ताज़ा खबर
 

रविवारी: महामारी के बीच महात्मा की सीख

23 जून, 1946 को ‘हरिजन’ में छपे एक आलेख में वे कहते हैं, ‘ग्रामीण रक्त ही वह सीमेंट है, जिससे शहरों की इमारतें बनती हैं।’ औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन के जिस अंबार और उसके असीमित अनुभव के लिए हमें प्रेरित किया, उसकी पूरी बुनियाद मजदूरों का शोषण पर टिकी थी। दिलचस्प है कि ज्यादा उत्पादन और असीमित उपभोग को जहां आगे चलकर विकास का पैमाना माना गया, वहीं प्राकृतिक संपदा के निर्मम दोहन को लेकर सबने एक तरफ से आंखें मूंदनी शुरू कर दी।

Author Published on: March 29, 2020 4:53 AM
आर्थिक शोषण पर महात्मा गांधी ने बहुत पहले ही दुनिया को चेताया था, लेकिन तब लोगों ने उसे समझा नहीं।

महात्मा गांधी जब दुनिया को सत्य, अहिंसा और प्रेम का सबक सिखा रहे थे तो वे कहीं न कहीं अपने दौर से आगे की चुनौतियों को भी बखूबी समझ रहे थे। उनके विचार और कार्यक्रमों में उन तमाम चिंताओं और समस्याओं का वैकल्पिक समाधान है, जिस पर आज दुनिया के तमाम देश अलग-अलग स्वर में बात कर रहे हैं। इन समस्याओं में सबसे अहम दो मुद्दे हैं- पर्यावरण और विकास के बीच का संतुलन और अर्थव्यवस्था से जुड़े अहिंसक तकाजे। ये मुद्दे और तकाजे उस गांधी ने हमारे सामने रखे हैं जिन्होंने अपने समय में न सिर्फ जंग की झुलस के बीच मानवता की कराह सुनी थी, बल्कि अकाल और स्पेनिश बुखार जैसी स्थितियों में देश की बड़ी आबादी को मौत की नींद सोते देखा था।

कोरोना संकट के बाद दुनिया जैसी और जिस रूप में भी बचेगी, उसके लिए अर्थव्यवस्था और विकास की आपाधापी के साथ पर्यावरण के साथ मानवीय रिश्ते को नए सिरे से समझने की बड़ी चुनौती होगी। गौरतलब है कि औद्योगिक क्रांति से लेकर वैश्वीकरण तक दुनिया अगर कहीं एक सीध में बढ़ती दिखाई देती है तो वह सीध है मशीनीकरण और शहरीकरण की। कोरोना संकट के बीच आज उन शहरों की राशन-पानी की पूरी व्यवस्था सबसे ज्यादा चरमरा रही है, जिन्होंने अनजाने ही परावलंबन की मोहताजी को अपने ड्राइंग रूम और रसोई तक आमंत्रित कर लिया।

1914 में अपने भारत आगमन पर गांधी ने अपने आप को तत्काल गांवों की सामाजिक व आर्थिक स्थितियों का प्रत्यक्ष परिचय पाने में लगा दिया। ‘यंग इंडिया’ में 20 दिसंबर, 1928 को वे लिखते हैं, ‘ईश्वर न करे कि भारत भी कभी पश्चिमी देशों के ढंग का औद्योगिक देश बने। एक अकेले इतने छोटे से द्वीप (इंग्लैंड) का आर्थिक साम्राज्यवाद ही आज संसार को गुलाम बनाए हुए है। 30 करोड़ आबादी वाला हमारा राष्ट्र भी अगर इसी प्रकार के आर्थिक शोषण में जुट गया तो वह सारे संसार पर एक टिड्डी दल की भांति छाकर उसे तबाह कर देगा।’

गांधी अपनी इस पूरी समझ में गांव और गरीब के हक में इस लिहाज से भी खड़े दिखाई देते हैं कि वे हमेशा गांवों की रचनात्मक ताकत को रेखांकित करते हैं और इसे ही भविष्य के भारत की ताकत बनाना चाहते हैं।

23 जून, 1946 को ‘हरिजन’ में छपे एक आलेख में वे कहते हैं, ‘ग्रामीण रक्त ही वह सीमेंट है, जिससे शहरों की इमारतें बनती हैं।’ औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन के जिस अंबार और उसके असीमित अनुभव के लिए हमें प्रेरित किया, उसकी पूरी बुनियाद मजदूरों का शोषण पर टिकी थी। दिलचस्प है कि ज्यादा उत्पादन और असीमित उपभोग को जहां आगे चलकर विकास का पैमाना माना गया, वहीं प्राकृतिक संपदा के निर्मम दोहन को लेकर सबने एक तरफ से आंखें मूंदनी शुरू कर दी। कार्ल मार्क्स ने उत्पादन-उपभोग की इस होड़ में मजदूरों के शोषण को तो देखा, लेकिन मनुष्येतर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को, मशीनीकरण की आंधी से उजड़ते यूरोप को वे नहीं देख सके। इसे अगर किसी ने देखा तो वे थे गांधी। गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में साफ शब्दों में कहा, ‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली, तो हिंदुस्तान की बुरी दशा होगी।’

गांधीवादी अर्थ दृष्टि को तार्किक आधार देने वाले डॉ. जेसी कुमारप्पा ने मशीनीकरण के जोर पर बढ़े शोषण की जगह सहयोग और उपभोग की जगह जरूरी आवश्यकता को मनुष्य के विकास और कल्याण की सबसे बड़ी कसौटी माना। सहयोग और आवश्यकता की इस कसौटी से स्वावलंबी आर्थिक स्थायित्व को तो पाया ही जा सकता है, प्राकृतिक असंतुलन जैसे खतरे से भी बचा जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि विकास को होड़ की जगह सहयोग के रूप में देखने वाली गांधीवादी दृष्टि विकास और जीवन मूल्यों को अलगाकर नहीं बल्कि साथ-साथ देखती है।

जेसी कुमारप्पा अपनी किताब ‘द इकोनमी आफ परमानेंस’ के पहले अध्याय में ही इस मिथ को तोड़ते हैं कि अर्थ और विकास कभी स्थायी हो ही नहीं सकते। औद्योगिक क्रांति से लेकर उदारीकरण तक का अब तक हमारा अनुभव यही सिखाता रहा है कि विकास की दरकार और उसके मानदंड बदलते रहते हैं। इसी लिहाज से सरकार और समाज भी अर्थ और विकास को लेकर अपनी प्राथमकिताओं में हेरफेर भी करते रहते हैं। पर इस बदलाव का अंतिम लक्ष्य क्या है, इसको लेकर कोई गंभीर सोच कभी सामने नहीं उभरी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories
1 रविवारी: लोक, परंपरा और कोरोना
2 रविवारी: हारेगी नहीं करुणा
3 रविवारी कहानी: कंजूस मक्खीचूस