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कुंवर नारायण की कुछ कविताएं और कुछ वक्तव्य

कुंवर नारायण ने इंटर तक की शिक्षा विज्ञान वर्ग से प्राप्त की थी। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एमए किया।

Author November 19, 2017 05:29 am
कुंवर नारायण 90 वर्ष के थे।

कुंवर  नारायण
कुंवर नारायण ने इंटर तक की शिक्षा विज्ञान वर्ग से प्राप्त की थी। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। 1973 से 1979 तक वे ‘उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी’ के उपाध्यक्ष रहे। उसकी पत्रिका ‘छायानट’ के संपादक रहे।

प्रमुख कृतियां

कविता संग्रह : चक्रव्यूह (1956), तीसरा सप्तक (1959), परिवेश: हम-तुम (1961), अपने सामने (1979), कोई दूसरा नहीं (1993), इन दिनों (2002)

प्रबंध काव्य : आत्मजयी (1965) और वाजश्रवा के बहाने (2008)

कहानी संग्रह : आकारों के आसपास (1973)

समीक्षा / विचार : आज और आज से पहले (1998), मेरे साक्षात्कार (1999), साहित्य के कुछ अंतर्विषयक संदर्भ (2003)

संकलन : कुंवर नारायण-संसार (चुने हुए लेखों का संग्रह) 2002, उपस्थिति (चुने हुए लेखों का संग्रह, 2002), चुनी हुई कविताएँ (2007), प्रतिनिधि कविताएं (2008)

पुरस्कार-सम्मान

कुंवर नारायण को 2009 में वर्ष 2005 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, राष्टÑीय कबीर सम्मान, शलाका सम्मान, मेडल आॅफ वॉरसा यूनिवर्सिटी, पोलैंड और रोम के अंतरराष्टÑीय प्रीमियो फेरेनिया सम्मान और 2009 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य अकादमी ने महत्तर सदस्यता देकर सम्मानित किया था।

कविताएं

पूर्वाभास

ओ मस्तक विराट,
अभी नहीं मुकुट और अलंकार।
अभी नहीं तिलक और राज्यभार।

तेजस्वी चिंतित ललाट। दो मुझको
सदियों तपस्याओं में जी सकने की क्षमता।
पाऊं कदाचित् वह इष्ट कभी
कोई अमरत्व जिसे
सम्मानित करते मानवता सम्मानित हो।

सागर-प्रक्षालित पग,
स्फुर घन उत्तरीय,
वन प्रांतर जटाजूट,
माथे सूरज उदीय,
… इतना पर्याप्त अभी।
स्मरण में
अमिट स्पर्श निष्कलंक मर्यादाओं के।
बात एक बनने का साहस-सा करती…।

तुम्हारे शब्दों में यदि न कह सकूं अपनी बात,
विधि-विहीन प्रार्थना
यदि तुम तक न पहुंचे तो
क्षमा कर देना,
मेरे उपहार- मेरे नैवेद्य-
समृद्धियों को छूते हुए
अर्पित होते रहे जिस ईश्वर को
वह यदि अस्पष्ट भी हो
तो ये प्रार्थनाएं सच्ची हैं… इन्हें
अपनी पवित्रताओं से ठुकराना मत,
चुपचाप विसर्जित हो जाने देना
समय पर… सूर्य पर…
भूख के अनुपयुक्त इस किंचित प्रसाद को
फिर जूठा मत करना अपनी श्रद्धाओं से,
इनके विधर्म को बचाना अपने शाप से,
इनकी भिक्षुक विनय को छोटा मत करना
अपनी भिक्षा की नाप से :
उपेक्षित छोड़ देना
हवाओं पर, सागर पर…

