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दक्षेस में हिंदी की बुनियाद

एशिया महाद्वीप में भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमा, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, तुर्की और थाईलैंड देशों में हिंदी शिक्षण की पुरानी परंपरा है। गुयाना, त्रिनिडाड, सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस जैसे अनेक देशों में व्यापक संपर्क की भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग हो रहा है

प्रतीकात्मक तस्वीर।

आलोक कुमार सिंह
आज जब पूरा विश्व एक बाजार बन चुका है और हमारा जन-जीवन भी बाजार द्वारा संचालित हो रहा है तब भाषा पर इसका प्रभाव स्वाभाविक है। हिंदी पर भी यह बात लागू होती है। हिंदी न केवल वैश्विक फलक पर निरंतर दिख रही है, बल्कि वह आज बाजार द्वारा प्रयुक्त प्रथम भाषा बन चुकी है। बाजार-व्यापार-रोजगार आदि अनेक कारणों से हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीखा और समझा जा रहा है। वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी अनेक कारणों से अपनी पहचान और महत्त्व कायम कर रही है। आज विश्व के लगभग दो सौ विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है।

एशिया महाद्वीप में भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमा, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, तुर्की और थाईलैंड देशों में हिंदी शिक्षण की पुरानी परंपरा है। गुयाना, त्रिनिडाड, सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस जैसे अनेक देशों में व्यापक संपर्क की भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग हो रहा है, तो वहीं अमेरिका, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोप के कई देशों में व्यापारिक और कूटनीतिक कारणों से विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण हो रहा है। दक्षेस यानी ‘सार्क’ के सभी देशों में हिंदी प्रयुक्त हो रही है। दक्षेस के लगभग सभी देश परंपरागत और सांस्कृतिक रूप से भारत और हिंदी से जुड़े रहे हैं। ये सभी कभी न कभी वृहत्तर भारत के अंग रहे हैं। इन देशों में प्रयुक्त भाषाएं एक ही परिवार और वर्ग की हैं। इसी कारण ये एकसूत्र में बंधे दिखाई देते हैं।

नेपाल भारत का प्रमुख अंग रहा है। नेपाली भाषा भी आर्य परिवार से संबंध रखती है। आज भी यह भारतीय संविधान की एक स्वीकृत भाषा है। वैसे तो नेपाल में काफी भाषाएं प्रचलित हैं, लेकिन उन सभी में हिंदी का विशेष स्थान है। नेपाल में कपिलवस्तु, मधेश, दांग, बर्दिया क्षेत्र में अवधी लगभग दस लाख व्यक्तियों द्वारा बोली जाती है। वहां हिंदी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। अवधी वहां शिक्षा की माध्यम भाषा भी है। वर्तमान समय में हिंदी लेखन की प्राय: सभी विधाएं तथा प्रवृत्तियां न्यूनाधिक मात्रा में नेपाल में प्राप्य हैं। नेपाल में हिंदी का व्यवहार मुख्यत: तीन रूपों में होता है। तराई के लगभग अस्सी-पचासी लाख लोगों की वह पहली भाषा है यानी भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा से लगे आबादी की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण नेपाल के इस तराई-क्षेत्र में हिंदी उसी रूप में प्रथम भाषा है, जिस रूप में बिहार और उत्तर प्रदेश में। दूसरे, हिंदी वहां पहाड़ों और पहाड़ी नगरों में निर्वाह करने वाले उन बहुसंख्यक लोगों की द्वितीय और संपर्क भाषा है, जिनकी मातृभाषा नेपाली है।

इस प्रकार उस देश की आबादी के लगभग नब्बे प्रतिशत लोगों की हिंदी प्रथम और द्वितीय तथा संपर्क भाषा है। सच तो यह है कि हिंदी के इस व्यापक प्रयोग ने ही उसे सर्वप्रथम 1950-60 के दशक और फिर बाद के दशकों में कुछ राजनीतिक पेचीदगी में जकड़ दिया और राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर नेपाली के साथ-साथ हिंदी को भी द्वितीय राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी। नेपाल तराई कांग्रेस ने तो इसे ही अपनी पार्टी का मूल मुद्दा बनाया और हिंदी को संवैधानिक स्तर प्रदान करने का हर संभव प्रयास जारी रखा। भले ही संवैधानिक स्तर पर उसे स्थान न मिला हो, लेकिन सामाजिक और व्यावहारिक रूप में वह जन-मन पर राज कर रही है और यही कारण है कि नेपाल घूमने जाने वाले भारतीयों को कहीं भी भाषाई संकट का सामना नहींं करना पड़ता है।

