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संकट में कारीगर

हस्तशिल्प किसी भी देश की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। हस्तशिल्प के माध्यम से लाखों ऐसे लोगों को जीवन यापन का आधार मिलता है, जो पुश्तैनी तौर पर उनसे जुड़े होते हैं। मगर मशीनों के चलन और सरकारों की उदासीनता के चलते अनेक हस्तशिल्प सिकुड़ते या फिर खत्म हो गए हैं। बनारस में लकड़ी के खिलौने, पत्थर की नक्काशीदार वस्तुएं बनाने का उद्योग लगभग उजड़ गया है। इसी तरह ओड़ीशा का पत्थर पर नक्काशी और मूर्तियां आदि बनाने का कारोबार संकट में है। सहारनपुर में लकड़ी पर नक्काशी का उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े लोगों की स्थितियों पर बात कर रहे हैं सुरेंद्र सिंघल।

Author January 6, 2019 12:53 AM
बनारस में लकड़ी के खिलौनों और पत्थर की नक्काशीदार सजावटी वस्तुओं का बड़ा कारोबार होता था

एक समय था जब गांव-गांव में कारीगर अपने हाथों से मिट्टी के बरतन, खिलौने, सजावटी सामान बनाते थे। उसी तरह लकड़ी और पत्थर के उपकरण, खिलौने वगैरह बनाए जाते थे, जिससे अनेक लोगों के परिवार का गुजारा होता था। पर अब मशीन से बने प्लास्टिक आदि के सजावटी सामान, खिलौने वगैरह बाजार में आ जाने की वजह से हस्तशिल्प के ठिकाने सिमटते या फिर उजड़ते गए हैं।

बनारस में लकड़ी के खिलौनों और पत्थर की नक्काशीदार सजावटी वस्तुओं का बड़ा कारोबार होता था, पर वहां कारीगरों को उचित प्रोत्साहन और वस्तुओं की बिक्री का समुचित प्रबंध न होने के कारण वे कारोबार अब सिमट गए हैं। इसी तरह ओडीशा में बलुआ पत्थर पर नक्काशी करके सजावटी सामान बनाने, मूर्तियां वगैरह गढ़ने का काम सिमट गया है। कश्मीर कभी अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करके बनी वस्तुओं के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करता था, पर कुछ तो दहशतगर्दी और कुछ प्रोत्साहन न मिल पाने के कारण वहां का यह उद्योग अब काफी सिकुड़ गया है। नक्काशी का काम सिकुड़ने की एक बड़ी वजह यह भी है कि पहले जहां कारीगर हाथ से काम करते थे और एक चीज बनाने में कई दिन लग जाते थे, अब वही काम मशीनों के जरिए होने लगा है। इस तरह मशीनों से दिन भर में कई वस्तुएं बन जाती हैं। इससे लागत भी कम आती है और हाथ से बनी वस्तुओं की अपेक्षा उनकी कीमत कम होती है, उनमें सफाई और सुंदरता भी अधिक होती है, इसलिए खरीदार उनकी तरफ अधिक आकर्षित होते हैं। हाथ से नक्काशी करने वाले कारीगरों में हुनर चाहे जितना हो, पर इस तरह वे मशीनों के आगे मार खाते हैं।

यों, तमाम राज्य सरकारें अपने यहां के हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए योजनाएं चलाती रहती हैं, शिल्प मेलों के आयोजन होते हैं, कारीगरों को पुरस्कृत करने की योजनाएं भी हैं, पर इनसे उनकी दशा पर कोई सकारात्मक असर नहीं दिखता। हस्तशिल्प उद्योग पर गहराते संकट के पीछे बड़ा कारण प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का चलन है। प्लास्टिक की वस्तुएं हाथ से बनी लकड़ी, पत्थर आदि की वस्तुओं से काफी हल्की और सस्ती होती हैं, उन्हें सामान्य आयवर्ग का व्यक्ति भी खरीद और इस्तेमाल कर सकता है, इसलिए उनका चलन काफी तेजी से बढ़ा है। खासकर लकड़ी के खिलौना उद्योग को तो प्लास्टिक के खिलौनों ने लील ही लिया है। बनारस का लकड़ी खिलौना उद्योग बंद है। पहले रेलवे स्टेशनों पर बच्चों के खिलौने बेचते विक्रेताओं की बड़ी संख्या होती थी, पर अब कोई नहीं दिखता।

सहारनपुर की काष्ठकला: लकड़ी पर नक्काशी करके सजावटी सामान, फर्नीचर, खिलौने आदि बनाने का चलन देश के अनेक हिस्सों में था। मसलन, वाराणसी में लकड़ी के खिलौने बनाने का कारोबार बड़े पैमाने पर होता था, पर वह अब खत्म हो चुका है। उसी तरह सहारनपुर में लकड़ी पर नक्काशी करके फर्नीचर, सजावटी सामान बनाने का कारोबार सिकुड़ता गया है। सहारनपुर का विश्व प्रसिद्ध काष्ठ कला व्यवसाय गहरे संकट में है। डर है कि यहां के कुशल कारीगरों का हुनर कहीं इतिहास न बन कर रह जाए। दो सौ साल पुराना यह हस्तशिल्प व्यवसाय जहां देश के लिए अरबों की विदेशी मुद्रा का जरिया है, वहीं लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है। इसे संकट से उबारने और प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है। विश्व बाजार में चीन के उत्पादों की मांग बढ़ने से वहां भारतीय उत्पादों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

