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ज्ञान-विज्ञान : प्रकाश का रहस्य

आदि काल से ही धरती पर प्रकाश को लेकर गहरी जिज्ञासा और रोमांच रहा है। इसकी खोज में तमाम कहानियां बनी और बिगड़ी हैं। दर्जनों अनुसंधान और वैज्ञानिक अध्ययन सामने आए..

Author नई दिल्ली | December 21, 2015 7:11 PM

आदि काल से ही धरती पर प्रकाश को लेकर गहरी जिज्ञासा और रोमांच रहा है। इसकी खोज में तमाम कहानियां बनी और बिगड़ी हैं। दर्जनों अनुसंधान और वैज्ञानिक अध्ययन सामने आए। रहस्य की जितनी परतें उघड़ी, उतनी ही परतें आगे बनती चली गर्इं। हालांकि, आज वैज्ञानिक प्रकाश की बहुत सारी बारीकियां जान चुके हैं, लेकिन इसका जादू अभी भी बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र ने 2015 को ‘अंतरराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष’ के तौर पर मनाने का एलान किया था। साल उतार पर है। ऐसे में इसका एक आकलन जरूरी है।

रोशनी में तेज में चाकू जैसी धार है, जो चिकित्सा जगत में चीरफाड़ करने का काम बगैर रक्त बहाए बखूबी कर सकती है। बिजली के बल्ब से लेकर लेजर किरणें तक और इलेक्ट्रॉनिक गजेट इसी की देन है। आज सभी की पहली पसंद बन चुका टच स्क्रीन और डिजिटल दुनिया प्रकाश की बदौलत ही बहुउपयोगी बन गया है। संचार और सूचना क्रांति तो इसके बगैर संभव ही नहीं था। हॉलीवुड की बहुचर्चित फिल्म स्टार ‘वार्स’ में सारी लड़ाइयां और संघर्ष लेसर किरणों से होती है।

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साथ ही वैश्विक स्तर पर विकास को बढ़ावा देने के सिलसिले में ऊर्जा, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में आई चुनौतियों के समाधान तलाशने की दिशा में प्रकाश आधारित प्रौद्योगिकी को लेकर लोगों के बीच जागरूकता फैलाना है। प्राकृतिक संसाधनों के विपुल भंडार और नाभकीय ऊर्जा का भी सीधा संबंध प्रकाश की आवश्यकता और उपलब्धता से है। यह बात हर किसी के लिए कितना मायने रखती है, इसे भी समझना और सामान्य लोगों को बताना आवश्यक है। यूनेस्को का मानना है कि प्रकाश सूचना और संचार, फाइबर आप्टिक्स, खगोलशास्त्र, मनोरंजन और सांस्कृतिक परिवेश के क्षेत्र में अनगिनत संभावनाएं समेटे हुए है।

2015 प्रकाश के संदर्भ में बहुत महत्त्व का साल रहा है। विज्ञान और प्राद्यौगिकी के क्षेत्र में भारत की भागीदारी और उपलब्धियों को भी साधारण नहीं माना जा सकता है। यहां के वैज्ञानिकों की वैश्विक पहचान है। भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने प्रकाश संश्लेषण का सिद्धांत दिया था। प्रकृति में सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित होने की क्रिया को समझाने वालों में जगदीश चंद्र बोस का नाम अहम है। प्रकाश संश्लेषण की इस नैसर्गिक प्रक्रिया में पेड़-पौधों के पत्तों का हरापन सूर्य के प्रकाश से ही संभव है, तो पृथ्वी पर जीवन का आधार ही यह प्रक्रिया है। सूर्य का प्रकाश, प्रकाश संश्लेषण के अलावा हमें गर्मी प्रदान करने और मौसम के बदलाव का कार्य करता है। आंखों से किसी वस्तु को दखना इसी से संभव है।

सदियों पुराने प्रकाश के इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि हमारे जीवन के इस अभिन्न हिस्से को लेकर समय-समय पर दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने कई खोज किए। इस बारे में जैसे-जैसे समझ बदलती गई, वैसे-वैसे दुनिया भी बदलती चली गई। सूर्य से पृथ्वी पर आए प्राकृतिक प्रकाश से लेकर दीपों और बल्बों के कृत्रिम प्रकाश के क्षेत्र में किए गए शोधों से हमारी जीवनशैली सरल-सहज बनती चली गई। इस कारण इसे जीवन का पर्याय कहा जा सकता है।

