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भाषाः वैश्वीकरण के दौर में हिंदी

हिंदी ही राजभाषा क्यों? हिंदी का प्रयोग बढ़ाने पर इतना जोर क्यों? ऐसे प्रश्न अनेक बार उपस्थित होते हैं।

Author Published on: April 2, 2017 1:49 AM
language Column, Sunday Article, Sunday Story on language, globalization, era of globalizationहॉलीवुड की फिल्मों में भी हिंदी शब्दों का प्रयोग हो रहा है। आॅस्कर से सम्मानित फिल्म ‘अवतार’ हिंदी का ही शब्द है। कुछ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाने वाली फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ का ‘जय हो’ गाना इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। मीडिया की खबरों के मुताबिक, इस गाने का प्रयोग फिलीपींस, स्पेन आदि देशों में जेल कैदियों की दशा सुधारने में किया जा रहा है।

साकेत सहाय

हिंदी ही राजभाषा क्यों? हिंदी का प्रयोग बढ़ाने पर इतना जोर क्यों? ऐसे प्रश्न अनेक बार उपस्थित होते हैं। खासकर, सरकारी कार्यालयों, कॉरपोरेट आॅफिसों में कार्यरत ऐसे युवाओं के बीच, जिन्हें राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में ज्यादा पता नहीं। पर, इन्हीं सबके बीच हिंदी भारत की राजभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा से आगे बढ़ते हुए विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है।

हिंदी की वर्तमान स्थिति में कहीं न कहीं वैश्वीकरण का योगदान है। हालांकि विश्लेषक वैश्वीकरण को मूल रूप से एक आर्थिक संकल्पना मानते हैं। जो भारतीय समाज और संस्कृति अपनी पांच हजार साल से ज्यादा पुरानी होने पर गर्व करती थी उसे वैश्वीकरण ने एक झटके में बदल दिया है। इसका असर हिंदी पर भी पड़ा है। वैश्वीकरण की मूल संकल्पना व्यापार, विदेशी निवेश द्वारा आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पर अधिग्रहण तथा आपसी समन्वय, आदान-प्रदान के माध्यम से एक मंच का निर्माण करने की प्रक्रिया के रूप में उभरती है। इन सब में भाषा की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वैश्वीकरण के बाद हिंदी भी एक नई भूमिका में हमारे सामने आई है। पर भारत में आज भी हिंदी की भूमिका आम आदमी के सपने और हकीकत के बीच संतुलन बनाती और हिचकोले खाती हुई भाषा की है। हिंदी की यह स्थिति दरअसल राजशक्ति और लोकशक्ति के बीच आपसी समन्वय की कमी की वजह से है। राजशक्ति इसलिए कि गणतांत्रिक भारत का संविधान उसे संघ सरकार की राजभाषा के रूप में अधिकार प्रदान करता है। मगर अंग्रेजी मानसिकता उसे यह अवसर ही नहीं देती कि वह फल-फूल सके। फिर भी, लोकशक्ति हिंदी का स्वभाव है, उसकी बुनियाद है, जिसे वह छोड़ नहीं सकती। और इसी का नतीजा है हिंदी का विकास। हिंदी वहीं ज्यादा फली-फूली है जहां लोकशक्ति का असर है।

दरअसल, हिंदी के प्रसार और विकास की ताकत उसके मिश्र स्वभाव में छिपी हुई है। जब हिंदी संस्कृत की तत्सम शब्दावली से सजती-संवरती है तो वह प्रबुद्ध समाज की जुबान बनती है, उर्दू के साथ रच-बस कर संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में बोली-समझी और देसी भाषाओं तथा बोलियों के शब्दों को अपना कर देश-दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में जानी-पहचानी जाती है। हिंदी का यह स्वभाव ही उसे एक व्यापक और वैश्विक भूमिका में ला खड़ा करता है।

स्वाभाविक ही भारतीय बाजार की भूमिका बड़ी हो गई है। वैश्वीकरण के दौर में भारतीय बाजार की ताकत जैसे-जैसे बढ़ेगी, भारतीय भाषाओं और हिंदी की भूमिका व्यापक होगी। वर्तमान कॉरपोरेट युग में औद्योगिक उत्पाद, उपभोक्ता, बाजार और टेक्नोलॉजी का सर्वथा नया संबंध बन रहा है। इसमें सब कुछ बहुराष्ट्रीय है। पर इसकी जुबान वही है, जो हमारी-आपकी जुबान है। यानी वैश्वीकरण के दौर में हमारे बीच जो चीजें बिक रही हैं वे भले दुनिया के किसी भी हिस्से का उत्पाद हों, पर बिक रही हैं हमारी भाषा में।

आज अंग्रेजी का जो वर्चस्व अचानक बढ़ा हुआ प्रतीत होता है, उससे डरने की बात नहीं। भाषा की संवेदनात्मक शक्ति और बाजार का रहस्य जानने वाले लोग बखूबी समझते हैं कि यह समय हिंदी जैसी जनभाषा को सीमित और संकुचित करने का नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और सामर्थ्य में बढ़ोतरी लाने वाला है। क्योंकि हिंदी भारत जैसे विशाल देश की प्रमुख संपर्क भाषा है। इसे दुनिया की लगभग एक अरब तीस करोड़ आबादी समझती है।

