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रविवारीः तालीम में पिछड़े मुसलमान

आज दुनिया भर में शिक्षा को लेकर नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। शिक्षा को रोजगारपरक बनाने पर जोर है। बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए स्कूल नए-नए उपकरणों और गतिविधियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अध्यापकों के प्रशिक्षण में नए प्रयोग हो रहे हैं। मगर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि भारत में मुसलिम समुदाय के अधिकतर बच्चे मदरसों में दी जाने वाली धार्मिक और पारंपरिक तालीम पर निर्भर हैं। समझा जाता है कि उन्हें कुरान, हदीस आदि पढ़ा या रटा देने भर से उनकी पढ़ाई-लिखाई पूरी हो जाती है। इस तरह बदलते समय के मुताबिक मुसलिम समुदाय के बच्चे बाकी समुदाय के बच्चों के साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पाते। ऐसे में मदरसों को भी आधुनिक शिक्षा पद्धति से जोड़ने पर जोर दिया जाता रहा है। मुसलिम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के स्तर और मदरसों की स्थिति का विश्लेषण कर रहे हैं फिरोज बख़्त अहमद।

Author Published on: October 28, 2018 5:40 AM
आज के दौर में, मुसलिम संप्रदाय की विडंबना यह है कि जिसके रसूल ने कहा कि पढ़ने के लिए अगर चीन तक जाना हो तो जाओ, वह तो अपने भारत देश में भी पढ़ने को तैयार नहीं।

फिरोज बख़्त अहमद

शिक्षा के संबंध में कुरान में एक शब्द है ‘इकरा’, जिसका अर्थ है ‘पढ़ो’। जब हजरत मुहम्मद इबादत कर रहे थे तो अल्लाह की ओर से, उन्हें हुक्म हुआ कि वे पढ़ें। इसके बाद कुरान उतारा गया। इसका अर्थ यह है कि इस्लाम धर्म में पढ़ने का अत्यंत महत्त्व है। यही नहीं, हजरत मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को यहां तक कहा कि उन्हें अध्ययन के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि एक व्यक्ति पढ़ाई करने के लिए चीन जाए, बल्कि इसमें एक सांकेतिक बात थी कि पढ़ाई-लिखाई के लिए व्यक्ति को जितनी भी मेहनत वह कर सकता है, करनी चाहिए। अब जबकि इस्लाम में पढ़ाई-लिखाई का इतना महत्त्व है, तो क्या इसका यह अर्थ हुआ कि मुसलिम केवल दीन की पढ़ाई करें? हदीस, कुरान, फिक्ह, सर्फ-ओ-नहल, इल्मुल कलाम आदि ही पढ़ें? क्या वे दुनिया की पढ़ाई न करें? वास्तव में, इस्लाम में दीन की पढ़ाई के साथ-साथ दुनिया की पढ़ाई भी इतनी ही महत्त्वपूर्ण है। तभी तो कहा गया था कि एक मुसलिम को पढ़ाई करने के लिए अगर दूर-दराज क्षेत्रों में भी जाना पड़े, जैसे चीन, तो उसे जाना चाहिए।

अब देखना यह है कि कितने मुसलिमों ने अपने रसूल, हजरत मुहम्मद की यह बात मानी कि हर प्रकार की शिक्षा में उन्हें दक्ष होना है। खेद का विषय है कि अगर शिक्षा में न केवल भारत, बल्कि पूर्ण विश्व में अगर कोई कौम पीछे है, तो वे न ईसाई हैं, न हिंदू, न बौद्ध, न सिख और न ही यहूदी- आज शिक्षा में सबसे पीछे मुसलमान हैं और उनमें सबसे पीछे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और सूडान हैं। भारत में आज भी शिक्षित मुसलिमों की संख्या साठ प्रतिशत के नीचे है, जिनमें सबसे पीछे मुसलिम बच्चियां हैं। जब हम भारत की बात करते हैं तो यह कारण भी समझना होगा कि यहां मुसलमानों का शिक्षा प्रतिशत इतना कम कैसे है। दरअसल, हाल-हाल तक मुसलिमों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है और अपनी सत्ता के लिए ऐसे ही दुहा जाता रहा है कि जैसे गाय को दुहा जाता है।