कुछ वैज्ञानिकों की तरह ही सत्तरहवीं सदी में सर आइजक न्यूटन का मानना था कि प्रकाश कणों का समूह है, जबकि कुछ वैज्ञानिक इसे तरंग मानते थे। न्यूटन द्वारा किए गए अनेक प्रयोगों से बताया गया कि श्वेत प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है। ये रंग बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल हैं। इन्हें एक साथ प्राकृतिक इंद्रधनुष में देखा जा सकता है। यानी बैंगनी से लाल तक की पट्टियां ही प्रकाश की एक किरण होती हैं।

तब यह भी मानना था कि प्रत्येक रंग का उपयोग कर श्वेत प्रकाश फिर से नहीं बनाई जा सकता है और न ही किसी एक रंग के प्रकाश को विभक्त किया जा सकता है। उसे 1800 में थामस यंग नामक भौतिकशास्त्री ने अपने प्रयोगों के आधार पर खंडित कर दिया। साथ ही हाइगेंस और राबर्ट हुक ने प्रकाश को तरंग कहा। यंग ने यह भी कहा कि प्रकाश के विभिन्न रंगों के भी भिन्न-भिन्न तरंगदैर्ध्य होते हैं। उसी के अनुसार उनमें चमक और चटकीलापन दिखता है। इस आधार पर किए गए शोधों का फायदा 19वीं सदी में विद्युत और चुंबकत्व संबंधी विज्ञान में मिला। भौतिकशास़्त्री जेम्स क्लार्क मैक्सवेल ने बताया कि विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों में भी तरंगें होनी चाहिए।

इनकी गति प्रकाश की गति के काफी करीब पाई गई। इस अनुसार यह स्पष्ट किया गया कि प्रकाश एक विद्युत-चुंबकीय घटना है। आज भी इसे एक महत्त्वपूर्ण तथ्य के तौर पर जाना जाता है कि विद्युत-चुंबकीय विकिरण की एक काफी उच्च आवृत्ति होती है। प्रकाश की तरंग प्रकृति संबंधी सिद्धांत के सिलसिले में 1905 आइंस्टाइन ने बताया कि प्रकाश की किरण में कण और तरंग, दोनों तरह के गुण और व्यवहार होते हैं। साधारण अर्थ में यह दृश्य प्रकाश, विद्युत चुंबकीय विकिरण के फोटॉन (ऊर्जा का बंडल) के रूप में मुक्त ऊर्जा होती है। इसी फोटॉन को हमारी आंखें महसूस करती है।

ये फोटॉन परमाणु स्तर पर होने वाली घटना के परिणामस्वरूप ही परिवर्तित होती है। इसी स्थिति में ठीक वैसे ही रंगों में बदलाव आता है, जैसे किसी लोहे की छड़ को गर्म करने पर होता है। तापमान बदलने पर प्रकाश के अदृश्य अवरक्त विकिरण उत्सर्जित होते हैं। तापमान के और ज्यादा बढ़ने पर प्रकाश का रंग लाल, नारंगी, पीला और अंत में चमकीला सफेद रंग में बदल जाता है।

अ ब जरा घरों में रोशनी के लिए इस्तेमाल की जाने वाले तरीकों पर गौर करें। परंपरागत तेल के जलते दीये और मोमबत्तियों की लौ में गर्म कार्बन कणों के द्वार प्रकाश उत्पन्न होता है। जबकि सामान्य बल्बों में गर्म टंगस्टन तंतु द्वारा प्रकाश पैदा होता है। इस बल्ब का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया था। 11 फरवरी 1847 को जन्म लेने वाले एडिसन ने अपने जीवनकाल में कुल 1093आविष्कार पेटेंट करवाए, जिसमें 389 के पेटेंट प्रकाश संबंधी थे। उन्होंने जब 31 दिसंबर 1897 न्यूयार्क के मेनलो पार्क में अपनी स्थापित इलेक्ट्रिक लाइट कंपनी द्वारा बनाई गई प्रकाश के बल्ब का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था तब कहा था कि मैं इतनी सस्ती बिजली बनाऊंगा कि केवल अमीर लोग ही मोमबत्ती जलाएंगे।

अंतरराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष इस लिहाज से बड़ी उपलब्धि है। अभी इसे और आगे ले जाना होगा। हमें प्रकृति में प्रकाश की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

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