चीन में लकड़ी पर नक्काशी से लेकर सभी सामान बनाने में मशीनों का इस्तेमाल होता है, जिससे उन पर कम लागत आती है, जबकि सहारनपुर में कुशल कारीगर अपने हाथों से नक्काशी का काम करते हैं, जिसमें काफी वक्त लगता है और बनने वाले उत्पाद की लागत बढ़ जाती है। विश्वव्यापी मंदी और प्रोत्साहन के अभाव में सहारनपुर में यह कारोबार काफी सिकुड़ गया है। इससे यहां के हुनरमंद कारीगर या तो प्रदेश और देश के दूसरे स्थानों पर पलायन कर गए हैं या फिर मेहनत मजदूरी कर जिंदगी गुजार रहे हैं। पिछले करीब दस-बारह वर्षों से लकड़ी पर नक्काशी यानी वुड कार्विंग कारीगर तथा निर्यातक सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की सुनवाई भी शासन में नहीं हुई। इस कारण इस व्यवसाय पर संकट दिन प्रतिदिन गहराता चला गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने सहारनपुर के काष्ठ कला उद्योग को संकट से उबारने के लिए गंभीर प्रयास शुरू किए हैं। राज्य सरकार ने एक जनपद एक उत्पाद के रूप में सहारनपुर के वुड कार्विंग उद्योग को अंगीकार किया है। जिलाधिकारी सहारनपुर ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे स्वीकृत सभी उद्यमियों के ऋण प्रस्तावों पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई करें। जिलाधिकारी ने बताया कि उद्यमियों को प्रधानमंत्री रोजगार योजना, मुद्रा मार्जन मनी योजना, ऋण वितरण किया जाएगा और साथ ही कारीगरों के कौशल विकास, उपकरण वितरण पर ध्यान दिया जाएगा। उन्हें नई तकनीक और उत्पाद के विकास के बारे में जानकारी देने के लिए शिविर आयोजित किए जाएंगे। उद्यमियों और हस्त शिल्पियों की सफलता की कहानियों पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा। अमेजन, क्यूसीआई, एनएसई, बीएससी द्वारा हस्ताक्षरित समझौते से लाभान्वित उद्यमियों का प्रदर्शन किया जाएगा। दो शताब्दी पूर्व सहारनपुर नगर में लकड़ी पर नक्काशी के काम की नींव पड़ी। भारत में कश्मीर में अखरोट की लकड़ी पर सुंदर नक्काशी का काम काफी पहले होता था। वहीं से यह कला और व्यवसाय सहारनपुर आया था। लकड़ी पर मनमोहक नक्काशी का विचार ताजमहल के सफेद संगमरमर के पत्थरों पर उत्कीर्ण फूल-बूटों की नक्काशी से लिया गया है। संगमरमर की तुलना में लकड़ी पर नक्काशी का काम केवल कारीगरों की हुनरमंदी के कारण संभव हो सका है। वजह, लकड़ी में नमी होने और कीड़े-मकोड़ों द्वारा उसे भीतर से खोखला कर दिए जाने के कारण उस पर नक्काशी किया जाना संभव नहीं है। लेकिन सहारनपुर के कारीगरों ने अपने अद्भुत कौशल से लकड़ी में भी जान डालने का हुनर विकसित किया है, जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मानती है। इसी को बचाने की उत्तर प्रदेश सरकार की जद्दोजहद सामने आ रही है।

