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ललित प्रसंग- गलत पते के कारण

बिना विरासत का आदमी कोई आदमी है, क्या? नहीं जिसकी कोई विरासत ही नहीं है, उसका वजूद ही क्या है! जिसका कोई वजूद ही नहीं, भला उसका वारिस कौन होगा।

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उमेश प्रसाद सिंह

पता भी कितनी बड़ी चीज है, हमें पता ही नहीं। जब किसी का भी पता हमें पता होता है, तो उसकी महत्ता का हमें कुछ पता नहीं चलता है। पता का तो हमें तब पता चलता है, जब कुछ लापता हो जाता है। प्राय: लोग पता का मतलब स्थान से समझते हैं। किसी जगह से समझते हैं। मगर ऐसा नहीं है। पता किसी जगह का नाम नहीं है। यह बिल्कुल गलत धारणा है। पता का मतलब स्थान और व्यक्ति के संबंध से है। किसी जगह और किसी वस्तु के स्थिर संयोग से है। यह दो संज्ञाओं के संयोग की संज्ञा है। स्थान वाचक और व्यक्तिवाचक संज्ञा के संबंध की वाचक संज्ञा है। यह संबंध वाचक संज्ञा है। कितना दारुण है कि हम स्थानों और व्यक्तियों के संबंध को भूल कर कितने दयनीय बनते जा रहे हैं। व्यक्ति और स्थान का जो आपसी रिश्ता है, वही मनुष्य का पता है। शब्द और अर्थ के आपसी रिश्ते जब प्रभासित हो उठते हैं, तभी पते की बात बनती है। एक पता के न होने से आदमी के होने के बावजूद उसका कुछ अता-पता नहीं रह जाता। वह विरासत से वंचित हो जाता है। बिना विरासत का आदमी कोई आदमी है, क्या? नहीं जिसकी कोई विरासत ही नहीं है, उसका वजूद ही क्या है! जिसका कोई वजूद ही नहीं, भला उसका वारिस कौन होगा। ऐसे ही लोगों को लावारिस कहा जाता है, आवारा कहा जाता है। जमीन से, नदी से, पहाड़ से, हवा से, पानी से, आकाश से संबंध न रखने वाली मनुष्य जाति की नियति आवारा नियति है। मर्यादा विहीन। अर्थहीन।

पता के बारे में पता पाने में आप जितना ही प्रवृत्त होंगे, उसका विस्तार बढ़ता जाएगा। उसकी गहराई बढ़ती जाएगी। उसका रस गहराता जाएगा। बड़ा प्यारा शब्द है, पता। बड़ा आत्मीय है। बड़ा आंतरिक है। बेहद अनन्य है। यह शब्द इतना अर्थगर्भित शब्द है कि इसमें मुहावरे की महिमा अपने आप आकर समाहित हो गई है।  पता का एक अर्थ जानकारी भी होता है। पता एक अर्थ परिचय भी होता है। पता का एक अर्थ आत्मीयता से भी होता है। जब हम किसी से पूछते हैं कि अमुक व्यक्ति के बारे में या अमुक विषय के बारे में आपको पता है? तो यह प्रश्न उसकी जानकारी को जांचने वाला ही प्रश्न होता है। किसी विषय के बारे में किसी भी ज्ञानशून्यता को इंगित करने के लिए भी प्राय: लोग कहते हैं कि इस विषय के बारे में तो इन्हें पता भी नहीं है। पता का एक अर्थ पत से भी जुड़ता है। आदमी की मर्यादा, उसकी गरिमा उसके पते में सम्मिलित होती है। किसी के महत्त्व को व्यंजित करने के लिए हम कहते हैं कि उनके बारे में हमें बखूबी पता है। बखूबी पता केवल आदमी की महत्ता को ही नहीं, उसकी टुच्चई को भी पूरा प्रदर्शित करता है।

