदम-कदम बढ़ना नहीं होता है। वे तो सीधे छलांग लगा देती हैं। वे संसार के सब नियम तोड़ देती हैं और अपने प्रभु से एकाकार हो जाती हैं।

संसार से परम ब्रह्म तक के मार्ग में मीरा को डर, अपमान और तिरस्कार जैसे सांसारिक नियंत्रण नहीं रोक पाते हैं। उनकी यात्रा का न कोई प्रारंभ है और न कोई अंत है। समर्पण और आनंद के परम भाव में मीरा भक्ति में नाचती रहती हैं, गाती रहती हैं। मीरा की कहानी यह बताती है कि अध्यात्म का मार्ग ‘चुना’ नहीं जा सकता है।

मीरा की सांसारिक कहानी संक्षेप में यही है कि वे एक राजा के घर में पैदा हुईं। मध्यकाल में महिलाओं की स्वतंत्रता उस समय बहुत सीमित थी। समाज के तथाकथित उच्च वर्ग में तो यह स्वतंत्रता किसी कैद से कम नहीं थी। गरिमा और संस्कृति की परिभाषाओं ने महिलाओं की स्वतंत्रता को कलंक की तरह प्रचारित कर दिया था।

ऐसे में पति और ससुर की असामयिक मृत्यु ने मीरा का संसार से मोह ही भंग कर दिया था। फिर धीरे-धीरे बचपन में कृष्ण की मूरत से हुआ लगाव मीरा के मन में गहरा होता गया और आत्मा की अमूर्त ऊंचाइयों तक उनकी भक्ति पहुंचती गई।

मीरा को ऐसे हाल में साधारण मनुष्यों के लिए समझना संभव नहीं था और उस नासमझी का शिकार उनके परिजन भी हुए। उनके अहंकार से मीरा का अपमान होने लगा और मीरा सब कुछ छोड़कर वृंदावन के रास्ते द्वारिका तक कृष्ण को जीती चली गर्इं। संसार बहुत पीछे छूट गया।

मीरा के भजन जन-जन को भाने लगे क्योंकि इनमें एक अजीब सा अल्हड़पन था, एक मस्ती थी। इनमें साहित्य के सामान्य नियमों का तो उल्लंघन था पर वह उल्लंघन भी बच्चों की शैतानियों की तरह सबको प्रिय लगता था।

बरसों तक उनके भजन मौखिक रूप से ही आगे बढ़े। बाद में विद्वानों ने इनका संकलन शुरू किया। जब मेवाड़ के शासकों को इस आध्यात्मिक शक्तिका अहसास होने लगा, जब उनको लगा कि मीरा का अपमान उनके लिए अनंत कष्ट लेकर आया है तो वे मीरा को फिर से ससम्मान लाने के लिए द्वारिका पहुंचे। लेकिन तबतक मीरा की अध्यात्म की यात्रा अलौकिक में प्रवेश कर चुकी थी।

राजस्थान के इतिहास में मीरा एक ऐसा चरित्र है, जिसकी स्वीकार्यता या लोकप्रियता भारत के हर कोने में है। उनके भजन हर भाषा में अनूदित हुए हैं। जहां भी कृष्ण का जिक्र आता है, मीरा के बिना पूरा नहीं होता है। यही नहीं, एक स्त्री के तौर पर मीरा ने बगैर विद्रोह की तल्खी दिखाए एक तरल और शीतल मन से स्वाधीनता का जो पाठ गढ़ा, वह स्त्री संघर्ष और विमर्श का भी एक सर्वथा भिन्न पाठ है।

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