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रविवारीः रामलीला कितने रंग कितने रूप

शारदीय नवरात्र के समय देश भर में रामलीला खेलने की परंपरा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में रामलीला के अलग-अलग रूप, अलग-अलग रंग हैं। कहीं इसके संवाद शास्त्रीय रागों में पिरो कर प्रस्तुत किए जाते हैं, तो कहीं उर्दू गजलों की शक्ल में। रामलीला का अपना इतिहास है। मुगलकाल से चली आ रही रामलीला के संवादों में अरबी, फारसी शब्दों की बहुतायत होती है। नृत्य की विभिन्न शैलियों में भी रामलीला खेलने की परंपरा है। कई जगह रामलीला सिर्फ शारदीय नवरात्र में नहीं, दूसरे मौसमों में भी खेली जाती है। दुनिया के पैंसठ देशों में रामलीला का मंचन होता है और हर किसी का रंग-रूप, मिजाज अलग है। रामलीला की विविधता पर रोचक जानकारी दे रहे हैं रघुवीर सिंह।

Author October 14, 2018 6:10 AM
संस्कृत की रामायण और अवधी के रामचरितमानस के बाद ‘राम की लीला’ न जाने कितनी भाषाओं में लिपिबद्ध हुई, अनूदित हुई।

रघुवीर सिंह

विविधताओं से भरे अपने देश में रामलीलाओं में भी विविधता है। हरियाणा के फरीदाबाद में राम, सीता और रावण उर्दू के अल्फाज में बात करते हैं, तो उत्तराखंड की पौड़ी रामलीला के पात्र अपनी बात राग भैरवी, मालकौंस, जयजयवंती, दरबारी, बिहाग में पिरो कर कहते हैं। रुद्रप्रयाग में तो महिलाएं रामलीला खेलती हैं। महिला सशक्तीकरण को धार देती यह देश की पहली महिला रामलीला बन गई है। गुरुग्राम के पटौदी कस्बे में अभिनेता सैफ अली खान के पूर्वजों ने रामलीला का मंचन रात की जगह दिन में कराने की परंपरा डाली, जो आज तक ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के मजबूत गठबंधन को बयां करती है, तो श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में भी इंडोनेशिया के मुसलिम कलाकार रामलीला का मंचन कर इस एकता को अटूट बना चुके हैं। उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड में रामलीला के संवाद राधेश्याम रामायण के पदों पर बोले जाते हैं। अध्येताओं की मानें तो तकरीबन सौ प्रकार की रामलीलाएं अपने देश में होती हैं और रामलीला पैंसठ देशों की यात्रा कर चुकी है। तभी तो मशहूर शायर अल्लामा इकबाल ने श्रीराम के लिए यह शेर लिखा था- ‘है राम के वजूद पे हिंदोस्तान को नाज, अहल-ए-नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिंद।’

रामायण की असली कहानी तो संस्कृत में लिखी गई, लेकिन समय के साथ उसकी जुबान बदलती रही। संस्कृत की रामायण और अवधी के रामचरितमानस के बाद ‘राम की लीला’ न जाने कितनी भाषाओं में लिपिबद्ध हुई, अनूदित हुई। क्षेत्र और जुबान बदली, तो रामलीला मंचन के संवाद भी बदलते गए। मौजूदा पाकिस्तान के पंजाब में कभी रामलीला प्रेमियों ने खालिस उर्दू की शेरो-शायरी में इसका मंचन शुरू किया था। देवनागरी लिपि में बाकायदा उर्दू अल्फाज में रामायण की पटकथा तैयार की थी। विभाजन की त्रासदी में लाखों लोग इधर से उधर हुए। लोगों के घर-बार छूट गए, मगर उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं छोड़ा। भारत आए हिंदुओं को दिल्ली से सटे फरीदाबाद और पलवल में बसाया गया, जिनके साथ यह उर्दू रामलीला यहां आई। पाकिस्तान के डेरा गाजी खान और खैबर-पख्तूनख्वा के लखीराम, टेकचंद और जेठाराम उर्दू रामलीला की यह पटकथा अपने साथ भारत लाए, तो कोहाट और डेरा इस्माइल खान से आई स्क्रिप्ट में शेरो-शायरी की अधिकता रही- ‘हो न अंधे इस कदर इस मोह के जंजाल में, इक दिन आना पड़ेगा काल के गाल में, इस रुखे ताबा पे होगी मुर्दनी छाई हुई, तेरी शान होगी वक्त की ठोकर से ठुकराई हुई।’