आज भी अंग्रेजी कि पहचान तकनीकी श्रेष्ठता और आधुनिक सभ्यता के स्रोत के रूप में अपरिहार्य है। सूचनाओं के आदान प्रदान की सुविधा और बहुराष्ट्रीय निगमों में रोजगार की कुंजी के रूप में उसकी सबलता विश्वव्यापी है। फिर भी क्या कारण है कि चाहे अमेरिकी चुनाव हो या लंदन के मेयर का चुनाव या वर्ष 2014 का भारतीय आम चुनाव, सभी में विजयी पक्ष की जीत में हिंदी का भी योगदान रहा। यह सब बाजार की के कारण नहीं, बल्कि हिंदी की अपनी ताकत का कमाल है। क्योंकि यह अपने स्वभाव से जनभाषा और स्वरूप में सर्वग्राही भाषा है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी का फैलाव लिपि के स्तर पर भी दिख रहा है। देश में विज्ञापनी भाषा में हिंदी का बढ़ता प्रयोग इसका उदाहरण है। वैश्वीकरण के बाद हुए भाषायी विस्तार से हिंदी में भारतीय भाषाओं के शब्द ही नहीं आए, बल्कि इसका फैलाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आप्रवासियों और विदेशियों की बोली में देखा जा सकता है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, जमैका, टोबैगो और गुयाना आदि देशों में करीब पचास फीसद लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं। हिंदी के सैकड़ों शब्द मॉरीशस की क्रियोल में हैं। अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में आप्रवासियों की बड़ी आबादी कुछ अलग प्रकार की हिंदी बोलती है। वहां के हिंदी रेडियो कार्यक्रमों में भारतीय रेडियो कार्यक्रमों से ज्यादा गुणवत्ता नजर आती है। हॉलीवुड की फिल्मों में भी हिंदी शब्दों का प्रयोग हो रहा है। आॅस्कर से सम्मानित फिल्म ‘अवतार’ हिंदी का ही शब्द है। कुछ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाने वाली फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ का ‘जय हो’ गाना इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। मीडिया की खबरों के मुताबिक, इस गाने का प्रयोग फिलीपींस, स्पेन आदि देशों में जेल कैदियों की दशा सुधारने में किया जा रहा है।
हिंदी के वैश्विक स्वरूप को संचार माध्यमों में भी देखा जा सकता है। संचार माध्यमों ने हिंदी के वैश्विक रूप को गढ़ने में पर्याप्त योगदान दिया है। भाषाएं संस्कृति की वाहक होती हैं और संचार माध्यमों पर प्रसारित कार्यक्रमों से समाज के बदलते सच को हिंदी के बहाने ही उजागर किया गया। आज स्मार्टफोन के रूप में हर हाथ में एक तकनीकी डिवाइस मौजूद है और उसमें हमारी भाषा। सभी आॅपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी में संदेश भेजना, हिंदी की सामग्री को पढ़ना, सुनना या देखना लगभग उतना ही आसान है जितना अंग्रेजी की सामग्री को। हालांकि कंप्यूटरों पर भी हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है और इंटरनेट पर भी, लेकिन मोबाइल ने हिंदी के प्रयोग को अचानक जो गति दे दी है, उसकी कल्पना अभी पांच साल पहले तक किसी ने नहीं की थी। इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं की सामग्री की वृद्धि दर प्रभावशाली है। अंग्रेजी के उन्नीस फीसद सालाना के मुकाबले भारतीय भाषाओं की सामग्री नब्बे फीसद की रफ्तार से बढ़ रही है।

जिस तरह हिंदी से अंग्रेजी की तरफ संक्रमण की एक धारा बह रही है, उसी तरह भारतीय भाषाओं और बोलियों से एक धारा हिंदी की तरफ भी आ रही है, जिसका नतीजा है हिंदी का सर्वमान्य रूप से देश की प्रमुख संपर्क भाषा बन जाना। पब्लिक लैंग्वेज सर्वे आॅफ इंडिया के ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि वृद्धि की मौजूदा रफ्तार से हिंदी पचास साल में अंग्रेजी को पीछे छोड़ देगी। यह सब हिंदी की भाषायी सामर्थ्य, समृद्धि, विविधता, विस्तार, जीवंतता, वैज्ञानिकता आदि के कारण है और इसमें वैश्वीकरण का जबर्दस्त योगदान है।
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी को और सशक्त बनाने के लिए दूसरी भाषाओं के साथ इसके संबंधों को अनुवाद के माध्यम से मजबूत करना होगा। अनुवाद की भूमिका भाषा की संपन्नता और समृद्धि में सहायक होती है। इसके लिए हिंदी को जनभाषा के स्वरूप के निकट जाना होगा, क्योंकि लोकतंत्र की सफलता लोक को तंत्र के निकट लाने में निहित है।
ऐसे में, हमें हिंदी के विकास की चुनौतियों के समाधान खोजने की आवश्यकता है। इसमें पहली आवश्यकता है हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं के संबंधों को मजबूत कर, एकीकृत शब्दावली बनाने और मानकीकरण करने की। ०

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