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ललित प्रसंग: बूड़ती हुई विरासत

हमारी विरासत बूड़ रही है, बूड़ती जा रही है, हम हैं कि चाय की चुस्कियां लेते अपनी विरासत के बूड़ने का समाचार सुन रहे हैं।

आंख कान के बीच बोलचाल का बंद हो जाना हमारे समय की सबसे भयानक व्याधि है

जी बड़ा हलकान है।

क्यों भाई, क्यों?

क्या बताऊं? कैसे बताऊं? कुछ समझ नहीं आता। बताऊं तो किससे बताऊं। जिनसे बताना चाहता हूं बताने का मन होता है, वे मुझसे भी ज्यादा हलकान, परेशान मालूम होते हैं। कुछ कहने के पहले ही मन बैठ जाता है। जी की हुमस ही ठंडी पड़ जाती है। बुझ जाती है।

बड़ा अजीब है। जो भी मिलने आता है, मिलने नहीं आता है। अपने को उलीचने आता है। गरजने, बरसने आता है। मिलने वाले को खाली बर्तन की तरह चाहता है। उसमें अपने को भर देने आता है। हर कोई दूसरे को लदुआ बैल समझ कर अपने को लाद देना चाहता है। हर कोई दूसरे को घोड़े की नंगी पीठ समझ कर उस पर कूद कर सवार हो जाना चाहता है। भला ऐसे में कुछ कहना-सुनना क्या हो सकता है। सिर्फ सुनना हो सकता है।

मैं क्या करूं? मैं हर बार हर मिलने वाले से कुछ कहना चाहता हूं। अपनी परेशानी बताना चाहता हूं। मगर अवसर ही नहीं आता। सुनने में ही समय बीत जाता है। कहने की बारी ही नहीं आती। अपने भीतर की बात भीतर ही घुमड़ती रह जाती है। फिर लगता है, कहना भी क्या!

‘व्याकुल हैं, जो अपने सुख से, जिनकी हैं सुप्त व्यथाएं/ अवकाश भला है किनको, सुनने को करुण कथाएं।’

हमारे समय में व्याकुलता दुख की नहीं है। व्याकुलता सुख की है। जो दुखी हैं, व्याकुल नहीं हैं। जो सचमुच के दुखी हैं, उनकी तो बोलती ही बंद है। उनकी तो जबान ही पथरा गई है। कभी न पसीजने वाले लोकतंत्र के पत्थर के देवताओं की पूजा-अर्चना करते-करते पुजारियों की जबान भी पत्थर की बन गई है। खैर, यह तथ्य चाहे जितना ऊटपटांग मालूम पड़े, मगर असंगत कतई नहीं है। हमारे समय में दुख का केवल ढिंढोरा पीटा जा रहा है। ढिढोरा वे लोग पीट रहे हैं, जो अपने सुख से व्याकुल हैं। अपने सुख के विस्तार के लिए विकल हैं। अपने सुख की बाढ़ के लिए बेकल हैं।

हमारे समय में बेरोजगार उतने परेशान नहीं हैं, जितने परेशान रोजगार वाले हैं। रोजगार वालों की परेशानी सुन कर बेरोजगारों को अपना दुख बिसर जाता है। उनके दिल में तसल्ली हो आती है। वे सोचने लगते हैं, भला ही है जो वे बेरोजगार हैं। हजार-हजार चिंताओं से तो एक चिंता भली है।

जो नौकरी में हैं, उनके दुख का तो पार ही नहीं। वे दुख में डूब जाएंगे, डूब कर मर जाएंगे मगर नौकरी छोड़ कर सुख का दामन नहीं थामेंगे। वे गुलामी का रोना रोएंगे, मगर गुलामी को इंकार कभी नहीं करेंगे। उनकी तनख्वाह चाहे जितनी बढ़ती जाए, मगर हमेशा कम रहेगी।

जो लोग सत्ता में हैं या सत्ता में होने की होड़ में हैं उनकी परेशानियों का तो कोई आर-पार ही नहीं। वे जब भी बोलेंगे-बतियाएंगे अपनी परेशानियों के बाबत बतियाएंगे। किसलिए? इसलिए कि उनके अलावा बाकी लोगों में से कोई इधर कदम बढ़ाने का हौसला न करे। यह सब सुख की व्याकुलता है। जो अपने सुख से व्याकुल होते हैं, व्याकुल हो जाते हैं, उनकी संवेदनाएं सो जाती हैं। जिनकी संवेदना सो चुकी है, उनसे कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं होता।

मगर मैं परेशान हूं। हमारे समय का सुख अंधा है। हमारे समय का सुख अंधा क्यों है? मैं परेशान हूं कि हमारे समय का सुख बहरा है। हमारे समय का सुख बहरा क्यों हैं?