पता केवल ठिकाना नहीं है। ठिकाना तो आदमी के स्थूल अस्तित्व के टिकने की जगह है। मगर पता इस स्थूल अभिव्यंजना के अलावा भी बहुत कुछ है। यह मनुष्य की अस्मिता की व्याप्ति को व्यंजित करता है। अपनी अस्मिता के सूक्ष्म स्वरूप में भी आदमी जहां-जहां मौजूद है, वह सब उसके पता में सम्मिलित है।
किसी का भी ठीक-ठाक पता पाना बड़ा मुश्किल है। गंगा पंवड़ कर पाने जितना मुश्किल। किसी को पता चला देना धमकी भी है। वहीं, ‘मेरे बारे में पता नहीं है’, कहना अपने गोपन सामर्थ्य का शंखनाद भी बन जाता है। ‘अभी पता चल जाएगा’ में आतंक के सृजन का कैसा उत्कट आवेग प्रगट होता है। ‘आप जो हैं, हमें पता है’ में आदमी के वजूद की नगण्यता का कैसा उद्घोष है। खैर! यह तो दीगर बातें हैं। हमें तो पता के बारे में कुछ पता करना है।  पता एक ऐसी चीज है, जो सबके पास है। राजा का भी पता है। प्रजा का भी पता है। अमीर का भी है। गरीब का भी है। विद्वान का भी है। मूर्ख का भी है। बलवान का भी है। निर्बल का भी है। पता अपनी तरफ से किसी में भेद नहीं करता। वह अपने को सबको देता है। वह सबमें है। सबको सुलभ है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसके पास भी पता है। जिसके पास जो पता है, सबको पता है। राजा का भी राई-रत्ती सब पता है, प्रजा को। राजा को तो खैर सब कुछ पता ही है। राजा को प्रजा का सारा हुलिया पता है। सब दर्ज है उसके रजिस्टर में। राजा की छाया दर्ज है, उसके पास। अंगूठे का निशान दर्ज है। ललाट में लिखी भाग्य की रेखाएं दर्ज हैं। पेट की अंतड़ियों के अक्स दर्ज हैं। राजा को केवल कुछ नहीं पता है तो प्रजा की जरूरत नहीं पता है। उसके पास क्या कुछ है, सब पता है। क्या कुछ नहीं है, यह कत्तई पता नहीं है। जो कुछ प्रजा के पास नहीं है, वह उसके पता में शामिल नहीं है। बड़ा भारी दुर्भाग्य है।

हमारे जनतंत्र में हमारी जनता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जो कुछ उसके पास नहीं है, वही उसका असली पता है। वह पता राजा को पता नहीं है। जो पता, उसे पता है, नकली पता है। राजा जो कुछ भी प्रजा को देता है, नकली पते पर देता है। पता गलत होने के कारण प्रजा को कुछ नहीं मिलता। राजा जो देता है, प्रजा को मिलता नहीं, शायद यही असली प्रजातंत्र है। देने की और न पाने की जो क्रिया की निरंतरता है, वही प्रजातंत्र का प्राण है। प्रजातंत्र भी बड़ी दिलचस्प चीज है। बड़ा रोमांचक खेल है, प्रजातंत्र का। कभी खत्म न होने वाला। गरीबी को दूर करने के उद्योग होते रहें, गरीबी बनी रहे। गंगा को निर्मल करने के अभियान जारी रहें और गंगा प्रदूषित बनी रहे। पुलिस थानों की संख्या बढ़ती रहे, लूट, हत्या, चोरी भी बढ़ती रहे। बलात्कार भी बढ़ता रहे। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय बनते रहें, और इनके बढ़ने के अनुपात में मूर्खता भी बढ़ती रहे। शिक्षा भी बढ़ती रहे, स्वार्थ भी बढ़ता रहे। मंत्रियों की तनख्वाह भी बढ़ती रहे और उनके त्याग का जयगान भी बढ़ता रहे। यह सब प्रजातंत्र की गरिमा है। किसको नहीं पता है? फिर यह सब भला क्या कहना। कहने की क्या जरूरत?
मैं इन सब बातों के लिए परेशान नहीं हूं। मेरी परेशानी का मूल्य ही क्या है! परेशानियों के जंगल में भला मेरी परेशानी किस खेत की मूली है। सही पते की तलाश कैसे हो, मुझे नहीं मालूम। मुझे सिर्फ मालूम है कि हमारी अनगिनत भेजी हुई और भेजी जाने वाली चिट्ठियों पर पते गलत लिख गए हैं। गलत पते के कारण संवाद बंद है। हमारा प्रजातंत्र रिश्तों में संवाद कायम करने में प्रवृत्त हो सकता हैं, क्या? ०

 

 

 

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