रामलीला का दृश्य

इस उर्दू रामलीला में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, परशुराम, रावण, अंगद- सभी शेरो-शायरी में अपनी बात रखते हैं। उनके संवाद में लख्ते-जिगर, संगदिल, कायरपन, बुजदिली, शुमार, जुमले, जुल्म, हलक, आबरू, नुमाइश, मुतास्सिर, जौहर, बेहूदा अल्फाज, अफसोस, तिलमिलाना, गुस्ताख, नाहक, दुहाई, गुनाहगार, गैरमौजूदगी, आइंदा, लगाम, गुफ्तगू, पैगाम, कत्लेआम जैसे शब्द सुनने को मिलेंगे। हालांकि समय-समय पर जरूरत के हिसाब से इसमें बदलाव भी किया गया है और संवाद में राधेश्याम तथा जसवंत सिंह टोहानवी की लिखी रामायण के अंश भी डाले गए हैं। मुश्किल उर्दू की जगह अब आसान जुबान ने लेनी शुरू कर दी है, लेकिन पूरी तरह नहीं, आधार वही है- ‘मौत का तालिब हूं मैं, मेरी लबों पे जान है, दो घड़ी का यह मुसाफिर आपका मेहमान है।’

नई पीढ़ी बेशक उर्दू लिखना और पढ़ना नहीं जानती, लेकिन आयोजकों का युवाओं को उर्दू और संस्कृत की शिक्षा दिलाने का विचार इस समस्या का समाधान लगता है। उर्दू की इन रामलीलाओं में से कुछ के मंच से अवधी चौपाइयों के संग हिंदी-उर्दू संवाद सुनाई देते हैं, तो कुछ के मंचन से पहले कव्वाली होती है। कुछ उर्दू रामलीलाओं में अब महिला कलाकार अपनी कला दिखाने लगी हैं, मसलन- रिद्धि सीता का किरदार निभाती हैं, तो रिया तारा का। सोनिया खरबंदा सुमित्रा और अरविन कौर कौशल्या के किरदार से लोगों को त्रेता युग में ले जाती हैं। कुछ उर्दू रामलीला तो फेसबुक और यूट्यूब पर ऑनलाइन भी देखी जा सकती हैं। ऐसे समय में जब भाषाओं को लेकर लोग लड़-झगड़ रहे हैं, उर्दू अल्फाज से भरी ये रामलीलाएं गंगा-जमुनी तहजीब का बेमिसाल उदाहरण पेश करती हैं। सुखद यह है कि नई पीढ़ी ही इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

वैसे उर्दू की रामलीला मुगलकाल में ही लिखी जा चुकी थी। अरबी में लिखी मुगलकालीन रामायण पहले ही मिल चुकी थी, फरवरी 2015 में छत्तीसगढ़ के कोरबा में आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम को वाल्मीकि रामायण से मिलती उर्दू रामलीला भी रतनपुर के वैष्णव घराने से मिली। उर्दू की यह मुगलकालीन रामलीला एनटीपीसी के विधि अधिकारी अर्जुनदास महंत ने म्यूजियम को दी, जिसे उनके पिता रामानुजदास वैष्णव ने उन्हें दिया था। तकरीबन पांच सौ पेज की इस किताब के शुरू और आखिर के पन्नों समेत कवर और पेज नंबर 38 और 494 तो गायब हैं, लेकिन पेज नंबर 272 पर लिखी गाथाओं में वाल्मीकि प्रसंग से जुड़े कई दोहे उर्दू अल्फाज में लिखे हैं, जिनमें रानी कैकेयी की खूबसूरती को कश्मीर के समान बताया गया है। इसमें श्रीराम के वक्त का शृंगार, राम-भरत मिलाप, राम-रावण महासंग्राम और लंका विजय के बाद विभीषण के राज्याभिषेक के प्रसंग भी लिखे हैं।

