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‘समाज’ कॉलम में क्षमा शर्मा का लेख : स्मार्ट होरी का स्मार्ट गांव

1990 के बाद गांवों और शहरों की दूरी लगातार घटी है। इस घटने का अर्थ गांव में पाई जाने वाली सुविधाओं से है। सालों पहले ए ऐंड एम नाम की पत्रिका ने बताया था कि गांवों में घर में काम आने वाली चीजें जैसे एसी, फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, मिक्सी और कम्प्यूटर अब बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:19 AM
Smart City की तर्ज पर बदलेगी गांव की रूपरेखा, कहलाएंगे Smart Village (Pic-smartcitiesindia)

हाल में गांव जाना हुआ। पहले दूर से जो एक साधारण-सा घर दिखाई देता था, चालीस साल पहले कच्चा और छप्पर से छवा था। बीच में एक बार र्इंटों की दीवारों का भी बनाया गया था, अब उसमें लगे शीशे बिल्कुल वैसे ही चमक रहे थे जैसे किसी माल, होटल या बहुमंजिली इमारत के चमकते हैं। गांव के लोग अब सिर्फ शहरों की चमक-दमक देख कर चकित नहीं होते, बल्कि टीवी, इंटरनेट के जरिए हर रोज उससे दो-चार होते हैं। और अपने घरों में वही सुविधाएं जुटाने का प्रयास करते हैं, जिनका लाभ शहरों में रहने वाले उठाते रहे हैं।

1990 के बाद गांवों और शहरों की दूरी लगातार घटी है। इस घटने का अर्थ गांव में पाई जाने वाली सुविधाओं से है। सालों पहले ए ऐंड एम नाम की पत्रिका ने बताया था कि गांवों में घर में काम आने वाली चीजें जैसे एसी, फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, मिक्सी और कम्प्यूटर अब बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। यहां तक कि शैंपू के छोटे पाउच गांवों में बहुत लोकप्रिय हैं। एक चौंकाने वाली खबर यह है कि गांवों में अब महंगाई शहरों से ज्यादा है, जबकि एक समय में शहरों के मुकाबले गांवों में जीवन यापन बेहद सस्ता था। खानपान और अन्य रोजमर्रा की चीजों पर बाहर और बाजार पर निर्भरता बहुत कम थी। एक के बदले दूसरी चीज के लेन-देन का बार्टर सिस्टम बेहद कामयाब था।

लेकिन हाल के एनएसएसओ के सर्वे ने बताया है कि गांव वालों के न केवल रहन-सहन, बल्कि खानपान की आदतों में भी बड़ा बदलाव आया है। अब गांवों में घर के मुकाबले बाहर खाने की आदत बढ़ चली है। डिब्बा बंद खाने और जंक फूड का प्रचलन बढ़ा है। सबसे बड़ी बात तो सर्वे में यह पता चली है कि आवागमन के लिए बड़ी संख्या में गांव वाले हवाई यात्राओं का सहारा ले रहे हैं।

यही नहीं, अब शीतल पेय से लेकर हर तरह का खाना गांव में उपलब्ध है। चूल्हे की आग बहुत कम घरों में दिखाई देती है। मिट्टी के बरतनों का प्रयोग न के बराबर है। हाथ से मक्खन निकालता कोई दिखाई नहीं देता। इसके लिए मिक्सी तो है ही। गांव के खेतों में जो चीजें पैदा होती हैं, वे जल्दी ही बाजार में खप जाती हैं। अगर हम अपने पुराने गांवों को याद करें, तो लोग अपना अन्न खुद उगाते थे। इस अन्न के बचे-खुचे कूड़े-करकट का इस्तेमाल र्इंधन के रूप में करते थे। घर में जानवर पालते थे। उनका चारा खेतों से ही आता था। घर, छत बनाना, छप्पर छाना आदि कामों के लिए, यहां तक कि घर की दीवारें बनाने के लिए भी वे किसी और की मदद नहीं लेते थे। यानी वे जीवन जीने के लिए हर जरूरी काम खुद करना जानते थे। आज के लोग इसे स्माल इकॉनामी या अभाव की इकॉनामी कहेंगे।