आज के दौर में, मुसलिम संप्रदाय की विडंबना यह है कि जिसके रसूल ने कहा कि पढ़ने के लिए अगर चीन तक जाना हो तो जाओ, वह तो अपने भारत देश में भी पढ़ने को तैयार नहीं। यह ठीक है कि राजनीतिक दलों ने अपनी गद्दी के लिए उसका शोषण किया, मगर स्वयं इस तबके ने तालीम में आगे बढ़ने के लिए वह जिहाद नहीं किया, जो इसके लिए करना चाहिए था। मुसलिम तबका शिक्षा में पिछड़ने के लिए किलचता रहा और सरकार को दोष देता रहा। उसके बीच से न तो कोई सर सैयद उठा, न कोई हकीम अब्दुल हमीद, न कोई मौलाना आजाद या सैयद हामिद उठा। मुसलिमों को याद रखना चाहिए कि जो कौमें सरकार के रहमो-करम पर रहती हैं, वे कभी आगे नहीं बढ़ पातीं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कुछ पार्टियों के सत्ता में रहने का एक बड़ा कारण भारत के बीस-पच्चीस प्रतिशत मुसलमानों का उसे ठोस मतदान रहा है। बदले में मुसलमानों को क्या मिला? उनके क्षेत्रों में बजाय माडर्न स्कूल, संस्कृति स्कूल, दून स्कूल, सेंट स्टीफंस कॉलेज, हिंदू कॉलेज, एल्फिंस्टन कॉलेज आदि जैसे संस्थान बनाने के बजाय थाने और पुलिस चौकियां अधिक बनार्इं। मजे की बात है कि जो मुसलिम तबका थोड़ी पढ़ाई-लिखाई कर गया, उसका कारण है सर सैयद अहमद खान, मौलाना अबुल कलाम आजाद और हकीम अब्दुल हमीद जैसे लोगों द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थान और योजनाएं। मौलाना आजाद ने मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए यूजीसी, आईसीसीआर, साहित्य अकादेमी, संगीत नाटक आकेदमी, सीएसआइआर, एम्स आदि जैसे शिक्षा संस्थानों की बुनियाद डाली। अगर सर सैयद ने अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय बनाया, तो हकीम अब्दुल हमीद ने हमदर्द विश्वविद्यालय की स्थापना की।

मुसलिम शिक्षा का एक दौर था कि उनके वैज्ञानिकों ने नकली चांद बना लिया था और इसके अलावा चिकित्सा में अबुसिना की पुस्तक आज भी विश्व की सभी चिकित्सा पद्धतियों की आधारशिला है। आज मेडिसिन और सर्जरी, दोनों ही अबुसिना के बताए रास्ते पर आगे बढ़े हैं। इसी प्रकार से पढ़ाई-लिखाई कर के मुसलिमों ने स्पेन तक अपनी हुकूमत बना ली थी। न जाने फिर तेरहवीं शताब्दी से क्या हुआ कि मुसलमानों की शिक्षा का पतन होता गया। इसका अर्थ यह हुआ कि मुसलिमों ने हजरत मुहम्मद के आचरण को अपनाते हुए विश्व में प्रसिद्धि और ख्याति प्राप्त की, मगर जब-जब वे उनके रास्ते से हटे, तब-तब वे पीछे धकेले जाते रहे। मौजूदा दौर के, और विशेष रूप से भारतीय मुसलमानों का यह आचरण हो गया है कि वे खुद तो मेहनत करना नहीं चाहते, मगर फल पूरी तरह मीठा और रसीला चाहते हैं।

मात्र बीज बोकर यानी प्राइमरी स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिला कर अधिकतर मुसलिम परिवार यह सोचते हैं कि उनका काम पूरा हो गया। अगर बच्चे को स्कूल में पढ़ाई में कोई दिक्कत आती है, तो उसकी इन माता-पिता को कोई चिंता नहीं होती। न तो वे अपने बच्चों के स्कूलों के पीटीएम में जाते हैं और न ही समय-समय पर ये अभिभावक अपने बच्चों के अध्यापक-अध्यापिकाओं से बातचीत करते हैं। जो बच्चे स्वयं पढ़ाई पर ध्यान देते और आगे निकल जाते हैं, उनके लिए अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती। पर जो बच्चे किसी विषय में, जैसे- गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि- में पिछड़ जाते हैं, उनके लिए न तो कोई विशेष ट्यूशन का प्रबंध किया जाता है और न ही कोई दूसरा उपाय ढूंढ़ा जाता है। नतीजा यह होता है कि बच्चा बीच में पढ़ाई छोड़ कर घर बैठ जाता है या किसी कारखाने, फैक्ट्री, ठीहे आदि पर नौकरी-चाकरी करता है।