राम-सीता के रूप में कलाकार

किताब में लिखे कथानक बहुत ही रोचक हैं और रामलीला के मंचन में कलाकारों की भूमिका और दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए इसकी रचना की गई है। उर्दू साहित्यकार मुहम्मद यूनुस बताते हैं, ‘किताब में लिखी लाइनों के साथ तस्वीरों को बारीकी से देखकर लगता है कि यह लाहौर या पुरानी दिल्ली में छपी होगी, क्योंकि ऐसी छपाई उस दौर में भारत के इन्हीं दो शहरों में होती थी।’ किसी मुगलकालीन कवि ने इसमें संस्कृत और उर्दू में लिखा है कि इस रामलीला से जाति-धर्म के लिए लड़ने वालों को प्रेरणा लेनी चाहिए।

अभिनेता सैफ अली खान के पूर्वज मुहम्मद मुमताज अली खान उर्फ मुट्टन मियां ने यही प्रेरणा ली। गुरुग्राम के पटौदी कस्बे में 1902 में उन्होंने दिन की रामलीला शुरू कराई, जिसका मंचन आज भी दोपहर तीन से शाम छह बजे तक होता है। दिन की यह रामलीला हिंदू-मुसलिम एकता का नायाब नमूना है। वैसे राम की जन्मभूमि अयोध्या के साथ लखनऊ में पहली बार इंडोनेशिया के मुसलिम कलाकारों ने भी रामलीला का मंचन कर दोनों मजहबों की एकता को अटूट बनाया है। लगभग तेरह दुर्लभ वाद्य यंत्रों के साथ छह पुरुष तथा छह महिला कलाकारों ने रामलीला की शुरुआत सीता हरण से की और रावण वध पर समापन किया। इंडोनेशिया में बहुसंख्यक मुसलिमों की रामलीला में बहुत आस्था है। भारत में ऋषि वाल्मीकि की रामायण, तो इंडोनेशिया में कवि योगेश्वर की लिखी रामायण का मंचन होता है। वहां दशरथ को विश्वरंजन, सीता को सिंता और हनुमान को अनोमान कहा जाता है।

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में पहली बार महिलाओं ने रामलीला खेली और देश की पहली महिला रामलीला का हिस्सा बन गई। पुरुषवादी वर्चस्व को तोड़ते हुए अगस्त्य मुनि में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान से लेकर रावण और मेघनाद तक, सभी किरदार महिला कलाकारों ने निभा डाले। रिहर्सल से लेकर निर्देशन और मंच निर्माण तक की जिम्मेदारी मंडली की बीस से अधिक महिलाओं ने संभाली, जिसमें बहत्तर साल की सावित्री तंगवाण भी शामिल रहीं। विलोचना देवी ने राम की मर्यादा सामने रखी, तो आरती गुसाई ने सीता की। बीरा फर्स्वाण ने लक्ष्मण के भ्रातृ प्रेम और लक्ष्मी रावत ने रावण के अहंकार को जिया। शत्रुघ्न बनी तेरह वर्षीय अदिति रौथाण और गणेश बनी महज दस साल की दीया राणा के अभिनय ने तो रामलीला की महफिल ही लूट ली।