सहारनपुर मंडल की संयुक्त निदेशक उद्योग कल्पना श्रीवास्तव कहती हैं कि संकट में फंसे सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी का कारोबार को नई संजीवनी देने के लिए नए उद्यमियों को पच्चीस प्रतिशत मार्जिन मनी देने का निर्णय राज्य सरकार की ओर से किया गया है। दो करोड़ रुपए तक के कर्ज लेने वाले को बीस लाख रुपए तक की छूट दी जाएगी। कल्पना श्रीवास्तव कहती हैं कि वुड कार्विंग मानव इतिहास की सबसे प्राचीन कला है। सहारनपुर में बने लकड़ी के फर्नीचर पर नक्काशी देखकर कोई भी व्यक्ति दंग रह जाता है। यहां के कुशल कारीगर लकड़ी को बिना रंग-पॉलिस के जला-जला कर लकड़ी को एंटिक का लुक देने की कला में माहिर हैं। एक तरह से यह व्यवसाय कुटीर उद्योग है। सहारनपुर में बावन बड़े निर्यातक हैं और करीब दो सौ बड़े कारखानेदार हैं। सात से आठ हजार छोटे कारखाने हैं। सहारनपुर में चार लाख के करीब कारीगर हैं। लकड़ी और पैकिंग का सामान महंगा होने, कारीगरों की मजदूरी बढ़ जाने से निर्माता और निर्यातक खासे परेशान हैं। कल्पना श्रीवास्तव के मुताबिक सहारनपुर का निर्यात अनुमानित पंद्रह सौ करोड़ रुपए का है। उनके मुताबिक राज्य सरकार पचास-साठ हजार नए लोगों को रोजगार के नए अवसर प्रदान करने का लक्ष्य बना कर आगे बढ़ रही है। इससे सहारनपुर के कुशल कारीगरों का पलायन रुकेगा। सहारनपुर नगर में कुल कंबोहान से लेकर चिलकाना रोड तक दो किलोमीटर लंबा बाजार है, जहां की दुकानों में आम, शीशम, बबूल और टीक की लकड़ियों पर सुंदर नक्काशी से सजी वस्तुओं, फर्नीचर आदि एंटिक काष्ठ कला-मेज, कुर्सियां, लैंप, लकड़ी के डिब्बे, फूलदान, शीशम की लकड़ी के नक्काशीदार पर्दे, लकड़ी के बने मंदिरों की कलाकृतियां, उपहार तथा सजावटी वस्तुएं आदि लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। हस्तशिल्प निर्यात प्रोत्साहन संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) के अधिशासी निदेशक राकेश कुमार कहते हैं कि उनकी संस्था सहारनपुर के उत्पादों की गुणवत्ता और डिजाइन में विश्व बाजार की मांग के अनुरूप सुधार करने के उपाय कर रही है। उत्पादों की निर्माण तकनीक, प्रस्तुतीकरण, हस्तशिल्प वस्तुओं की पैकेजिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है। राकेश कुमार बताते हैं कि लकड़ी की नक्काशी में श्रमशक्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसे ध्यान में रखते हुए कॉमन फेसिलिटी सेंटर में मशीनों को जॉइनरी और लेजर नक्काशी के लिए विकसित किया जा रहा है। परिषद कारीगरों के कल्याण के लिए कारीगर ट्रस्ट की स्थापना करेगी, जो उनके और उनके परिवार के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य कल्याणकारी सुविधाओं का ध्यान रखेगी।

मुफलिसी के दिन: सहारनपुर के लाखों दस्तकारों का जीवन काष्ठ कला व्यवसाय पर टिका हुआ है। एक-एक कारीगर को एक-एक सामान बनाने में कई-कई दिन लग जाते हैं। इस तरह यहां के श्रमिकों का आधे से ज्यादा हिस्सा मुफलिसी में ही गुजर जाता है। दरिद्रता और दुश्वारियों के चलते उनकी पीड़ा की सहज अभिव्यक्ति भी नहीं हो पाती है। सहारनपुर के प्रमुख एक्सपोर्टर असलम सैफी का कहना है कि कंटेनर पर लगाए गए कस्टम शुल्क को हटाया जाए और बिजली की दरों को कम किया जाए। लकड़ी के फर्नीचर पर से जीएसटी समाप्त की जाए। सहारनपुर के कमिश्नर चंद्रप्रकाश त्रिपाठी कहते हैं कि भारतीय हस्तशिल्प अतिसुंंदर कलात्मक कारीगरी परंपराओं एवं रंग सामग्री, आकार और रूपांकनों की समृद्ध विविधता के रूप में हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रदर्शन की वजह से प्राचीनकाल से विश्व प्रसिद्ध है।

सेहत से खिलवाड़: लकड़ी और पत्थर पर नक्काशी करने वाले कारीगरों को हमेशा गर्द का सामना करना पड़ता है। यह गर्द उनके फेफड़ों को प्रभावित करती है, जिससे दमा जैसी परेसानियां उन्हें असमय घेर लेती हैं। पत्थर से उड़ने वाली गर्द से कारीगरों को अक्सर सिल्कोसिस जैसी जानलेवा बीमारियां हो जाती हैं। मशीन से पत्थर या लकड़ी की कटाई-घिसाई करने पर गर्द अधिक उड़ती है, इसलिए हाथ से काम करने वाले कारीगरों की अपेक्षा मशीन से काम करने वाले शिल्पियों को इस तरह के खतरे अधिक उठाने पड़ते हैं। यों लकड़ी और पत्थर के सामान का कारोबार करने वाले अनेक लोग कारखाने चलाते हैं, जहां कारीगरों को रख कर काम कराते हैं। वे अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल भी करते हैं। पर गर्द वगैरह से मुक्ति के लिए उपकरणों के उपयोग के मामले में वे प्राय: उदासीन ही रहते हैं। कायदे से ऐसे कारखानों में गर्द वगैरह अवशोषित करने वाले उपकरण लगाना अनिवार्य होता है, पर पैसा बचाने के लिए कारखाना मालिक ऐसी मशीनें नहीं लगाते। जो कारीगर निजी तौर पर काम करते हैं, उनके लिए औजार खरीदना ही कठिन होता है, गर्द सोखने वाली मशीनें लगाना तो दूर की बात है। इसलिए सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे हस्तशिल्पियों की सेहत को ध्यान में रखते हुए उपकरणों आदि पर छूट, कर्ज आदि उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य बीमा आदि पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

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