हाल ही में दिल्ली के प्रसिद्ध उर्दू माध्यम स्कूल, एंग्लो अरेबिक स्कूल, के बारे में एक घटना पता चली कि एक बच्चा जब सातवीं कक्षा में फेल हो गया, तो उसके पिता तहमद पहने, पान की गिल्लोरी मुंह में दबाए, प्रधानाचार्य के दफ्तर में आ धमके। उनसे बदकलामी और दुराचार पर उतर आए। नौबत जब हाथपाई तक आ पहुंची तो अन्य अध्यापकों ने बीच-बचाव कराया। लड़के के पिता गालियां देकर प्रधानाचार्य को धमकी देकर चले गए कि अब उसकी खैर नहीं। यह खेद का विषय है कि उर्दू माध्यम स्कूलों के अभिभावकों का प्राय: यही सुलूक अपने बच्चों के अध्यापकों के साथ रहता है।

अगर मुसलिम तबका इसी प्रकार से आचरण करता रहा, तो वह पिछड़ता चला जाएगा और अपनी विफलता का दोष सरकार को देता रहेगा। इससे कुछ नहीं होने वाला। मुसलिमों को पूरी तरह से अपने बच्चों की शिक्षा में हाथ बंटाना होगा और अपना पेट काट कर किताबें, कलम, कॉपियां, लैपटाप आदि दिलाने होंगे, ताकि उनके बच्चे किसी से पीछे न रहें। यही नहीं, मुसलिम मुहल्लों में ‘रेमेडियल क्लासेज’ के कोचिंग सेंटर और अन्य प्रशिक्षण केंद्र निजी स्तर पर, उन लोगों को खोलने चाहिए जो कुछ साधन संपन्न हैं और उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है। अन्य समाजों में, चाहे वह हिंदू समाज हो, सिख, ईसाई समाज हो या अन्य समाज, सभी के बच्चे आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके समाजों के लोगों को शिक्षा की अहमियत का अंदाजा है। यही कारण है कि प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था कि भारतीय मुसलमान दूसरी कौमों से सौ साल पीछे चल रहे हैं, जबकि सर सैयद अहमद खान ने भी लगभग यही कहा था कि भारतीय मुसलिम दूसरों की तुलना में दो सौ वर्ष पीछे हैं। ईमानदारी की बात है कि आज हमें एक नहीं, बल्कि सैकड़ों सर सैयद, आजाद, हकीम अब्दुल हमीद और सैयद हामिद जैसे चाहिए।

मदरसों को आधुनिक बनाना होगा

भारत में लगभग तीस हजार मदरसे हैं, जिनमें से अधिकतर निजी हैं और कुछ सरकारी भी हैं। भारत में गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार पच्चीस से तीस करोड़ मुसलिम आबादी है, जिसमें अधिकतर या तो अनपढ़ हैं या मदरसों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जहां तक मदरसा शिक्षा प्रणाली का प्रश्न है, सभी धर्मों की शिक्षा प्रणाली को देखा जाए, तो इन शिक्षा संस्थानों में सबसे अधिक शिक्षा सामग्री होती है। यह अलग बात है कि उर्दू, अरबी और फारसी भाषाओं को छोड़ कर पूर्ण पाठ्यक्रम धार्मिक होता है, जिसमें कुरान का नाजरा (पढ़ना), हिफ्ज (पूर्ण रूप से कंठस्थ करना), इल्म-उल-कलाम, हदीस, सर्फ-ओ-नहब, तजवीद, फिकह आदि होते हैं। अपने में यह पूर्ण विद्या होती है और अधिकतर मुसलिम तबका यह ग्रहण कर रहा है।

