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एवरेस्ट का पहाड़ जैसा दुख, आकर्षण के चलते हादसों का सिलसिला जारी

दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी एवरेस्ट पर चढ़ कर झंडा गाड़ देना किसी भी पर्वतारोही के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। वहां पहुंचने के लिए खिलाड़ी वर्षों अभ्यास करते हैं। पर पिछले कुछ सालों से एवरेस्ट अनेक समस्याओं की वजह बनी हुई है। वहां पर्वतारोहियों और उनके सहयोगियों की बढ़ती भीड़भाड़ की वजह से काफी मात्रा में कचरा जमा हो चुका है। बर्फीले तूफान की वजह से कई बार पर्वतारोहियों की जान पर बन आती है। कई दुर्घटनाओं में अनेक पर्वतारोही अपनी जान तक गंवा चुके हैं। पिछले महीने एवरेस्ट पर जमा भीड़ की तस्वीरें आर्इं, तो स्वाभाविक ही लोगों को आश्चर्य हुआ। मगर एवरेस्ट पर चढ़ना केवल पराक्रम नहीं, उसके आकर्षण की वजह जीवन की संभावनाओं की तलाश भी है। एवरेस्ट पर पहुंचने से जुड़े तथ्यों का विश्लेषण कर रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

Author Published on: June 9, 2019 3:32 AM
पांच साल पहले 18 अप्रैल, 2014 को इसके बेस कैंप पर ही सोलह शेरपाओं की बर्फीला तूफान आने से मौत हो गई थी।

अभिषेक कुमार सिंह

यों मनुष्य ने अजेय माने जाने वाले प्रकृति के अनगिनत दुर्गम लक्ष्यों को अपने साहस के बूते पर जीतने का स्वप्न हमेशा पाला है। आकाश-पाताल और यहां तक कि अंतरिक्ष, उसकी इसी अदम्य लालसा के आगे लगातार बौने साबित हुए हैं। आज इसमें भी संदेह नहीं कि इंसान जिन महान चुनौतियों को पार कर जाना चाहता है, उनमें से एवरेस्ट सबसे शीर्ष पर आता है। पहाड़ों को लांघने का दम भरने वाला हर आरोही अपने जीवन में कम से कम एक बार इसे पार पाने का स्वप्न देखता है। मगर यह सपना इधर एक नई त्रासदी रचता प्रतीत हो रहा है। इस साल मई के चौथे हफ्ते में कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आर्इं, जिनमें एवरेस्ट के रास्ते में पर्वतारोहियों की कतारें देख कर सड़क पर लगे ट्रैफिक जाम का अहसास होता है। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर ट्रैफिक जाम की यह स्थिति वहां होने वाली भीड़ का ही उदाहरण नहीं है, बल्कि इस कारण वहां हुई मौतों ने एवरेस्ट के आरोहण को सवालों के घेरे में ला दिया है।

तथ्य है कि इस मौसम की शुरुआत में ही एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले पर्वतारोहियों में से दस की मौत हो गई थी। इनमें चार भारतीय थे, जबकि नेपाल, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका के एक-एक पर्वतारोही ने वहां जान गंवाई। यह मई का तीसरा हफ्ता था। इससे अगले हफ्ते तक थकान, कमजोरी और आॅक्सीजन की कमी के कारण एवरेस्ट पर लगे जाम में फंस कर हुई मौतों की तादादा बढ़ कर अठारह हो गई। इन हादसों के पीछे एवरेस्ट पर आया कोई बर्फीला तूफान या फिर मौसम की अचानक कोई करवट नहीं थी। बल्कि इस दौरान तो मौसम साफ और पर्वतारोहण के अनुकूल था, जिसके कारण एवरेस्ट पर चढ़ने और उतरने वालों की भारी भीड़ जमा हो गई। ऐसे कई चित्र मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित हुए, जिनसे पता चला कि एवरेस्ट पर ठीक वैसी ही भीड़ लगी हुई है, जैसे कभी नोटबंदी के दौरान देश में बैंकों के बाहर लोगों की कतारें जमा हुई थीं। ज्यादा समस्या एवरेस्ट फतह की पताका फहराने के बाद उतरने वाले पर्वतारोहियों को हुई। पर्वतारोही उतराई में एवरेस्ट के निचले कैंप तक लगे जाम में फंस गए, जिस कारण उन्हें कई घंटे एक ही जगह खड़े-खड़े गुजारने पड़ गए। इससे हुई थकान और खून जमा देने वाली ठंड के बीच आठ किलोमीटर की ऊंचाई पर विरल हवा और आॅक्सीजन की कमी उनके लिए घातक साबित हुई और कई पर्वतारोहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

