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बाजार : सितारे, कंपनियां और भ्रामक विज्ञापन

यह कतई जरूरी नहीं होता कि ये हस्तियां उन सारे उत्पादों का अपने जीवन में कोई इस्तेमाल करते हों, पर विज्ञापनों में उनकी छवि इस तरह पेश की जाती है कि वे उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 4:08 AM
सचाई यह है कि खेल या सिनेजगत की हस्तियों द्वारा प्रचारित चीजों के विज्ञापनों में यह घोषणा कहीं नहीं होती है कि इन चीजों का इस्तेमाल खुद उन हस्तियों ने किया है।

कुछ ही समय पहले एक नामी बिल्डर के पास अपना घर बुक कराने वाले सैकड़ों आम लोगों ने महेंद्र सिंह धोनी को कानूनी नोटिस भेजा है कि उनके द्वारा किए गए भ्रामक प्रचार के झांसे में आकर उन लोगों ने उसबिल्डर की योजनाओं में पैसा लगाया था, लेकिन मकान सालों बीतने के बाद भी नहीं मिला है। पैसा लगाने वाले इन निवेशकों का तर्क था कि धोनी इस बिल्डर के ब्रांड अंबेसडर हैं, इसलिए कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है। ऐसे में वे या तो उन्हें घर दिलाएं या फिर हर्जाना। कानूनी दबाव बढ़ता देख अब धोनी ने खुद को बिल्डर से अलग कर लिया है, परस्पर सहमति से उन्होंने घोषणा की है कि अब वे उस बिल्डर के ब्रांड अंबेसडर नहीं हैं।

जैसा कदम इस समय महेंद्र सिंह धोनी ने उठाया है, कुछ वैसे ही उपाय पिछले दो वर्षों में फास्ट फूड मैगी में हानिकारक तत्त्व की मौजूदगी के मामले उजागर होने के बाद कई फिल्मी सितारों ने किए थे। इस खाद्य पदार्थ का विज्ञापन करने वाली कई मशहूर हस्तियों-अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और माधुरी दीक्षित पर बिहार की एक अदालत ने पुलिस केस दर्ज करने और जरूरत पड़ने पर गिरफ्तार करने के निर्देश भी दिए थे। उत्तराखंड खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग की तरफ से भी मई 2015 में माधुरी दीक्षित को नोटिस भेजा गया था। माधुरी दीक्षित ने इस नोटिस के जवाब में लिखा था कि न तो उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में मैगी कभी खाई और न ही किसी को बनाकर खिलाई है। माधुरी दीक्षित हों या महेंद्र सिंह धोनी, उनके कदमों से यह सवाल एक बार फिर उठा है कि क्या मशहूर लोगों और सिने हस्तियों को ऐसी चीजों का प्रचार करना चाहिए, जिनकी गुणवत्ता और उपयोगिता आदि को लेकर कई संदेह हो सकते हैं? क्या उन्हें ऐसी चीजों का बखान करना चाहिए जिनके वे खुद ग्राहक नहीं हैं, जिनका वे खुद तो इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन उनके गुणों का बढ़-चढ़कर उल्लेख करते हुए जनता से उन्हें अपनाने की बात कहते हैं।

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मशहूर हस्तियां ऐसा प्रचार क्यों करती हैं? पिछले साल एक ही महीने (फरवरी) के दौरान भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की ग्राहक शिकायत परिषद (सीसीसी) को जिन 167 विज्ञापनों की शिकायतें मिली थीं, उनमें से अधिकतर 73 शिकायतें पर्सनल और हेल्थकेयर वर्ग में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर ही की गई थीं। ये शिकायतें सही भी पाई गर्इं। शिकायतों के इन आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विज्ञापनों द्वारा धोखाधड़ी किस स्तर पर हो रही है? ऐसे में यह समझना भी कठिन नहीं कि इन विज्ञापनों के चमक-दमक भरे दावों पर लगाम लगाना कितना जरूरी है। देखा गया है कि बाजार में किसी भी उत्पाद को चर्चित कराने और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए विभिन्न कंपनियां सिनेमा और खेल जगत की हस्तियों का सहारा लेती हैं।

यह कतई जरूरी नहीं होता कि ये हस्तियां उन सारे उत्पादों का अपने जीवन में कोई इस्तेमाल करते हों, पर विज्ञापनों में उनकी छवि इस तरह पेश की जाती है कि वे उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं और उनके कई फायदे उन्हें नजर आए हैं। अपने चहेते सितारों को किसी चीज का प्रचार करते देख आम लोगों के मन में यह भावना पैदा होती है कि क्यों न वे भी उन चीजों का इस्तेमाल करें। साबुन, तेल, सूप, नूडल्स, वॉटर प्यूरिफायर से लेकर सेहत बनाने वाली दवाओं तक के प्रचार सिनेमा और खेल जगत की हस्तियां खूब करती हैं। यही नहीं, वे शायद ही कभी जांच अपने स्तर पर कराती हैं कि जिन बातों या फायदों का उल्लेख उन्होंने विज्ञापन में किया है, उनमें कोई सचाई है भी या नहीं। वे विज्ञापनदाता द्वारा सुझाई गई लाइनों और दावों को दोहरा देते हैं जिससे आम जनता में यह संदेश जाता है कि उनके चेहेते सितारे तक वे चीजें अपने प्रयोग में ला रहे हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें खरीदने में कोई हर्ज नहीं हैं। खास तौर से बच्चों और महिलाओं को किसी खास वस्तु की तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसे ही सितारों द्वारा कोई उत्पाद विज्ञापनों में लाया जाता है और देखते ही देखते उस उत्पाद की बिक्री बढ़ जाती है। यह विज्ञापन जगत की सोची-समझी प्रक्रिया है। पर इसमें पेच यही है कि क्या इस तरह भोली-भाली जनता को मूर्ख तो नहीं बनाया जाता है?

