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भाषा: विरासत का आईना

हमारे देश के विभिन्न प्रांतों और क्षेत्रों की भाषाएं अलग-अलग हो सकती हैं, पर हिंदी हमारी एकता और प्यार की भाषा है। कोई भी प्रांत या अंचल हो, हिंदी फिल्में और गीत सभी को अच्छे लगते हैं।

Author December 2, 2018 4:48 AM
आज हिंदी भारत ही नहीं, पूरे विश्व पटल पर तेजी से उभर रही है।

एमजे वारसी

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में पूरी दुनिया एक विश्वग्राम बन गई है। भूमंडलीकरण के मौजूदा परिदृश्य में हमारे सामाजिक जीवन समेत हर क्षेत्र में मूल्यों और मान्यताओं में अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहा है। परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन का प्रभाव हमारे सोच और हमारी जीवन शैली पर भी पड़ रहा है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सहायता से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असंतुलन को कम करने के प्रयास हो रहे हैं। प्रयास यह होना चाहिए कि बदलते परिवेश में समाज का संतुलित विकास और उसके विभिन्न अंगों के बीच पारस्परिक सामंजस्य बनाए रखने के लिए भाषा और गुणात्मक विकास पर बल दिया जाए। दरअसल, भाषा सिर्फ संचार का माध्यम नहीं, बल्कि समुदाय के सामूहिक इतिहास और विरासत का आईना है। आज हिंदी केवल भारत में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई है।

हमारे देश के विभिन्न प्रांतों और क्षेत्रों की भाषाएं अलग-अलग हो सकती हैं, पर हिंदी हमारी एकता और प्यार की भाषा है। कोई भी प्रांत या अंचल हो, हिंदी फिल्में और गीत सभी को अच्छे लगते हैं। यह अलग बात है कि हाल के दिनों में मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों को लेकर नाराजगी दिखी। इस मुद्दे पर छिटपुट हमले हुए और सियासत गरमाई। इसमें दो राय नहीं कि अगर हमारे दिल में अपने देश के लिए, यहां बोली जाने वाली भाषाओं के लिए सम्मान और गौरव का भाव नहीं है, तो निस्संदेह हम राष्ट्र के प्रति वफादार नहीं होंगे। लोगों को हिंदी की इस दशा के लिए दूसरों को कोसने के बजाय गौर करना चाहिए कि उत्तर भारतीय हिंदीभाषियों के प्रति महाराष्ट्र में पिछले दिनों फूटा गुस्सा देश या राज्य के हित में है या नहीं है? अगर नहीं है तो फिर इसका समाधान क्या है? चिंता की बात है कि हमारी सुस्ती और काहिली की वजह से कहीं राष्ट्रभाषा यों मुक्कों और घूसों के बीच दम न तोड़ दे।

आज हिंदी भारत ही नहीं, पूरे विश्व पटल पर तेजी से उभर रही है। इस विषय पर आयोजित सम्मेलनों में हम गर्व से कहते हैं कि हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनती जा रही है। विश्व के अधिकतर विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषा और संस्कृति पढ़ाई जा रही है। पिछले कुछ सालों अमेरिका में एक सकारात्मक परिवर्तन आया है। वहां के समाज में दूसरे समुदायों की भाषा और संस्कृतियों को जानने की इच्छा जागृत हुई है। अमेरिका के तमाम विश्वविद्यालयों में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के लाखों विद्यार्थियों का जमावड़ा है। इन सबकी संपर्क भाषा हिंदी, उर्दू ही हैं। दक्षिण एशियाई छात्र संघ विश्वविद्यालय परिसरों में ईद, होली, दीवाली, दशहरा आदि त्योहार मनाते हैं। नृत्य तथा संगीत समारोह, कवि सम्मेलन और मुशायरों का भी आयोजन करते हैं। अमेरिकी समाज भी हिंदी-उर्दू के चलन को अपनाने के लिए तैयार दिखता है।

भाषा का काम समाज में ज्ञान का संरक्षण, संवर्द्धन और संप्रेषण होता है। इसके लिए राजनीतिक आधार और संख्या बल से ज्यादा जरूरी होता है सांस्कृतिक श्रम और मनोबल। भाषा वैचारिक आदान-प्रदान का वह माध्यम है, जिससे दूर-दराज बैठे उस व्यक्ति के पास भी पहुंचा जा सकता है, जो हमें जानता तक नहीं। भाषा से अभिप्राय मात्र अपनी बात कहना नहीं, बल्कि देश, समाज और विश्व से जुड़ना भी है।वैश्वीकरण के इस दौर में सफल होने के लिए जरूरी है कि हम एक-दूसरे के रीति-रिवाज, संस्कृति और भाषा को समझें। आज विश्व में हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा बाजार है। दुनिया भर के लोग हिंदी फिल्मों के नायक-नायिकाओं को जानते और पसंद करते हैं। हिंदी इनके माध्यम से भी विश्व में लोकप्रिय हो रही है। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति से बढ़ कर कोई दूसरी संस्कृति संसार में नहीं है और इसकी ज्योति जलाए रखना, इसे जीवित रखना हमारा धर्म है। हमें समझना चाहिए कि राष्ट्रभाषा की जगह हिंदी के अलावा अन्य कोई भाषा नहीं ले सकती। यह भाषा समस्त राष्ट्र को एकता के मार्ग पर ले जाती है। हिंदी भाषा और संस्कृति के विकास में ही देश की उन्नति है। हर प्रांत के लोग हिंदी समझ लेते हैं, इसलिए यह भावनात्मक एकता की कड़ी भी है। आज जरूरत इस बात की है कि भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में किसी विदेशी विद्वान को सम्मानित करने से दोनों देशों के बीच रिश्ते भी मजबूत होते हैं और विदेशों में हमारी संस्कृति और भाषा के प्रति जागरूकता भी बढ़ती है। अगर हम खुद अपनी राष्ट्रभाषा या फिर क्षेत्रीय भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तो विश्व में कोई हमारा भी सम्मान नहीं करेगा।

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