क्या सुख अंधा होता है? क्या सुख बहरा होता है? मैं परेशान हूं कि कब से पूछना चाह रहा हूं, मगर पूछ नहीं पा रहा हूं।

किससे पूछूं? जो सुखी हैं, उनसे? नहीं, नहीं वे कुछ नहीं बताएंगे। कुछ भी बताने में उनकी रुचि ही नहीं है।

हमारे समय में जो सुखी हैं, अंधे हैं। इसलिए अंधे हैं कि वे दूसरों को नहीं देखते। वे अंधे हैं कि उनको दूसरों का दुख दिखाई नहीं देता। वे हमेशा केवल अपने सुख को, अपनी सुविधा को बिना किसी दुविधा के टटोलते रहते हैं। तनख्वाह लेते हैं दूसरों का दुख देखने के लिए, मगर काम करते हैं दूसरों का सुख, दूसरों की सुविधा छीन कर, हड़प कर अपना सुख, अपनी सुविधा बढ़ाने का। अधिकार पाते हैं दूसरों का दुख, दूसरों की परेशानी सुन कर उसे दूर करने के लिए, मगर अधिकार का उपयोग करते हैं अपना दुख, अपनी परेशानी दूर भगाने में। सारे के सारे लोग बहरे हैं। हमारी नियति बड़ी दारुण नियति है। हम अपने समय में अंधे और बहरे लोगों के शासन में रहने को अभिशप्त हैं।

हम अपनी इस दारुण नियति को लोकतंत्र की गरिमा की भव्य छांह में जाने कब से सहते ही आ रहे हैं। रहते ही आ रहे हैं। मगर अब तो इस तरह से रहना भी दूभर होता जा रहा है।

अब तो हमारे समय में आदमी का अपना वजूद ही कई-कई हिस्सों में विभाजित होकर अपनी ही अस्मिता के खिलाफ खड़ा है।

हमारे समय में हमारी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हमारी अपनी ही आंखें अपने ही कानों के खिलाफ हैं। अपने ही कान अपनी ही आंखों के विरुद्ध हैं। हमारे जो नितांत अपने हैं, अपनों के बीच ही बोलचाल बंद है।

कान जो सुन रहे हैं, आंख वह देख नहीं रही है। आंख के लिए कान झूठे हैं। आंख जो देख रही है, कान वह सुन नहीं रहे हैं। कान के लिए आंख झूठी है।

हमारे कान दिन-रात जो सुन रहे हैं, जो ेदिन-रात उनको सुनाया जा रहा है, वह सब आंख के लिए झूठा है। आंख का कान पर से विश्वास उठ गया है।

कान कह रहे हैं, सब कुछ ठीक है। आंख कह रही है नहीं, अभी सब कुछ ठीक नहीं है। कान कह रहे हैं, सब कुछ शोभन है। आंख कह रही है, बहुत कुछ अशोभन दिख रहा है। हमारे समय में आंख और कान के बीच अनबन इतनी बढ़ गई है कि बोलचाल बंद है।
आंख और कान के बीच अविश्वास का इस कदर बढ़ कर बोलचाल बंद हो जाना हमारे लोकतंत्र के लिए कितना भयावह है। इससे भी भयावह यह है कि अब भी यह हमारे लिए चिंता का विषय नहीं है। विज्ञापन की भाषा की गिरफ्त में सच्चाई की भाषा दम तोड़ रही है।

आंख और कान के बीच की अनबन मेरी सबसे बड़ी परेशानी है। आंखों का मूल्य, आंखों का महत्त्व कम होता जा रहा है। यह कबीर की विरासत के विरुद्ध है। हमारी विरासत को विनष्ट करने वाला है। कबीर की विरासत आंखिन देखी की विरासत है। कानों सुनी की विरासत- कागज लेखी की विरासत कबीर के विपक्ष की विरासत है। कबीर के विपक्ष की विरासत हमारे समय में हमारे देश में फैली रही है। फल-फूल रही है। यह गर्व की बात है या ग्लानि की?

आंख कान के बीच बोलचाल का बंद हो जाना हमारे समय की सबसे भयानक व्याधि है। चिकित्साशास्त्र में इस व्याधि का कोई इलाज नहीं है। समाजशास्त्र में इसका कोई निदान नहीं है। राजनीति में इस परेशानी का संज्ञान ही नहीं है।

हमारी विरासत बूड़ रही है, बूड़ती जा रही है, हम हैं कि चाय की चुस्कियां लेते अपनी विरासत के बूड़ने का समाचार सुन रहे हैं।

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