आज जीवन में अभाव या कि दूसरे से नीचे दिखना कोई नहीं चाहता। हर एक को दूसरे से भारी स्पर्धा है। विज्ञापनों की मारा-मारी और अपने उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा बेचने के लालच ने इस स्पर्धा को किसी कीमती मूल्य की तरह घर-घर पहुंचा दिया है। इसीलिए आज गांव में भी मेहनत के प्रति कोई खास लगाव नहीं बचा है। मेहनत के साथ मजदूरी शब्द जुड़ा है और भला कोई मजदूर बन कर या कहला कर यानी समाज में सबसे निचले पायदान पर खड़ा क्यों दिखना चाहेगा। संपन्नता शायद मेहनत से दूर भगाती है। हाल में अपने घर में काम करने आए इलेक्ट्रीशियन से पता चला कि गांव में उसकी काफी खेती-बाड़ी है, मगर वह वहां नहीं रहना चाहता। उसका कहना है कि शरीर अब इतनी धूप-गरमी में काम करने लायक नहीं रहा। कौन इतना काम करके बीमार पड़े।

कुछ सालों से भारत में स्मार्ट सिटीज, स्मार्ट गांव आदि बनाने की बातें चल रही हैं। जैसे स्मार्ट सिटीज अकसर बिल्डर्स अपनी तस्वीरों में दिखाते हैं, वे प्राय: सच्ची नहीं होतीं। इनमें रहने वाले बाशिंदे पश्चिमी वेशभूषा पहने रहते हैं। इनकी कारें बड़ी होती हैं। हर परिसर में स्विंमिंग पूल होता है। किचन में दाल, चावल के डिब्बे न दिख कर अकसर खाली दिखते हैं। वहां के बाशिंदे शायद बाहर का खाते हैं। क्योंकि दाल, चावल, रोटी, दही, सलाद आदि को तैयार करने में मेहनत करनी पड़ती है, उनमें वह स्मार्टनैस भी नहीं रहती, जिसे आजकल जीवन जीने के लिए जरूरी बताया जाता है।

यही नहीं, इन घरों के बच्चे बड़े और महंगे ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं, जिनका अगला डेस्टीनेशन भारत का कोई स्कूल, कॉलेज न होकर अमेरिका, यूरोप या आस्ट्रेलिया आदि देश होते हैं। सपनों के गांवों और शहरों की परिकल्पना जब ऐसी है तो उनका खान-पान, रहन-सहन भी पहले की तरह कैसे रह सकता है। शहर का दिखावा गांव में बढ़ रहा है तो उसे आज के शब्दों में ग्रोथ कहते हैं।

इ न शहरों-गांवों की परिकल्पना करें तो मन में बात आती है कि इनके आसपास जो पुराने बसे शहर-गांव होंगे उनका क्या होगा। उनमें रहने वाले तो बिना किसी के बताए-बनाए ही सबसे निचली श्रेणी के बाशिंदे बना दिए जाएंगे। वहां खुली बदबूदार नालियां, दूषित पानी, बिजली का न होना, स्कूलों का न होना या होते हुए भी अध्यापकों न आना, मिलावटी सामान आदि की परेशानियां कैसे दूर होंगी। क्या ये परेशानियां भविष्य के स्मार्ट सिटीज और गांवों तक नहीं पहुंचेंगी।

इन स्मार्ट सिटीज को इनकी सुविधाओं के कारण पुराने शहरों-कस्बों-गांवों के लोग किसी दुश्मन की तरह देखा करेंगे। वे बदला लेने के लिए अपराध की राह तो नहीं पकड़ेंगे, क्योंकि देखा गया है कि जब मुट्ठी भर लोग चमकते दिखाई देते हैं तो बाकी के लोग अपना फ्रस्ट्रेशन मिटाने के लिए उनकी चमक को मिटाने की कोशिश करते हैं। कायदे से तो होना चाहिए था कि जो आधारभूत ढांचा हमारे पास है उसे ही सुधारने की कोशिशें की जातीं। स्कूल की इमारत है तो उसे ठीक किया जा सकता है, बजाय इसके कि नई जमीन खरीदी जाए फिर नया स्कूल बनाया जाए। इसी तरह अस्पताल, कारखाने, बाजार आदि को सुधारा जा सकता है। नदियों और तालाब, पोखर, झीलों के पानी को कम लागत में प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह कि कुछ ही दिनों में स्मार्ट गांवों में रहने वाले स्मार्ट होरी मिला करेंगे।

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