इस बारे में सचाई यह है कि खेल या सिनेजगत की हस्तियों द्वारा प्रचारित चीजों के विज्ञापनों में यह घोषणा कहीं नहीं होती है कि इन चीजों का इस्तेमाल खुद उन हस्तियों ने किया है। किसी उत्पाद की गुणवत्ता को जांचे-परखे बिना उन्हें खरीदने की सलाह देने के बारे में कुछ नियम देश में पहले से हैं। जैसे खाने-पीने की चीजों के बारे में केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का नियम यह है कि अगर किसी कंपनी का ब्रांड अंबेसडर किसी चीज की खासियत या गुणवत्ता का बखान करता है और वह गुण उसमें नहीं होता है, तो ऐसे विज्ञापन को भ्रामक माना जाता है। ऐसे विज्ञापन के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

हाल ही में, उपभोक्ता मामलों की बीस सदस्यीय संसदीय समिति (जिसके अध्यक्ष तेलुगु देशम पार्टी के सांसद जेसी दिवाकर रेड्डी हैं) ऐसी सिफारिशें की हैं, जिनके अनुसार गुमराह करने वाले विज्ञापनों के मामले में दो साल की सजा और दस लाख जुर्माने की सजा हो सकती है। गलती दोहराने पर पांच साल की सजा और पचास लाख रुपए जुर्माने का प्रस्ताव समिति ने दिया है। हालांकि अभी सिर्फ यह प्रस्ताव है, लेकिन देश के खाद्य कानून में तो इसके लिए पहले से ही सजा की व्यवस्था भी है पर ज्यादातर सितारे ऐसे मामलों में खुद को बचा ले जाते हैं। आज तक ऐसा कोई मामला प्रकाश में नहीं आया है जब भ्रामक विज्ञापन के लिए दोषी सितारे को सजा दी गई हो। कानून में यह व्यवस्था भी है कि अगर भ्रामक विज्ञापन की बात साबित हो जाती है तो भी किसी सितारे पर कार्रवाई तभी हो सकती है जब वह जांच और पूछताछ में सहयोग न दे और भविष्य में वही विज्ञापन फिर करे।

असल में, इसकी जिम्मेदारी खुद सिनेमा और खेल जगत की हस्तियों की बनती है कि वे किसी उत्पाद की गुणवत्ता आदि पहलुओं के बारे में आश्वस्त हुए बिना कोई विज्ञापन या प्रचार न करें। उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जिन वस्तुओं का वे प्रचार करते हैं, उनकी बिक्री से कंपनियां लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमाती हैं और उन्हें जनता की सेहत से कोई सरोकार नहीं होता। हालांकि, इस संबंध में कुछ फिल्मी सितारों ने पान-मसाले और गुटखे आदि को हानिकारक मानते हुए या तो उनके विज्ञापन करने से इनकार किया है या फिर उन विज्ञापनों में वे खुद पान मसाला आदि खाते हुए नहीं दिखाई दिए हैं, लेकिन इससे ज्यादा राहत नहीं मिलती। उन्हें ऐसे विज्ञापनों से यह मानते हुए स्पष्ट दूरी बनानी चाहिए कि समाज और जनता के प्रति उनकी भी कोई जिम्मेदारी है, इसलिए वे खुद कोई ऐसी सलाह विज्ञापन के जरिए नहीं देंगे, जिसके बारे में उन्हें या देश को संदेह हो सकता है।

सितारों को दौलत-शोहरत से आगे बढ़कर जनता के हितों के बारे में भी सोचना चाहिए। वे इस जिम्मेदारी से यह कर बरी नहीं हो सकते हैं कि उन्होंने किसी उत्पाद का सिर्फ प्रचार किया है, उसे उन्होंने खुद इस्तेमाल में नहीं लिया है। यह काम कानून के जरिए भी हो सकता है। भ्रामक विज्ञापनों के लिए सितारों को भी दोषी मानकर कठघरे में लाया जाना चाहिए और इसकी वाजिब सजा दी जानी चाहिए। इस संबंध में केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग कहना है कि अगर किसी कंपनी के ब्रांड अंबेसडर द्वारा किसी उत्पाद के खास गुण का जिक्र किया जाता है और वह गुण उसमें नहीं है तो ऐसा विज्ञापन भटकाने वाला माना जाएगा। इस बारे में कार्रवाई भी की जा सकती है। ध्यान रहे कि किसी भी विज्ञापन का उद्देश्य किसी वस्तु या सेवा की जानकारी देना मात्र होना चाहिए, न कि उसके असर के बारे में बड़े-बड़े दावे करना। हालांकि कई बड़ी कंपनियां सितारों की मदद से झूठे दावे करके अपने उत्पाद बेचने में सफल हो जाती हैं, लेकिन देश के नागरिकों के साथ यह किसी धोखाधड़ी से कम नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि भ्रामक विज्ञापनों के नकारात्मक प्रभावों को लेकर न केवल सरकार गंभीर हो, बल्कि आम जनता भी सतर्क हो जाए।

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