हादसों का सिलसिला

हादसे एवरेस्ट के लिए नए नहीं हैं। ट्रैफिक जाम के अलावा कई अन्य कारणों से भी लोग एवरेस्ट की राह में जान गंवाते हैं। जैसे पांच साल पहले 18 अप्रैल, 2014 को इसके बेस कैंप पर ही सोलह शेरपाओं की बर्फीला तूफान आने से मौत हो गई थी। इसके अलावा देश-विदेश के कई पर्वतारोही इसके रास्तों से लापता बताए गए थे। इसके बाद वर्ष 2015 में आए भूकंप में जहां पूरे नेपाल में करीब नौ हजार मौतें हुई थीं, तो एवरेस्ट के बेस कैंप के बर्फीले तूफान में दबने से अठारह पर्वतारोहियों और गाइडों ने जान गंवाई थी। हालांकि इन घटनाओं की वजह से वर्ष 2015 में नेपाल के कुल पर्यटन में इकतीस फीसद की कमी आई थी, तो एवरेस्ट पर जाने वालों की संख्या में भी पंचानबे प्रतिशत तक गिरावट आ गई थी। लेकिन जिस एवरेस्ट को सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग ने 1953 में फतह कर लिया था, उस पर आरोहण के संकल्प को दुनिया छोड़ने को तैयार नहीं है। भले ही इसके लिए पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि एवरेस्ट पर बढ़ रहे दबाव और उसके पर्यावरण के साथ हो रही सतत छेड़छाड़ के नतीजे के रूप में बर्फीला तूफान और जलजलों की जमीन तैयार हो रही है। यही नहीं, एवरेस्ट को पददलित करने की बढ़ती लालसा प्रकृति के साथ खिलवाड़ की वजह भी बनी है। एक आकलन के मुताबिक सन 1996 तक करीब तीन सौ टन कचरा और एवरेस्ट की राह में काल-कलवित हो गए सत्तर से नब्बे पर्वतारोहियों के शव वापस लाए जाने के बाद भी सैकड़ों टन कचरा इसकी ढलानों पर बिखरा हुआ है। यहां-वहां बिखरे खाली आॅक्सीजन सिलेंडर, मास्क, कपड़ों के चिथड़े, दस्ताने, खाद्य-सामग्री के डिब्बों के खोल, बोतलें और अलग-अलग तरह का दूसरा कूड़ा-कबाड़ कुछ पर्वतारोहियों की नादानी का ही विद्रूप प्रदर्शन लगता है। एवरेस्ट के लिए व्यावसायिक अभियानों और पर्वतारोहियों द्वारा फैलाए जा रहे कचरे से दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत की आबोहवा बिगड़ रही है। इस स्थिति को पर्यावरण-प्रेमी चिंताजनक बताते रहे हैं। शिखर पर पहुंचने के बाद तमाम पर्वतारोही वहां उपयोग की गई वस्तुओं का कचरा छोड़ तो आते हैं, लेकिन उनके निस्तारण की कोई अंतिम व्यवस्था नहीं हो पाई है। मानवीय हस्तक्षेप तथा बढ़ती आवाजाही से शिखर का नैसर्गिक सौंदर्य खतरे में पड़ता जा रहा है। समस्या यह भी है कि अत्यधिक ठंड और बैक्टीरिया के अभाव में यह कचरा वहां सड़ता नहीं है। इसलिए उसे नीचे लाकर नष्ट करना ही एकमात्र उपाय है, लेकिन यह काम कठिन और खर्चीला है, जिसे नेपाल सरकार कटिबद्ध होकर करना नहीं चाहती है।

हालांकि दावा किया जाता है कि नेपाल सरकार किसी भी छह सदस्यीय एक दल से चार हजार डॉलर इसकी साफ-सफाई के उद्देश्य से ही अग्रिम राशि के तौर पर सुरक्षित रखती है। यह समस्या बड़ी परेशानी इसलिए पैदा कर रही है, क्योंकि अब एवरेस्ट पर ऐसे नौसिखिए भी तकनीक और साधनों के बल पर चढ़ने का प्रयत्न करते हैं, जिनका दम शायद अपने बूते पर किसी छोटे पहाड़ पर चढ़ने पर ही फूल जाए। ऐसे अधिकतर पर्वतारोही नहीं जानते कि प्रकृति और पर्वतों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन्हें सिर्फ अपने सपने से लगाव है। प्रकृति की शुचिता का सवाल उनके जेहन में कभी नहीं कौंधता। इन चिंताओं से सर एडमंड हिलेरी और 1975 में पहली बार इस पर्वत को फतह करने वाली दुनिया की पहली महिला पर्वतारोही जापान की जंको ताबेई भी वाकिफ हैं। इसी कारण वे दोनों ही नेपाल सरकार को कुछ साल के लिए एवरेस्ट अभियानों पर पाबंदी लगाने की सलाह दे चुके हैं। हो सकता है कि यह बंदिश समस्या का सही इलाज न हो, लेकिन यह तो संभव है कि इस कदम से दुनिया में एवरेस्ट और समूचे पर्यावरण के प्रति हमारी लापरवाही प्रकट हो जाए और लोगबाग पर्यावरण की सार-संभाल को लेकर थोड़ा सचेत हों।