कीर्ति-स्तंभ वह अस्पष्ट आभा
सूर्य से सूर्य तक,
प्राण से प्राण तक…।
नक्षत्रो,
असंवेद्य विचरण को शीर्षक दो :
भीड़ रहित पूजा को फूल दो :
तोरण-मंडप-विहीन मंदिर को दीपक दो :
जब तक मैं न लौटूं
उपासित रहे वह सब
जिस ओर मेरे शब्दों के संकेत।

जब-जब समर्थ जिज्ञासा से
काल की विदेह अतिशयता को
कोई ललकारे-
सीमा-संदर्भहीन साहस को इंगित दो।

पिछली पूजाओं के ये फूटे मंगल-घट।
किसी धर्म-ग्रंथ के
पृष्ठ-प्रकरण- शीर्षक-
सब अलग-अलग।
वक्ता चढ़ावे के लालच में
बांच रहे शास्त्र-वचन,
ऊंघ रहे श्रोतागण!…

ओ मस्तक विराट,
इतना अभिमान रहे-
भ्रष्ट अभिषेकों को न दूं मस्तक
न दूं मान…

इससे अच्छा
चुपचाप अर्पित हो जा सकूं
दिगंत प्रतीक्षाओं को…

(‘आत्मजयी’ से)
अबकी अगर लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूंछें नहीं
कमर में बांधे लोहे की पूंछें नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर-आंखों से

अबकी अगर लौटा तो
मनुष्यतर लौटूंगा

घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा।

वक्तव्य

मैं आर्नल्ड के शब्दों में व्यापक अर्थ में कविता को ‘जीवन की आलोचना’ मानता हूं। एक अच्छे आलोचक के लिए यथासंभव निष्पक्ष होना जितना आवश्यक है, एक अच्छे कवि के लिए भी उतना ही और इसीलिए उसका एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना, कम से कम आधुनिक युग में अत्यंत आवश्यक है।

मुझे वह ‘एप्रोच’ पसंद है जो किसी भी सत्य को स्वयं में सत्य न मान कर उसे अगले सत्य तक पहुंचने का साधन मानता है : जिसके लिए सत्य का अर्थ अपने से बड़े सत्य में विकसित हो सकने की सक्रियता है, रास्ते का पहाड़ बन जाने की जड़ता नहीं। मेरे लिए स्थापित सत्य- चाहे वह राजनीतिक हो, चाहे सामाजिक, चाहे शास्त्रीय- उतने महत्त्वपूर्ण नहीं जितनी वह बुद्धि, जिसने उन सत्यों को जन्म दिया। सिद्धांतों में गलतियां हो सकती हैं, नितांत उदार और वैज्ञानिक मान्यताएं अंधविश्वासी नारे बना दी जा सकती हैं, पर एक ही आस्था रक्खी जा सकती है तो मनुष्य की उस संयत और निस्पृह बुद्धिमत्ता में ही, जो भरसक सत्यों की मौसमी सरगर्मी से बच कर धैर्य के साथ जीवन को उसकी संपूर्णता में समझने का प्रयत्न करती रही है।

अस्तित्व की मैंने दो बुनियादी परिस्थितियां मानी हैं- एक तो व्यक्ति और अज्ञात; तथा दूसरी, व्यक्ति और उसका सामाजिक वातावरण। अस्तित्व की आस्था संबंधी समस्याएं मूलत: अनस्तित्व की भयानक शून्यता से उपजती हैं। पास्काल का यह वाक्य कि ‘अनंत विस्तार का अटूट मौन मुझे भयभीत करता है’ उस मूल वेदना का आरंभ है, जहां मनुष्य अपने को, मृत्यु को निश्चित और बाद की अनिश्चित संभावनाओं के बीच बिल्कुल अकेला पाता है- जहां वह अपने अल्प और असार जीवन को आने वाले महाशून्य के संतुलन में विचारता है- जहां ‘मैं क्या हूं? मैं क्यों हूं?’ का चिर-असंतुष्ट प्रश्न जीवन की हर आस्था को रौंदता रहता है।

 

 

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