हालांकि महिलाओं का किरदार तो महिलाएं पौड़ी की एक सौ बारह साल पुरानी ऐतिहासिक रामलीला में पहले से निभाने लगी थीं, लेकिन पुरुषों की भूमिका भी महिला कलाकारों ने अगस्त्य मुनि में ही पहली बार निभाई। पौड़ी रामलीला में सीता, कौशल्या, मंदोदरी, सूर्पणखा, पार्वती, अहिल्या आदि किरदारों को निभाने वाली युवतियों को विशेषज्ञ रंगकर्मी दो माह तक गायन और नृत्य का प्रशिक्षण देते हैं। बाल किरदारों के लिए विशेषज्ञ बाल कलाकारों को तैयार किया जाता है। दरअसल, पौड़ी की रामलीला के राम, सीता, लक्ष्मण, रावण आदि पात्र अपनी बात राग भैरवी, मालकौंस, जयजयवंती, दरबारी, बिहाग के सुरों में कहते हैं। लोकगीत और संगीत भी इसमें शामिल रहता है। इसी खासियत की वजह से पौड़ी की रामलीला को दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय में भी जगह मिली।

वैसे लोक और धर्म से जुड़ी कुमाऊं अंचल की रामलीला गीत-नाट्य शैली प्रधान ही रही है। 1940-41 के दौरान अल्मोड़ा में नृत्य सम्राट पंडित उदयशंकर ने भी रामलीला का मंचन किया था, जिसमें उन्होंने छाया चित्रों के माध्यम से नवीनता लाने का प्रयास किया। इससे छाया चित्रों, अभिनय, उत्कृष्ट संगीत और नृत्य की छाप अल्मोड़ा की रामलीला पर पड़ी। कुमाऊंनी रामलीला में संवाद, धुन, लय, ताल और सुरों में पारसी थिएटर की छाप भी साफ दिखाई देती है, तो ब्रज के लोकगीतों तथा नौटंकी की मिली-जुली झलक भी मिलती है। संवाद में आकर्षण और प्रभाव लाने के लिए कहीं-कहीं नेपाली भाषा और उर्दू की गजल का प्रयोग भी किया जाता है और रामलीला के गायन संवाद राग-रागिनियों के स्वरों में बंधे होते हैं। इसमें पंडित राधेश्याम कथावाचक की रामायण गान शैली समावेशित है, जिससे हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमकती गूंज में अभिनय करते पात्रों का गायन मन को मोह लेता है। दरअसल, कुमाऊं की रामलीला में अभिनय की अपेक्षा गायन को अधिक महत्व दिया जाता है। कुमाऊंनी रामलीला के शोध अध्येता डॉ. मथुरादत्त जोशी के अनुसार कुमाऊं की रामलीला में अभिनय आंगिक, वाचिक, सात्विक एवं आहार्य होता है।

पैंसठ देशों में होती है रामलीला

रामलीला दुनिया के पैंसठ देशों में पहुंच चुकी है। इतिहास बताता है कि रामायण का इंडोनेशियाई संस्करण सातवीं सदी में मध्य जावा में लिखा गया था। तब वहां मेदांग राजवंश का शासन था। वैसे रामायण के इंडोनेशिया पहुंचने से बहुत पहले रामायण में इंडोनेशिया का उल्लेख मिलता है। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में वर्णन है कि कपिराज सुग्रीव ने सीता की खोज में दूतों को पूर्व दिशा में यवद्वीप और सुवर्णद्वीप भी भेजा था। इतिहासकारों के मुताबिक यही आज के जावा और सुमात्रा हैं। एशिया में रामलीला को दो वर्गों में बांटा जा सकता है- मुखौटा रामलीला और छाया रामलीला। मुखौटा रामलीला के अंतर्गत इंडोनेशिया और मलेशिया में ‘लाखोन’ के माध्यम से रामायण के अनेक प्रसंगों को मंचित किया जाता है। इंडोनेशिया में तीन तरह की रामलीला होती है- पपेट, शैडो पपेट और बैले। कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ‘ल्खोनखोल’ के जरिए होता है। ‘ल्खोन’ इंडोनेशियाई मूल का शब्द है, जिसका अर्थ है- नाटक। कंपूचिया की भाषा खमेर में ‘खोल’ का अर्थ बंदर होता है। अत: ‘ल्खोनखोल’ को बंदरों का नाटक या हास्य नाटक कहा जा सकता है। ‘ल्खोनखोल’ वस्तुत: एक प्रकार का नृत्य नाटक है, जिसमें कलाकार विभिन्न तरह के मुखौटे लगा कर अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।

