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विचार बोध: कर्म, दुख और बुद्ध

बौद्ध दर्शन मान्यताओं या धारणाओं के बजाय तर्क और विवेक को केंद्र में रखकर विचार करता है इसलिए इस दर्शन के अनुसार सृष्टि का कारण ईश्वर को नहीं माना गया है। दिलचस्प है कि यदि ईश्वर को सृष्टिकर्ता मान लिया जाए तो उसे दुख का कारण और जनक भी मानना होगा।

Author Updated: October 11, 2020 1:28 AM
महात्मा बुद्ध के साथ ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में तार्किक ज्ञानमार्ग का सूत्रपात हुआ।

रोहित कुमार

ज्ञान के दार्शनिक संदर्भ को लेकर आज भी खूब चर्चा होती है। यह संदर्भ एक तरफ जहां पौराणिकता से जुड़ता है, वहीं आधुनिक दर्शन के केंद्र में भी ज्ञान की ही चर्चा है। ज्ञान के मर्म और दर्शन के लिहाज से जो एक नाम काफी महत्त्वपूर्ण है, वह है गौतम बुद्ध। बुद्ध के साथ ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में तार्किक ज्ञानमार्ग का सूत्रपात होता है। उनका जन्म एक राज परिवार में हुआ था। वे युवावस्था में ही सत्य के संधान की ओर अभिमुख हो गए। राजसी भोग-विलास जब उनकी जिज्ञासा को शांत न कर सका तो अपने पिता द्वारा निर्मित मायावी मोहपाश को तोड़कर एक रात उन्होंने गृहत्याग कर संन्यास का मार्ग अपना लिया।

अगले छह वर्ष सिद्धार्थ ने ज्ञानप्राप्ति के लिए गहन तपस्या में गुजारे। इस दौरान अन्नत्याग के कारण उनकी शारीरिक अशक्तता इतनी बढ़ गई कि एक दिन जब वे निरंजना नदी को पार कर रहे थे तो लड़खड़ा कर गिर पड़े। इस घटना से उनके भीतर पहली बार एक आत्मप्रज्ञा जगी। उन्होंने खुद से सवाल किया कि देह को नष्ट करने या उसे कष्ट देने से क्या मुक्ति मिलेगी। स्वाभाविक तौर पर उनके अंदर से जो आवाज गूंजी वह नकार से भरी थी।

इसके बाद उन्होंने कठिन तपश्चर्या का प्रण छोड़ दिया और निरंजना नदी के तट पर ही वटवृक्ष के नीचे समाधिस्थ हो गए। समाधि के 49वें दिन पूर्णिमा की रात में उन्होंने वह सब कुछ हासिल कर लिया, जिसके बाद कुछ और पाना शेष नहीं रहता। उनके भीतर एक नई प्रज्ञा दृष्टि जगी, एक नई आत्मचेतना का संचार हुआ।

इस तरह सिद्धार्थ बुद्धत्व को प्राप्त करने में सफल हुए। बुद्धत्व की उपलब्धि के साथ तथागत को सांसारिक दुखों के कारण का सम्यक बोध हो गया। इस बोध को बुद्ध ने सारनाथ में अपने प्रथम उपदेश में साफ किया।

बौद्ध दर्शन में सृष्टि का विश्लेषण कारणवाद के आधार पर किया गया है, जिसमें विवेकाश्रित तर्क को अहमियत दी गई है। इस व्यवस्था में दैवीय हस्तक्षेप को कोई स्थान नहीं दिया गया है। यह वैदिक धारणाओं, मान्यताओं और काफी हद तक व्याख्याओं से भी सीधे मुठभेड़ की स्थिति थी। अलबत्ता, यह दर्शन ईश्वरीय सत्ता के निषेध से ज्यादा इस सिद्धांत पर बल देता है कि सांसारिकता के बीच जीवन का कर्म और सत्य ही हमारे सुख-दुख का विधान रचता है। इसलिए इसके लिए किसी और सत्ता या प्रभाव की खोज फिजूल है।

बौद्ध दर्शन मान्यताओं या धारणाओं के बजाय तर्क और विवेक को केंद्र में रखकर विचार करता है इसलिए इस दर्शन के अनुसार सृष्टि का कारण ईश्वर को नहीं माना गया है। दिलचस्प है कि यदि ईश्वर को सृष्टिकर्ता मान लिया जाए तो उसे दुख का कारण और जनक भी मानना होगा। बुद्ध को लगता है कि एक परम सत्ता की स्वीकृति का मतलब यह है कि हम उन कारणों की तात्विक खोज से भटक जाएं जिसके कारण हमारे जीवन में दुख है।

बुद्ध का यह दर्शन अपनी सूक्ष्म व्याख्या में इस आधार पर कृष्ण के गीता उपदेश से भी जुड़ता है कि दोनों ही जगह कर्म या पुरुषार्थ को महत्व दिया गया है। हालांकि बौद्ध दर्शन आत्मा की परिकल्पना को नकारता है और कहता है कि आत्मा चिरस्थायी नहीं है, जो इस जन्म के कर्मफल को लेकर अगले जन्म में प्रवेश करती है।

वैसे इस दर्शन में अनात्मवाद को स्वीकार करने के बावजूद कर्मफल और पुनर्जन्म को मान्यता प्रदान की गई है। ‘मिलिन्द्पन्हो’ में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है- जिस प्रकार पानी में एक लहर उत्पन्न होकर दूसरी लहर को जन्म देकर समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार कर्मफल चेतना के रूप में पुनर्जन्म का कारण होता है। जीवन-मरण का चक्र मृत्यु के उपरांत समाप्त नहीं होता, वरन मृत्यु तो केवल नवीन जीवन के आरंभ का कारण मात्र है।

कई विद्वानों ने बौद्ध और वेदांत दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इसमें विरोधाभास के बजाय सामंजस्य के बिंदु खोजे हैं। ऐसे तमाम विद्वानों और दार्शनिकों को लगता है कि मनुष्य और ईश्वर की सत्ता के बीच कर्म की स्थापना जहां बौद्ध दर्शन की बड़ी उपलब्धि है, वहीं वेदांत या गीता भी कर्म को मनुष्य की गति या अधोगति का कारण मानता है। यहां जो बात समझने की है वह यह कि बुद्ध कोई पौराणिक पात्र नहीं हैं। लिहाजा उनके जीवन और ज्ञान में मनुष्य का विवेक और उसकी तार्किकता को महत्व मिला है। वे ज्ञान को धारणा का नहीं बल्कि तार्किक निकष पर कसे जाने का विषय मानते हैं।

एक बात यह भी कि बुद्ध सौभाग्य या परमानंद जैसी किसी बात को रेखांकित करने के के बजाय चूंकि जीवन के तात्विक अर्थ और जीवन में दुख के कारणों को समझना चाहते हैं, इसलिए वे आरंभ से अंत तक अपनी इस जिज्ञासा को सामने रखकर ही कोई बात करते हैं। इस लिहाज से बौद्ध दर्शन का संदेश हमें वेदांत की तरह इस बात के लिए जागरूक और सतर्क करता है कि सांसारिकता न तो अर्थ के रूप में और न सत्ता के रूप में अंतिम है। बौद्ध दर्शन में जो क्षणभंगुरवाद है, वह दरअसल सांसारिकता के प्रति आसक्त न होने का संदेश है। यह संदेश मनुष्य को सांसारिक भोगवाद में लिप्त होने से रोकता है और सतत कर्मनिष्ठ होने की प्रेरणा देता है।

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