दक्षेस देशों में भाषिक स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति भी अच्छी है। विभाजन के बाद पाकिस्तान के रूप में नए देश का निर्माण होने पर मुख्य भाषा के रूप में उर्दू को स्थान मिला। यद्यपि यहां उर्दू राजभाषा है, जबकि आधिकारिक रूप से सभी कार्य अंग्रेजी में होते हैं। करांची और लाहौर विश्वविद्यालयों के साथ ही इस्लामाबाद में स्कूल आॅफ माडर्न लैंग्वेजेज में हिंदी सर्टिफिकेट कोर्स तक पढ़ाई जाती है। आज पाकिस्तान में उतने ही लोग हिंदी बोलने-जानने और समझने में सक्षम हैं जितने उर्दू के हैं। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान की लगभग अस्सी प्रतिशत जनसंख्या यानी बारह करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी का व्यवहार करते हैं। यहां के विश्वविद्यालयों के साथ ही विद्यालयों में भी हिंदी का पठन-पाठन होता है। यहां तक कि पाकिस्तान की संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भी हिंदी वैकल्पिक रूप में उपलब्ध है। साहित्यिक स्तर पर भले स्थिति बहुत सुखद नहींं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से हिंदी के विकास में यहां कोई बहुत अवरोध नहींं है।

बांग्लादेश तीन ओर से भारतीय सीमाओं से लगा हुआ है। चूंकि यह भी भारत का ही एक अंग रहा है, इसलिए इसकी भाषा और संस्कृति पर भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है। यहां की राजभाषा तो बांग्ला है, पर उसी के समांतर यहां उर्दू और हिंदी भी प्रयुक्त होती हैं। भारत के बाद हिंदी समझने वाला यह एक महत्त्वपूर्ण देश है। वहां के महाकवि नजरूल इस्लाम का बांग्ला के माध्यम से हिंदी पर गहरा प्रभाव पड़ा है। यहां के ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए हिंदी का चार वर्षीय पाठ्यक्रम भी चलाया जाता है। दाऊद हैदर, रफीद आजाद, महाकवि नजरूल इस्लाम आदि की रचनाओं का हिंदी से गहरा जुड़ाव दिखाई देता है। इन कवि की कविताओं में भारतीय समाज और जीवन से निकटता का एहसास होता है।

श्रीलंका दक्षेस का प्रमुख और महत्त्वपूर्ण देश है। यहां हिंदी का प्रचार प्रमुख रूप से फिल्मों, विचार गोष्ठियों, भारतीय पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हुआ है। यहां रेडियो पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम का प्रसारण नियमित रूप से होता है। श्रीलंकाई दूरदर्शन पर भी हिंदी कार्यक्रम और फिल्में प्रसारित होते हैं। श्रीलंका के परीक्षा विभाग द्वारा संचालित ‘उच्चतम पाठशाला प्रमाणपत्र’ परीक्षा में हिंदी भी वैकल्पिक विषय के रूप में उपलब्ध है। कोलंबो विश्वविद्यालय, केलाणिय विश्वविद्यालय, जयवर्धने पुरा विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के शिक्षण प्रशिक्षण का अपेक्षित प्रबंध है। यहां के विश्वविद्यालयों में यह सुविधा है कि छात्र हिंदी में भी बीए तथा एमए जैसी शैक्षणिक उपाधियां हासिल कर सकते हैं। भारत और श्रीलंका सरकार की ओर से दोनों देशों की भाषाओं में शोधकार्य हेतु शोधवृत्तियों की विधिवत व्यवस्था है। इस कारण भाषा की प्रयोजनपरकता को ध्यान में रख कर श्रीलंकाई हिंदी की ओर उन्मुख हो रहे हैं।

भूटान में विद्यालयीय स्तर पर हिंदी शिक्षण की व्यवस्था है। यहां की राजभाषा जोंगखा है। इसके साथ ही यहां नेपाली और हिंदी का प्रयोग भी होता है। मालदीव में आज हिंदी की जो स्थिति है, वह हिंदी सिनेमा और गीतों के माध्यम से है। भले साहित्यिक दृष्टि से भारत के पड़ोसी देशों में स्थिति बहुत सुखद नहींं है। पाकिस्तान का उर्दू साहित्य तो हिंदी में खूब अनुदित हुआ है, लेकिन वहां किसी लेखक ने देवनागरी लिपि में रचना की हो, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहींं है। बांग्लादेश की स्थिति भी यही है। वहां के बांग्ला लेखकों की रचनाएं हिंदी में छपती रही हैं। नेपाल में शताब्दियों से हिंदी का प्रयोग होता रहा है तथा वहां अनेक हस्तलिखित कृतियां मिलती हैं।

वर्तमान के साथ ही भविष्य में भी हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने में दक्षेस के देशों का अपना वैशिष्ट्य बना ही रहेगा, क्योंकि इन देशों के नागरिक यूरोप-अमेरिका में भी आपसी संवाद हिंदी में ही करते हैं। इन देशों में हिंदी जन-मन को जोड़ने की दृष्टि से सेतु का कार्य करती रही है। इस क्षेत्र में सरकारी और गैर-सरकारी दोनों ही स्तरों पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसी प्रकार गैर-सरकारी रूप में वैयक्तिक प्रयासों द्वारा भी स्थिति में यथोचित बदलाव लाया जा सकता है। इससे बहुत फर्क नहींं पड़ना चाहिए कि इन देशों में हिंदी का साहित्य कैसा और किस मात्रा में लिखा जा रहा है। भाषा के व्यवहृत रूप में हिंदी निरंतर विकास की ओर अग्रसर है और अपेक्षा की जानी चाहिए कि यह विकास उत्तरोत्तर और बेहतर दिशा की तरफ ले जाएगा। ०

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