कंपूचिया के राजभवन में रामायण के प्रमुख प्रसंगों का अभिनय होता था। थाईलैंड में मुखौटा रामलीला को ‘खौन’ कहा जाता है। इसमें संवाद के अतिरिक्त नृत्य, गीत एवं हाव-भाव प्रदर्शन की प्रधानता रहती है। मुखौटा केवल दानव और बंदर-भालू की भूमिका निभाने वाले अभिनेता लगाते हैं। बर्मा की मुखौटा रामलीला को ‘यामप्वे’ कहा जाता है। बर्मा के राजा ने 1767 में स्याम (थाईलैंड) पर आक्रमण किया, तो विजेता सम्राट अन्य बहुमूल्य सामग्री के साथ रामलीला कलाकारों को भी बर्मा ले गया। ऐसे में वहां की रामलीला के गीत, वाद्य और नृत्य पर स्यामी प्रभाव होना लाजिमी था, मगर अब यह पूरी तरह बर्मा के रंग में डूब चुकी है।

दूसरी ओर विविधता और विचित्रता के कारण छाया रामलीला मुखौटा रामलीला से भी निराली है। इसमें जावा और मलेशिया के ‘वेयांग’ तथा थाईलैंड के ‘नंग’ बेहद खास हैं। जापानी भाषा में ‘वेयांग’ का अर्थ है- छाया, जो अंग्रेजी में ‘शैडोप्ले’ और हिंदी में ‘छाया नाटक’ कहलाता है। इसके अंतर्गत सफेद पर्दे को प्रकाशित किया जाता है और उसके सामने चमड़े की पुतलियों को इस प्रकार नचाया जाता है कि उनकी छाया पर्दे पर पड़े। छाया नाटक के माध्यम से रामलीला का प्रदर्शन पहले तिब्बत और मंगोलिया में भी होता था। थाईलैंड में छाया रामलीला को ‘नंग’ कहते हैं, जिसके दो रूप हैं- ‘नंगयाई’ और ‘नंगतुलुंग’। नंग का अर्थ है- चर्म या चमड़ा और याई का अर्थ है- बड़ा। इस प्रकार ‘नंगयाई’ का तात्पर्य चमड़े की बड़ी पुतलियों से है। ‘नंगतुलुंग’ की चर्म पुतलियां नंगयाई की अपेक्षा बहुत छोटी होती हैं। इसके माध्यम से थाई रामायण ‘रामकियेन’ का प्रदर्शन होता है। थाईलैंड के नंगतुलुंग और जावा तथा मलेशिया के ‘वेयांग कुलित’ में बहुत समानता है। वेयांग का मुख्य कलाकार ‘दालांग’ गाता भी है और बाजे की ध्वनि पर पुतलियों को नचाता भी है। इसमें 148 पुतलियां होती हैं, जिनमें सेमार का स्थान सबसे ऊंचा है। वेयांग का संबंध केवल मनोरंजन ही नहीं, आध्यात्मिक साधना से भी है।

वृंदावन के कलाकार खेलते हैं रामलीला

वैसे तो ज्यादातर रामलीला का मंचन शारदीय नवरात्र में होता है, लेकिन जाड़े या खेती के काम की अधिकता के कारण कहीं-कहीं यह गरमी के दिनों में और दीपावली के आसपास भी किया जाता है। रुहेलखंड के बरेली में तो होली पर रामलीला का आयोजन होता है, जिसके संवाद राधेश्याम रामायण से निकलते हैं। दूसरी ओर कान्हा की नगरी वृंदावन के कलाकार भी रामलीला में निपुण हैं, जहां के स्वामी भरतशरण की इकतीस सदस्यीय मंडली रामलीला का मंचन करती है।

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