भारतीय मुसलिमों के लगभग अड़सठ प्रतिशत बच्चे मदरसों में शिक्षा पा रहे हैं, पच्चीस प्रतिशत उर्दू माध्यम की पाठशाओं में पढ़ते हैं, तो केवल आठ प्रतिशत बच्चे आधुनिक शिक्षा का लाभ उठा पा रहे हैं। यही कारण है कि सिविल सर्विसेज में अब तक केवल दो से तीन प्रतिशत मुसलिम उत्तीर्ण हो पाए, मेडिकल में केवल 2.5 प्रतिशत उत्तीर्ण हो पाते हैं, विधायी यानी कानूनी सेवाओं में मात्र छह प्रतिशत कामयाब होते हैं। इसी प्रकार भारतीय सेना में केवल 4.5 प्रतिशत दिखाई पड़ते हैं। हां, अल्संख्यक मंत्रालय द्वारा प्रदान की गई कोचिंग के बाद इस वर्ष 5.2 प्रतिशत उम्मीदवार मुसलिम थे। इस मंत्रालय के वर्तमान मंत्री इस प्रतिशत को दस के आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।

बावजूद इसके कि मदरसे में दी जाने वाली इस्लामी शिक्षा अपने में परिपूर्ण होती है, आज आवश्यकता इस बात की है कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी प्रदान की जाए। होता यह है कि मदरसे का बच्चा, जो हजार पृष्ठ की कुरान जैसी मोटी किताब को बिना किसी गलती के पूर्ण रूप से कंठस्थ कर लेता है, वह क्या मन-मस्तिष्क होगा। वास्तव में मुसलिम तबका इस जबर्दस्त दिमाग का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा है। इतना तेज दिमाग रखने वाले मदरसे के बच्चे को अगर हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, भूगोल, कंप्यूटर आदि जैसे विषय पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाएं तो मदरसे के बच्चे हारवर्ड और आक्सफर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों से भी आगे जाने की क्षमता रखते हैं। इस संदर्भ में हमें प्रशंसा करनी होगी, रामगढ़, जयपुर के ‘मदरसा जामियतुल हिदाया’ का, जिसने बड़ा अच्छा काम किया है। यहां पर न केवल दीनी तालीम, बल्कि दुनियावी तालीम भी दी जा रही है, जिसमें यहां के बच्चे इंजीनियरिंग, सिविल सर्विसेज, कम्पयूट्रानिक्स आदि में भी आगे बढ़े हैं। यहां के कई बच्चे न केवल भारत में, सऊदी और अमेरिकी दूतावासों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों बल्कि संयुक्त राष्ट्र तक में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

पिछले दिनों सिविल सर्विस की परीक्षा में मदरसे के कई छात्रों का चयन भी हुआ। इसकी शुरुआत आज से लगभग पंद्रह वर्ष पहले इसी मदरसे के एक छात्र ने की थी, जो आज एक बड़े अफसर हैं। यही कारण है कि मदरसा जामियतुल हिदाया ने संघ लोक सेवा आयोग में अपने छात्र भेजने के लिए अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में प्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा प्रशिक्षण कार्य शुरू किया। यही नहीं, बिहार के फुलवारी शरीफ मदरसे ने भी और दिल्ली के फतेहपुरी मस्जिद, चांदनी चौक में स्थित मदरसा आलिया में भी धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा का पाठ्यक्रम चलाया जा रहा है। आज मदरसों को मॉडल मदरसा बनाने की जरूरत है, जहां छात्र-छात्राओं को हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, अरबी, फारसी, संस्कृत, गणित, विज्ञान, भूगोल, वाणिज्य, पत्रकारिता,बीटेक, एमटेक आदि की शिक्षा भी प्रदान की जाए और विश्व को दिखाया जाए कि मदरसे के बच्चे भी प्रतिभाशाली होते हैं।

बदलते समय के अनुसार भारतीय मदरसा प्रणाली में आज इसी प्रकार सभी आधुनिक विषय पढ़ाए जाने चाहिए, क्योंकि जो मस्तिष्क मदरसे के बच्चों का होता है वह दूसरों का नहीं। अफसोस तो इस बात का है कि कुछ मुसलिम उलेमा और बुद्धिजीवी यह सोचते हैं कि मदरसे केवल धार्मिक अध्ययन के संस्थान हैं। उधर मदरसे से रंजिश रखने वाले लोग इनको आतंक का अड्डा तक कहने से नहीं चूकते। पर सच्चाई तो यह है कि भारतीय मदरसे न केवल देशभक्त, बल्कि प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र भक्ति के तराने और नज्में प्रस्तुत करते हैं और अपने वतन से मुहब्बत और उसकी मिट्टी में मिल जाने की तमन्ना रखते हैं।

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