नई नहीं है समस्या

एवरेस्ट पर भीड़ जमा होने के नजारे नए नहीं हैं। असल में, पिछले कई वर्षों में वहां ऐसे ही हालात पैदा होते रहे हैं। वर्ष 2012 में भी एवरेस्ट के पर्वतारोहियों से अटे पड़े रास्तों की ऐसी ही एक तस्वीर जर्मनी के पर्वतारोही राल्फ दुज्मोवित्स ने सामने रखी थी। एवरेस्ट क्यों अचानक ऐसी भीड़भाड़ का शिकार हो गया है? इसकी कुछ खास वजहें हैं। इनमें पहला कारण यह है कि चीन के मुकाबले नेपाल के रास्ते एवरेस्ट की चढ़ाई आसान है। इसलिए दुनिया भर के पर्वतारोही नेपाल की तरफ से एवरेस्ट पर जाने को अहमियत देते रहे हैं। दूसरी खास वजह इससे नेपाल को होने वाली आय है। अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाने के लिए नेपाल आमतौर पर किसी भी पर्वतारोही को वहां जाने से रोकता नहीं है। हर साल जितने अधिक पर्वतारोही एवरेस्ट आरोहण के लिए नेपाल का रास्ता चुनते हैं, उतनी ही अधिक आय नेपाल को इसके लिए जारी किए जाने वाले परमिट और अन्य उपायों से होती है। इस साल मौसम की शुरुआत में नेपाल ने प्रति परमिट ग्यारह हजार अमेरिकी डॉलर के हिसाब तीन सौ इक्यासी परमिट जारी किए थे। इससे वहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी आधार मिलता है। शेरपा समुदाय के लोगों को हर पर्वतारोही के साथ सामान ढोकर एवरेस्ट पर जाने के बदले अच्छी आय हो जाती है। इसलिए एक ही शेरपा कई बार एवरेस्ट चढ़ता है। जैसे हाल में ही उनचास वर्षीय कामी रीता शेरपा ने 1994 के बाद से अब तक चौबीस बार एवरेस्ट पहुंचने का रिकॉर्ड बनाया है। एक तीसरी वजह भी है, जो एवरेस्ट पर लगने वाले जाम का मुख्य कारण बन गई है। असल में, मई के दूसरे-तीसरे हफ्ते में जब वहां चढ़ाई का मौसम शुरू होता है, तो जरूरी नहीं कि मौसम एकदम साफ और स्थितियां चढ़ाई के एकदम अनुकूल हों। इसके लिए पर्वतारोहियों को बेस कैंप में कई बार लंबा इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में जब किसी दिन हालात पूरी तरह अनुकूल हो जाते हैं, तो बेस कैंप में जमा सैकड़ों पर्वतारोही एक साथ एवरेस्ट को कूच कर देते हैं। उनकी कोशिश होती है कि वे जल्दी से जल्दी दुनिया के इस सर्वोच्च शिखर को छूकर लौट आएं। इसी क्रम में एवरेस्ट तक आने-जाने के रास्ते में भीड़ लग जाती है। लेकिन ये सारे कारण मिलकर अक्सर एवरेस्ट को मौत के मैदान में बदल डालते हैं।

एवरेस्ट का आकर्षण

ठीक है कि आज एवरेस्ट मनुष्य की मुठ्ठी में है। दरअसल, एवरेस्ट पर विजय या ऐसी ही दूसरी जीतें सही मायनों में निजी शौर्य और आत्मतुष्टि की प्रतीक हैं। ऐसा किए जाने से न सिर्फ मानव जाति के वास्तविक हितों की अनदेखी हो रही है, बल्कि व्यक्तिगत उपलब्धियों का व्यर्थ ही महिमा-मंडन भी हो रहा है। हम कह सकते हैं कि प्रकृति की यह परम ऊंचाई पराक्रम को प्रश्रय तो देती है, लेकिन यह समय उन एवरेस्टों के बारे में भी सोचने का है, जिन्हें शायद और बड़े पराक्रम की जरूरत है। तेनजिंग नोर्गे के पुत्र जामलिंग ने अपने पिता के एक बयान को एक जगह उद्धृत किया है कि ‘मैं पर्वत पर इसलिए चढ़ता हूं, ताकि मेरे बच्चों को कभी इस पर न चढ़ना पड़े।’ अपने बच्चों के अच्छे जीवन की लालसा में कहे गए इस वक्तव्य से साफ है कि मानव का असली लक्ष्य बेहतर जीवन की तलाश है। शायद, यह पूरी दुनिया भी जानती है कि आज आदमी को महज शौक पूरा करने के लिए हिलेरी स्टेप पर झंडा गाड़ने से ज्यादा उन मोर्चों को साधने की जरूरत है, जिससे दुनिया को सभी के लिए वाकई रहने लायक बनाया जा सके।

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